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जम्मू कश्मीर – अंगुली पर नीली स्याही देख हुआ अपने वजूद का अहसास

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जम्मू कश्मीर. दशकों से उम्मीदों का सपना संजोए लोगों ने अब अपनी अंगुली पर नीली स्याही देखी तो मानो इन्हें सारा जग मिल गया. पहली बार अपने वजूद का अहसास हुआ कि वह भी जम्मू कश्मीर के बाशिंदे हैं. ये कोई और नहीं, बल्कि देश के विभाजन के समय पश्चिमी पाकिस्तान से आए अपने ही लोग हैं.

सात दशक से यहां रह रहे इन लोगों को लोकसभा चुनावों में मतदान अधिकार तो था, लेकिन जम्मू कश्मीर में किसी भी स्थानीय चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकते थे. यहां तक कि जम्मू कश्मीर का निवासी ही नहीं माना जाता था. अनुच्छेद 370 हटने के बाद जंजीरें टूटीं तो जहां मिल गया. जिला विकास परिषद चुनाव में वह पहली बार प्रदेश की चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बने हैं.

जम्मू कश्मीर में जिला विकास परिषद के चुनाव शनिवार से शुरू हो गए हैं. आठ चरणों में ये चुनाव 19 दिसंबर तक चलेंगे. इनके साथ पंचायत और निकाय उपचुनाव भी हो रहे हैं. पाकिस्तान से आए लोग जम्मू कश्मीर में होने वाले किसी स्थानीय चुनाव में पहली बार हिस्सा ले रहे हैं. अनुच्छेद 370 व 35 ए समाप्त होने के बाद इन रिफ्यूजियों को पहली बार जम्मू-कश्मीर में वोट डालने का अधिकार मिला. जिला विकास परिषद के चुनावों के तहत शनिवार को जम्मू जिले की अखनूर तहसील में जब पहले चरण का मतदान हुआ, तो सालों से बेबसी के शिकार ये लोग भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने मतदान केंद्र पहुंचे. जब वह वोट डालकर बाहर आए तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे. चेहरे पर चमक थी.

जम्मू संभाग में पश्चिमी पाकिस्तान से आए लोगों के 26 हजार परिवार हैं. इनमें से अधिकतर जम्मू, सांबा व कठुआ जिले में बसे हैं. अखनूर तहसील में पश्चिमी पाकिस्तान से आए करीब 100 परिवार हैं. अखनूर के अंबारा क्षेत्र में इनके 30, पारता में 40, गड़खाल में 10 तथा घूमल में ऐसे 13 परिवार हैं, जो शनिवार को पहली बार जम्मू कश्मीर में स्थानीय चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बने. सात दशकों से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे इन परिवारों का सपना पांच अगस्त 2019 को पूरा हुआ था, जब मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 व 35ए की जंजीरों से मुक्त किया.

मैंने तो सोचा था, शायद जम्मू कश्मीर का बाशिंदा बनने से पहले ही आंखें बंद हो जाएंगी, लेकिन शुक्रगुजार हूं मोदी सरकार का, जिसने हमें भी जम्मू कश्मीर का नागरिक बनाया. यहां अपना प्रतिनिधि चुनने का मौका दिया. मैं बता नहीं सकता कि वोट डालकर कितनी खुशी हो रही है. – बोधराज

आज तक हमें किसी ने इंसान ही नहीं समझा. हम अपने बुजुर्गों के साथ पाकिस्तान छोड़ भारत आए और यहां बस गए, लेकिन बचपन से बुढ़ापा आ गया, हम रिफ्यूजी ही रहे. हमें लगता था कि हमारा कोई घर नहीं, कोई देश नहीं. आज पहली बार अहसास हुआ कि हम भी इंसान हैं और हमें भी यहां वोट डालने का हक है. कौशल्या देवी

हमारे लिए तो आज असली आजादी है. हम यहां न तो जमीन खरीद सकते थे, न वोट डाल सकते थे. उम्र बीत गई रिफ्यूजी का जीवन जीते-जीते. शुक्र है आज यह दिन आया. अब हमारे बच्चे भी यहां के बाशिंदे बन गए हैं. हमने तो जिंदगी दरबदर होकर गुजार दी, लेकिन मोदी सरकार ने हमारे बच्चों को दरबदर होने से बचा लिया. – स्मृति देवी

आज एक ऐतिहासिक दिन है. पाकिस्तान से आए हिन्दू-सिक्ख, वाल्मिकी व गोरखा समुदाय, यह सब अनुच्छेद 370 व 35 ए की प्रताड़ना के शिकार थे, जो 73 वर्षों में पहली बार वोट डाल रहे हैं. यह राष्ट्र के लिए एक गौरवशाली क्षण है और डॉ. फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाले पीपुल्स एलायंस व पाकिस्तान-चीन की भाषा बोलने वालों के मुंह पर जोरदार तमाचा भी.  प्रो. हरिओम शर्मा, वरिष्ठ राजनीतिक विश्‍लेषक

इनपुट दैनिक जागरण

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