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सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की कालजयी वीरांगना ‘झलकारी बाई’

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ब्रिटिश शिविर में पहुँचने पर उसने चिल्लाकर कहा कि वो जनरल ह्यूरोज़ से मिलना चाहती है. ह्यूरोज़ और उसके सैनिक प्रसन्न थे कि न सिर्फ उन्होंने झांसी पर कब्जा कर लिया है, बल्कि जीवित रानी भी उनके कब्ज़े में है. जनरल ह्यूरोज़ (जो उसे रानी ही समझ रहा था) ने झलकारी बाई से पूछा कि उसके साथ क्या किया जाना चाहिए? तो उसने दृढ़ता के साथ कहा, मुझे फाँसी दो. एक अन्य ब्रिटिश अफसर ने कहा… “मुझे तो यह स्त्री पगली मालूम पड़ती है.” जनरल ह्यूरोज़ झलकारी का साहस और उसकी नेतृत्व क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ, और झलकारी बाई को रिहा कर दिया गया. इसके विपरीत कुछ इतिहासकार मानते हैं कि झलकारी इस युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुई.

 

“जा कर रण में ललकारी थी, वह तो झाँसी की झलकारी थी.

गोरों से लड़ना सिखा गई, है इतिहास में झलक रही,

वह भारत की ही नारी थी…                                — राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण…मातृरुपेण संस्थिता…झलकारी बाई रुपेण संस्थिता… नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: … ऋग्वेद के देवी सूक्त में मां आदिशक्ति स्वयं कहती हैं, “अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां, अहं रूद्राय धनुरा तनोमि” … अर्थात मैं ही राष्ट्र को बांधने और ऐश्वर्य देने वाली शक्ति हूँ, और मैं ही रुद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूं. हमारे तत्वदर्शी ऋषि मनीषा का उपरोक्त प्रतिपादन वस्तुत: स्त्री शक्ति की अपरिमितता का द्योतक है, जिसका स्वरुप महान् वीरांगना झलकारी बाई में आलोकित होता है. वीरांगना लक्ष्मीबाई की वीरगाथा का जब भी स्मरण करता हूँ तो जाने क्यों उनमें झांसी की महान् वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का अक्स दिखता है, वही देवीय स्वरुप, वही तीखे नैन-नक्श, वही तेज, वही स्वाभिमान, वही कर्तव्य बोध, वही मातृ बोध, वही राष्ट्र के लिए आत्मोत्सर्ग की ललक – “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी”.

“यदि भारत की 1% महिलाएं भी उसकी जैसी हो जाएं तो अंग्रेजों को सब कुछ छोड़कर यहाँ से चले जाना होगा” – जनरल ह्यूरोज – फिर आखिर क्यों महान वीरांगना झलकारी बाई को इतिहास में उचित स्थान देना तो छोड़िए वरन् उनके इतिहास तोड़- मरोड़ कर रख दिया. आखिर क्यों? वास्तविकता यह है कि पश्चिमी इतिहासकारों, वामपंथी इतिहासकारों के साथ एक दल विशेष के समर्थक जूठनखोर इतिहासकारों ने मिलकर मुगलों और अंग्रेज़ों का और उनके भारतीय समर्थकों का इतिहास में गुणगान कर पाठ्यक्रमों में शामिल किया ताकि हमारा वीरोचित इतिहास दफन हो जाए. आने वाली भावी पीढ़ियां हीन भावना से ग्रसित केवल हमारी पराजयों का इतिहास पढ़ती रहें, हमारी विजयों और वीरोचित संघर्ष का नहीं और वास्तविक भारतीय वीरांगनाओं के साथ तो दोयम दर्जे का व्यवहार हुआ… वीरांगना झलकारी बाई भी इसी षड्यंत्र का शिकार हुई हैं.

वीरांगना झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर 1830 को झांसी के पास के भोजला गाँव में एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था. झलकारी बाई के पिता का नाम सदोवर सिंह (मूलचंद कोली) और माता का नाम जमुना देवी था. जब झलकारी बाई बहुत छोटी थीं, तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी थी और उसके पिता ने उन्हें एक लड़के की तरह पाला था. उन्हें घुड़सवारी और हथियारों का प्रयोग करने में प्रशिक्षित किया गया था. उन दिनों की सामाजिक परिस्थितियों के कारण उन्हें कोई औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त नहीं हो पाई, लेकिन उन्होंने खुद को एक अच्छे योद्धा के रूप में विकसित किया था.

झलकारी बचपन से ही बहुत साहसी और दृढ़ प्रतिज्ञ बालिका थी. झलकारी घर के काम के अलावा पशुओं के रखरखाव और जंगल से लकड़ी इकट्ठा करने का काम भी करती थी. एक बार जंगल में उसकी मुठभेड़ एक तेंदुए के साथ हो गयी थी, और झलकारी ने अपनी कुल्हाड़ी से उस जानवर को मार डाला था. एक अन्य अवसर पर जब डकैतों के एक गिरोह ने गाँव के एक व्यवसायी पर हमला किया तो झलकारी ने अपनी बहादुरी से उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया था. उसकी इस बहादुरी से खुश होकर गाँव वालों ने उसका विवाह रानी लक्ष्मीबाई की सेना के एक सैनिक पूरन कोरी से करवाया, पूरन भी बहुत बहादुर था और पूरी सेना उसकी बहादुरी का लोहा मानती थी. एक बार गौरी पूजा के अवसर पर झलकारी गाँव की अन्य महिलाओं के साथ महारानी को सम्मान देने झाँसी के किले मे गयीं, वहाँ रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गयीं, क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं थीं. अन्य औरतों से झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनकर रानी लक्ष्मीबाई बहुत प्रभावित हुईं. रानी ने झलकारी को दुर्गा सेना में शामिल करने का आदेश दिया. झलकारी ने यहाँ अन्य महिलाओं के साथ बंदूक चलाना, तोप चलाना और तलवारबाजी का प्रशिक्षण लिया. यह वह समय था जब झांसी की सेना को किसी भी ब्रिटिश दुस्साहस का सामना करने के लिए मजबूत बनाया जा रहा था.

लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़पने की नीति के चलते, ब्रिटिशों ने निःसंतान लक्ष्मीबाई को उनका उत्तराधिकारी गोद लेने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि वे ऐसा करके राज्य को अपने नियंत्रण में लाना चाहते थे. हालांकि, अंग्रेजों की इस कार्रवाई के विरोध में रानी की सारी सेना, उसके सेनानायक और झांसी के लोग रानी के साथ लामबंद हो गये और उन्होंने आत्मसमर्पण करने के बजाय अंग्रेजों के ख़िलाफ़ हथियार उठाने का संकल्प लिया.

अप्रैल 1858 के दौरान, लक्ष्मीबाई ने झांसी के किले के भीतर से, अपनी सेना का नेतृत्व किया और ब्रिटिश और उनके स्थानीय सहयोगियों द्वारा किये कई हमलों को नाकाम कर दिया. रानी के सेनानायकों में से एक दूल्हेराव ने उसे धोखा दिया और किले का एक संरक्षित द्वार ब्रिटिश सेना के लिए खोल दिया. जब किले का पतन निश्चित हो गया तो रानी के सेनापतियों और झलकारी बाई ने उन्हें कुछ सैनिकों के साथ किला छोड़कर निकलने की सलाह दी. रानी अपने घोड़े पर बैठ अपने कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ झांसी से दूर निकल गईं. झलकारी बाई का पति पूरन किले की रक्षा करते हुए बलिदान हो गया, लेकिन झलकारी ने बजाय अपने पति की मृत्यु का शोक मनाने के, ब्रिटिशों को धोखा देने की एक योजना बनाई. झलकारी ने लक्ष्मीबाई की तरह कपड़े पहने और झांसी की सेना की कमान अपने हाथ में ले ली. जिसके बाद वह किले के बाहर निकल ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज़ के शिविर में उससे मिलने पहुँची.

ब्रिटिश शिविर में पहुँचने पर उसने चिल्लाकर कहा कि वो जनरल ह्यूरोज़ से मिलना चाहती है. ह्यूरोज़ और उसके सैनिक प्रसन्न थे कि न सिर्फ उन्होंने झांसी पर कब्जा कर लिया है, बल्कि जीवित रानी भी उनके कब्ज़े में है. जनरल ह्यूरोज़ (जो उसे रानी ही समझ रहा था) ने झलकारी बाई से पूछा कि उसके साथ क्या किया जाना चाहिए? तो उसने दृढ़ता के साथ कहा, मुझे फाँसी दो. एक अन्य ब्रिटिश अफसर ने कहा… “मुझे तो यह स्त्री पगली मालूम पड़ती है.” जनरल ह्यूरोज़ झलकारी का साहस और उसकी नेतृत्व क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ, और झलकारी बाई को रिहा कर दिया गया. इसके विपरीत कुछ इतिहासकार मानते हैं कि झलकारी इस युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुई.

बुंदेलखंड की एक किंवदंती है कि झलकारी के इस उत्तर से जनरल ह्यूरोज़ दंग रह गया और उसने कहा कि “यदि भारत की 1%  महिलाएं भी उसके जैसी हो जाएं तो ब्रिटिशों को जल्दी ही भारत छोड़ना होगा”. यद्किंचित यह भी इतिहास में दर्ज है कि झलकारी बाई झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में, महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापति थीं. वे लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थीं. इस कारण शत्रु को गुमराह करने के लिए वे रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं. अपने अंतिम समय में भी रानी के वेश में युद्ध करते हुए अंग्रेज़ों के हाथों पकड़ी गयीं और रानी को किले की घेराबंदी से बाहर निकलने का अवसर मिल गया. उन्होंने सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में झाँसी की रानी के साथ ब्रिटिश सेना के विरुद्ध अद्भुत वीरता से लड़ते हुए ब्रिटिश सेना के कई हमलों को विफल किया था.

बद्री नारायण अपनी पुस्तक “Women heroes and Dalit assertion in north India: culture, identity and politics” में वर्मा जी से सहमत दिखते हैं. किंवदंती के अनुसार भी जनरल ह्यूरोज झलकारी का साहस और उसकी नेतृत्व क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ, और झलकारी बाई को रिहा कर दिया था. पर कई लोग मानते हैं कि वो अंग्रेज जिन्होंने लाखों निर्दोष मनुष्यों और अनगिनत क्रांतिकारियों को कूर तरीकों से मारा था, उनसे इस मानवीयता की आशा की ही नहीं जा सकती, अतः यह केवल एक कयास मात्र लगता है.

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि उन्हें अंग्रेजों द्वारा फाँसी दे दी गई. वहीं कुछ का कहना है कि उनका अंग्रेजों की कैद में जीवन समाप्त हुआ. इसके विपरीत कुछ इतिहासकार मानते हैं कि झलकारी इस युद्ध के दौरान ही वीरगति को प्राप्त हुई जो सही मालूम पड़ता है. श्रीकृष्ण सरल ने अपनी “Indian revolutionaries: a comprehensive study, 1757-1961, Volume 1” पुस्तक में उनकी मृत्यु लड़ाई के दौरान हुई थी, ऐसा वर्णन किया है. अखिल भारतीय युवा कोली राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नरेशचन्द्र कोली के अनुसार झलकारी बाई ने वीरगति प्राप्त की.

झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जा सकती है. अनेक विद्वानों, सहित्यकारों, इतिहासकारों ने झलकारी के स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान का वर्णन किया है. 21-10-1993 से 16-05-1999 तक अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे माता प्रसाद जी ने झलकारी बाई की जीवनी की रचना की है. इसके अलावा चोखेलाल वर्मा ने उनके जीवन पर एक वृहद काव्य लिखा है, मोहनदास नैमिशराय ने उनकी जीवनी को पुस्तकाकार दिया है और भवानी शंकर विशारद ने उनके जीवन परिचय को लिपिबद्ध किया है.

झलकारी बाई का विस्तृत इतिहास भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण के प्रकाशन विभाग ने झलकारी बाई शीर्षक से ही प्रकाशित किया है. बुन्देली के सुप्रसिद्ध गीतकार महाकवि अवधेश ने झलकारी बाई शीर्षक से एक नाटक लिखकर वीरांगना झलकारी बाई की ऐतिहासिकता प्रमाणित की है.

भारत सरकार ने 22 जुलाई 2001 में झलकारी बाई के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया. अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के अंतर्गत सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की महान् वीरांगना झलकारी बाई के महान् अवदान और गौरवशाली इतिहास पर उपरोक्त मतमतांतरों के कारण उत्पन्न समस्याओं के निराकरण हेतु अन्वेषण कार्य पूर्ण हो गया है, अल्पांश प्रस्तुत है, शीघ्र ही विहंगम इतिहास प्रकाशित होकर आपके समक्ष होगा.

(लेखक श्री जानकीरमण महाविद्यालय एवं इतिहास संकलन समिति के विभागाध्यक्ष हैं.)

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