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जम्मू कश्मीर – जब चुन-चुनकर हिन्दुओं को निशाना बनाया गया

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आतंक का दर्द, सच और बहादुरी सीने में दबाए है जम्मू

कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार के बाद आतंक की हवा पीर पंजाल की पहाड़ियां पार कर जम्मू संभाग में आ पहुंची थीं. वर्ष 1990 के बाद धर्म के नाम पर खूनी खेल खेला गया. पाकिस्तान के इशारे पर चुन-चुनकर हिन्दुओं को निशाना बनाया गया. लेकिन यहां के लोग डरे नहीं, बल्कि आतंकियों का डटकर मुकाबला किया.

आतंकियों ने डोडा जिले में क्रूरता की हदें ही पार कर दी थीं. जिले में एक विवाह समारोह में वर और वधु पक्ष के 27 लोगों को एक कतार में खड़ा कर आतंकियों ने गोलियों से भून डाला था. कुछ समय बाद भद्रवाह में 35 लोगों का नरसंहार हुआ. जम्मू के कासिम नगर में 12 महिलाओं सहित 25 की हत्या. वर्ष 1996 से 2001 के बीच के इतिहास के पन्ने पलटे जाएं तो कश्मीर की तरह आतंक का दंश झेल चुके जम्मू संभाग के लोगों का दर्द भी सामने आ जाएगा.

पुलिस से प्रशिक्षण लेकर लोगों ने (विलेज डिफेंस कमेटी) आतंकियों की गोली का जवाब गोली से दिया. यही वजह रही कि आतंकी कश्मीर की तरह जम्मू को अपना गढ़ नहीं बना पाए. हालांकि आतंकवाद की आंच कई परिवारों पर पड़ी और डोडा और रियासी सहित कई जिलों से हिन्दुओं का विस्थापन भी हुआ, जिनमें से कई आज भी रियासी जिले के तलवाड़ा में शिविरों में रहने को मजबूर हैं. कई परिवार जम्मू व अन्य स्थानों में भी रह रहे हैं. यह दर्द, हकीकत और बहादुरी आज तक जम्मू अपने सीने में दबाए हुए है.

कश्मीर में आतंकवाद बढ़ने के साथ जम्मू संभाग के कई हिस्सों डोडा, ऊधमपुर, रियासी, राजौरी और पुंछ में भी आतंकी गतिविधियों में तेजी आने लगी. शुरुआत छिटपुट वारदात से हुई. नौवें दशक में डोडा जिला (तब इसमें रामबन, बनिहाल और किश्तवाड़ शामिल थे) में आतंकवाद चरम पर पहुंच गया. डोडा में स्वामी राज काटल, सतीश भंडारी, अनिल परिहार, चंद्रकात सहित कई राष्ट्रीय लोगों की हत्याएं की गईं. यहां आतंकवाद को खत्म करने के लिए 1994 में राष्ट्रीय राइफल का हेडक्वार्टर और डेल्टा फोर्स भी बनाई गई. डोडा जिले में सक्रिय आतंकियों को खोज-खोजकर ढेर किया. वर्ष 2008 के बाद से अब यहां इक्का-दुक्का आंतकी ही सक्रिय हैं.

पुंछ के सुरनकोट में वर्ष 2003 में सेशन जज वीके फूले की तीन और लोगों के साथ हत्या कर दी थी. डेरा गली के पास आतंकियों ने घात लगाकर हमला किया था. वीके फूले राजौरी से पुंछ में अपने घर जा रहे थे. उनके साथ अंगरक्षक भी शहीद हो गए थे. यह पुंछ का वही सुरनकोट है, जहां हिलकाका क्षेत्र में आतंकियों ने अपने स्थायी अड्डे तक बना लिए थे. सेना के सर्पविनाश ऑपरेशन में 80 आतंकी मारे गए थे. आज यह क्षेत्र आतंक मुक्त है. वर्ष 2010 को राजौरी के अप्पर शहादरा में एक परिवार की बहादुरी को आज भी याद रखा जाता है. परिवार की एक बेटी रूखसाना ने निशाना बनाने आए आतंकियों में से एक को कुलहाड़ी से वार कर मार डाला था. रूखसाना को कीर्ति चक्र से नवाजा गया था.

डोडा जिला को आतंकवाद से मुक्त कराने के लिए भाजपा के दिग्गज नेता दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी, अरुण जेटली के अलावा लाल कृष्ण आडवाणी और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कई बड़े नेताओं ने संघर्ष किया. इनमें जम्मू कश्मीर के भाजपा नेता प्रो. चमन लाल गुप्ता, दया कृष्ण कोतवाल, प्रो. निर्मल सिंह सहित कई नेताओं के संघर्ष को भी कोई भूल नहीं सकता है. 1991 में जम्मू संभाग विशेषकर डोडा जिले में आतंकी वारदातें होने लगीं. उस समय भाजपा ने डोडा बचाओ आंदोलन छेड़ा. जिसमें हिस्सा लेने आए अटल बिहारी वाजपेयी ने जम्मू सचिवालय की ओर कूच करते हुए गिरफ्तारी  दी थी. क्षेत्र में आतंक प्रभावित परिवारों की सुरक्षा के लिए वाजपेयी ने जम्मू में रैली निकाली थी. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद डोडा में ग्रामीणों को हथियार देकर क्षेत्र में ग्राम सुरक्षा समितियों (वीडीसी) को मजबूत किया गया था. अब इसका नाम ग्राम सुरक्षा समूह (वीडीजी) कर दिया है.

5 जनवरी, 1996 : डोडा के बरशाला में 16 लोगों की हत्या

2 अगस्त, 1998 : भद्रवाह-चंबा में 35 डोडा जिले के लोगों की हत्या

28 जुलाई, 1998 : डोडा के शानाए ठाकरे में विवाह समारोह में 27 लोगों की हत्या

21 अप्रैल, 1998 : प्राणकोट और डाकीकोट ऊधमपुर में 26 लोगों की हत्या

19 अप्रैल 1998 : ऊधमपुर के थब गांव में 13 की हत्या

10 फरवरी 2001 : राजौरी के मोरहा सुलाही में 10 लोगों की हत्या

13, जुलाई 2001 : जम्मू के कासिम नगर में 12 महिलाओं सहित 25 की हत्या

2003 में सुरनकोट में सेशन जज सहित चार लोगों की हत्या.

दक्षिण कश्मीर के पहाड़ पार कर आतंकियों ने डोडा, किश्तवाड़ में आकर हमले शुरू किए थे. अगर समय पर डोडा में विलेज डिफेंस कमेटी नहीं बनती तो पाक अपने मंसूबों में कामयाब हो जाता. लोग आतंकियों से लड़े. आज इसका फल सबके सामने है. शेषपाल वैद, पूर्व डीजीपी

1990 के बाद रियासी और राजौरी जिलों के पहाड़ी इलाकों में आतंक का कहर टूट पड़ा था. तब पलायन कर कई लोग रियासी आ गए. अभी तलवाड़ा विस्थापित कैंप में 500 परिवार सहित करीब ऐसे डेढ़ हजार परिवार दयनीय जीवन में हैं. जगदेव सिंह, तलवाड़ा विस्थापित एक्शन कमेटी के प्रधान

डोडा की पीड़ा को कौन भूला है. उनका संगठन लगातार आतंक प्रभावितों की मदद करता रहता है. जल्द ही डोडा, रियासी के कई क्षेत्रों का दौरा किया जाएगा. सुषमा शर्मा, अध्यक्ष राष्ट्रीय मानवाधिकार सामाजिक न्याय परिषद

 

साभार – दैनिक जागरण

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