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जंगल सत्याग्रह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – 2

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जब जंगल सत्याग्रह हेतु डॉ. हेडगेवार ने छोड़ दिया था सरसंघचालक पद

डॉ. श्रीरंग गोडबोले

नमक जैसी सामान्य परंतु जीवनावश्यक वस्तु पर कर लगाने वाली ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जनसामान्य को जाग्रत करने के लिए महात्मा गांधी ने बहुत ही साधारण तरीके से आंदोलन कर संपूर्ण देश का ध्यान आकर्षित किया था. उसी जागरूकता के परिणामस्वरूप नमक भंडारण की सुविधाओं से विहीन तथा समुद्र से दूर मध्य प्रांत एवं बरार जैसे प्रांतों में भी लोगों ने नमक कानून का विरोध किया. उसी जागरूकता के कारण लोगों ने ब्रिटिश सरकार द्वारा थोपे गए दूसरे जनविरोधी कानूनों को तोड़ने का साहस दिखाया. जंगल सत्याग्रह भी उसी जागरूकता का परिणाम था. lत्कालीन बरार क्षेत्र के पुसद (वर्तमान यवतमाल जिला) से वह जंगल सत्याग्रह 10 जुलाई, 1930 को शुरू हुआ. दिनांक 7 अगस्त, 2022 को प्रकाशित इस आलेख के प्रथम भाग में विस्तार से बताया जा चुका है कि किस प्रकार सन् 1928 में वर्धा के निकट हिंगणघाट रेलवे स्टेशन पर सरकारी खजाने को लूटने का प्रयास हुआ था और उसमें जो पिस्टल इस्तेमाल हुई थी, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के एक क्रांतिकारी सहयोगी की थी. उसके कारण डॉ. हेडगेवार पर लंबे समय तक कड़ा सरकारी पहरा रहा.

इस पृष्ठभूमि के साथ डॉ. हेडगेवार और उनके विश्वस्त सहयोगी अप्पाजी जोशी ने जंगल सत्याग्रह में सहभागी होने का निर्णय किया. डॉ. हेडगेवार संघ में यंत्र मानव नहीं, बल्कि देशभक्ति के संस्कार से ओतप्रोत ऐसे स्वयंसेवक चाहते थे, जो किसी आदेश की प्रतीक्षा किए बिना ‘समाजघटक’ के रूप में देश हितार्थ किसी भी आंदोलन में सहभागी हों. उनका मूल विचार था कि संघ समाज से पृथक् नहीं है, इसलिए देश हितार्थ किसी गतिविधि में सहभागी होते समय संघ अपनी संगठनात्मक पहचान के साथ नहीं, बल्कि हिन्दू समाज के एक घटक क रूप में प्रस्तुत हो.

संघ नीति

दिनांक 20 जून, 1930 को स्वयंसेवकों के नाम जारी एक पत्र में डॉ. हेडगेवार कहते हैं, “हमेशा पूछा जाता है कि वर्तमान आंदोलन को लेकर संघ की नीति क्या है? अभी तक संघ ने ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है कि वह एक संगठन के रूप में वर्तमान आंदोलन में सहभागी होगा. व्यक्तिगत रूप से जिस किसी भी स्वयंसेवक को इसमें सहभागी होना है, वह संघचालक की अनुमति लेकर सहभागी हो सकता है. ऐसी स्थिति में उसे वही काम करना चाहिए, जो संघ कार्य पद्धति के अनुरूप हो”. (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अभिलेखागार, हेडगेवार प्रलेख, Dr. Hedgewar letters cleaned)1930/July1930 20 -7,30a).

ऐसा प्रतीत होता है कि डॉ. हेडगेवार ने इस औपचारिक घोषणा से पूर्व ही संघ स्वयंसेवकों को सविनय अवज्ञा आंदोलन में व्यक्तिगत स्तर पर सहभागी होने की छूट दे दी थी. डॉ. हेडगेवार द्वारा जंगल सत्याग्रह में सहभागी होने के निर्णय से पहले संघ के अनेक प्रमुख स्वयंसेवक सविनय अवज्ञा आंदोलन में सहभागी हो चुके थे. सविनय अवज्ञा आंदोलन को संचालित करने हेतु प्रांतीय और जनपद स्तर पर प्रमुख आंदोलनकारियों की अस्थायी समितियां कांग्रेस द्वारा बना दी गई थीं, जिन्हें ‘युद्धमंडल’ यानि ‘वार काउंसिल’ कहा जाता था.

यद्यपि चांदा (वर्तमान चंद्रपुर) में संघ कार्य दिनांक 20 अगस्त, 1927 को आरंभ हो चुका था, परंतु संघ कार्य को गति प्रदान करने की दृष्टि से डॉ. हेडगेवार का प्रथम चांदा प्रवास दिसंबर 1928 में हुआ. चांदा में युद्धमंडल की स्थापना सभा में जो प्रमुख संघ स्वयंसेवक सहभागी हुए, उनमें प्रमुख थे आबासाहब चेंडके, नारायण पांडुरंग उपाख्य नानासाहब भागवत (वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी नानासाहब के प्रपौत्र हैं), रघुनाथ सीताराम उपाख्य दादाजी देवइकर (चांदा संघचालक) और रामचंद्र राजेश्वर उपाख्य तात्याजी देशमुख (चांदा संघ कार्यवाह). चांदा युद्धमंडल के प्रथम अध्यक्ष राजेश्वर गोविंद उपाख्य बाबाजी वेखंडे आगे चलकर जंगल सत्याग्रह में डॉ. हेडगेवार की टुकड़ी में शामिल हुए थे (के.के. चौधरी, संपादक, सिविल डिसओबिडियंस मूवमेंट अप्रैल-सितंबर 1930, खंड 9, गजेटियर्स डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ महाराष्ट्र, 1990, पृष्ठ 901). दिनांक 30 जून, 1930 को चांदा में माधव श्रीहरि उपाख्य बापूजी अणे की सभा आयोजित करने में देशमुख, अण्णाजी सिरास, चेंडके आदि संघ स्वयंसेवकों की प्रमुख भूमिका थी (चौधरी, पृ. 974).

दिनांक 1 मई, 1930 को नागपुर में आयोजित एक सभा में डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे ने दहिहांडा (अकोला) से लाए गए खारे पानी से नमक बनाया और वीर सावरकर की पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ में प्रकाशित एक अंश का वाचन कर नमक पर प्रतिबंध की अवज्ञा की. इस घटना के कुछ दिन बाद तत्कालीन संघ सरकार्यवाह गोपाल मुकुंद उपाख्य बाळाजी हुद्दार ने भी नमक बनाया और वीर सावरकर की पुस्तक ‘जोसेफ मैजिनी’ की प्रस्तावना में उल्लिखित विदेशी शासन को उखाड़ फैंकने संबंधी एक अंश का वाचन किया (चौधरी, पृ. 903). इसी प्रकार दिनांक 21 मई, 1930 को आर्वी (वर्धा) में लगभग 700 लोगों के समक्ष संघ के प्रमुख स्वयंसेवक और बाद में आर्वी के संघचालक बने डॉ. मोरेश्वर गणेश आपटे ने प्रतिबंधित साहित्य का वाचन किया (चौधरी, पृ. 948). मध्य प्रांत युद्धमंडल के अध्यक्ष बैरिस्टर मोरोपंत अभ्यंकर की 2 जून, 1930 को हुई गिरफ्तारी के पश्चात् पूनमचंद रांका युद्धमंडल के अध्यक्ष बने. उस समय युद्धमंडल की पुनर्रचना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसेनापति मार्तंड परशुराम जोग को असिस्टेंट कमांडर नियुक्त किया गया (चौधरी, पृ. 946). उन्हें आगे चलकर 8 अगस्त, 1930 को युद्धमंडल में ‘स्वयंसेवक प्रमुख’ बनाया गया (चौधरी, पृष्ठ 1016).

नागपुर के जिला संघचालक लक्ष्मण वामन उपाख्य अप्पासाहब हलदे मध्यप्रांत युद्धमंडल के बारहवें अध्यक्ष बने. कारावास पूर्ण कर वे 6 मार्च, 1931 को छूटे (महाराष्ट्र, 12 मार्च 1931). हलदे जी प्रांतीय विधिमंडल के सदस्य, कांग्रेस में डिक्टेटर तथा नागपुर जिला संघचालक थे. उस समय कुछ कांग्रेस नेताओं ने चांदा में हलदे जी की उपस्थिति में ही गांधी जी से इसकी शिकायत की. तब गांधी जी ने कहा था, “मैं संघ को जानता हूं, इसलिए डॉ. हेडगेवार और हलदे के बारे में आप ऐसा न सोचें.” यह संस्मरण स्वयं हलदे जी ने डॉ. हेडगेवार के जीवनीकार पालकर जी के साथ साझा किया था (संघ अभिलेखागार, हेडगेवार प्रलेख, Nana Palkar/Hedgewar notes-22 _133). सावनेर (नागपुर) के संघचालक अधिवक्ता नारायण आंबेकर रायपुर जेल से 11 मार्च, 1931 को छूटे (महाराष्ट्र, 12 मार्च, 1931). वाशिम के अधिवक्ता शंकर उपाख्य अण्णासाहब डबीर का कारावास मुक्ति के पश्चात् 10 मार्च, 1931 को वाशिम में सम्मान किया गया (महाराष्ट्र, 15 मार्च 1931). उन्हें अगस्त 1931 में वाशिम का

संघचालक नियुक्त किया गया.

संघ की सांगठनिक व्यवस्था में परिवर्तन

सत्याग्रह हेतु जाने से पूर्व डॉ. हेडगेवार ने संघ की व्यवस्था में कुछ बदलाव किए. 20 जून, 1930 को स्वयंसेवकों के नाम जारी अपने पत्र में डॉ. हेडगेवार लिखते हैं, “वर्धा के जिलाधिकारी अप्पाजी जोशी, नागपुर के प्रमुख संघ कार्यकर्ता परमार्थ और देव, चांदा के प्रमुख संघ कार्यकर्ता वेखंडे, खरोटे एवं पालेवार, आर्वी संघचालक नानाजी देशपांडे एवं सालोडफकीर संघचालक त्र्यंबकराव देशपांडे के साथ मैं सत्याग्रह में शामिल होने के लिए बरार स्थित पुसद जा रहा हूँ. इसलिए संघ के चालकत्व का दायित्व नागपुर के सुप्रसिद्ध डॉ. परांजपे को सौंपा जाता है. अब से आगे वे संघचालक होंगे. इसलिए नागपुर में संघ संबंधी किसी भी प्रकार का पत्र व्यवहार निम्न पते पर किया जाए (वि. वि. केळकर, बी.ए. एल.एल.बी., हाइकोर्ट अधिवक्ता, इतवार दरवाजा, नागपुर सिटी). वर्धा जिलाधिकारी आप्पाजी जोशी के स्थान पर अधिवक्ता मनोहरपंत देशपांडे की नियुक्ति की जाती है. वहां पत्र व्यवहार देशपांडे, शिक्षक, न्यू इंग्लिश स्कूल हाई स्कूल, वर्धा, के पते पर किया जाए.”

इस पत्रक में डॉ. हेडगेवार की सतर्क प्रवृत्ति झलकती है. वे लिखते हैं, “उपर्युक्त पते पर पत्र व्यवहार करते समय संघचालक, कार्यवाह आदि शब्द लिखने के बजाय वही पता लिखें जो यहाँ दिया गया है.” वे आगे लिखते हैं, “इस वर्ष की ग्रीष्मकालीन कक्षाएं वृहद् स्तर पर व्यवस्थित रूप से संपन्न हुईं, शारीरिक एवं सैनिक प्रशिक्षण के साथ बौद्धिक प्रशिक्षण की कक्षाएं भी संपन्न हुईं.” यहां जो बात खास तौर पर गौर करने लायक है वह यह है कि डॉ. हेडगेवार कहीं भी यह नहीं दर्शाते कि उनकी अनुपस्थिति में संघ का क्या होगा. अपने साथियों और अपनी कार्यपद्धति पर उनके अटूट विश्वास की यह एक मिसाल है.

सरसंघचालक पद का त्याग

दिनांक 10 जुलाई, 1930 को श्री एम. एस अणे के नेतृत्व में ग्यारह सत्याग्रहियों की टुकड़ी ने पुसद के समीप जंगल में घास काटकर जंगल सत्याग्रह किया. उसके कारण श्री अणे को भारतीय दंड संहिता की धारा 379 के तहत छह माह के साधारण कारावास की सजा हुई. इसी प्रकार दूसरे दिन डॉ. मुंजे के नेतृत्व में उसी स्थान पर सत्याग्रह हुआ. डॉ. मुंजे पर 5 रुपये का अर्थदंड लगाया गया, परंतु अर्थदंड देने से इनकार करने के कारण उन्हें न्यायालय की उस दिन की कार्य समाप्ति तक न्यायालय में खड़े रहने का दंड दिया गया. स्थानीय सत्याग्रह समिति के अनुरोध पर डॉ. मुंजे ने अगले दिन यानि 12 जुलाई, को पुनः सत्याग्रह का नेतृत्व किया. इस बार उन पर 10 रुपये का अर्थदंड लगाया गया, परंतु वह दंड देने से इनकार करने पर उन्हें एक सप्ताह के कारावास का दंड दिया गया (चौधरी, पृ. 980). डॉ. हेडगेवार ने डॉ. मुंजे को संघ के गुरु पूर्णिमा उत्सव का अध्यक्ष बनाकर सम्मानपूर्वक जंगल सत्याग्रह हेतु विदाई देने का विचार किया था, परंतु उनके गिरफ्तार कर लिए जाने के कारण डॉ. लक्ष्मण वासुदेव

उपाख्य दादासाहब परांजपे को उत्सव का अध्यक्ष बनाया गया.

संघ का गुरु पूजन उत्सव डॉ. परांजपे की अध्यक्षता में दिनांक 12 जुलाई, 1930 को संपन्न हुआ. ध्वज पूजन के पश्चात् डॉ. परांजपे ने कहा, “डॉ. हेडगेवार कुछ सहयोगियों के साथ जंगल सत्याग्रह हेतु जा रहे हैं. जिन्हें सत्याग्रह में जाना है, वे जा सकते हैं. अन्य जन इस युवा संगठन के कार्यों में हाथ बंटाएं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह आंदोलन राष्ट्र को अग्रगामी बनाएगा, परंतु स्वतंत्रता के पथ की यह प्रथम सीढ़ी है. राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए समस्त जीवन समर्पित करने वाले लोगों को संगठित करना ही वास्तविक कार्य है.”

उनके भाषण के पश्चात् जब डॉ. हेडगेवार बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने कहा, “आभार प्रकट करने के बाद जब मैं बैठूंगा तो मैं संघचालक नहीं रहूंगा. डॉ. परांजपे ने संघचालक का दायित्व संभालने की स्वीकृति दी है. इसके लिए संघ की ओर से मैं उनका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ. इस आंदोलन में हम जो भी लोग भाग ले रहे हैं, सब अपनी व्यक्तिगत इच्छा से ऐसा कर रहे हैं. संघ की विचारधारा और कार्यपद्धति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ है और न ही हमारी उन पर से श्रद्धा डिगी है. देश में जितने आंदोलन चलते हैं, उनका अंतर्बाह्य ज्ञान प्राप्त करना तथा उनका उपयोग अपने कार्य के लिये कर लेना देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्नशील किसी भी संस्था का कर्तव्य है. संघ के जो लोग आज तक आंदोलन में शामिल हुए हैं या जो लोग आज जा रहे हैं, वे सब इसी हेतु से अग्रसर हुए हैं. जेल जाना आज देशभक्ति का प्रतीक बन गया है, पर जो मनुष्य दो वर्ष जेल में रहने के लिए तैयार है उसे ही यदि कहा जाए कि घर-बार से दो वर्ष की छुट्टी लेकर देश में स्वातंत्र्योन्मुख संगठन का काम करे तो कोई तैयार नहीं होता. ऐसा क्यों होना चाहिए? ऐसा लगता है कि लोग यह बात समझने के लिए तैयार नहीं हैं कि देश की स्वतंत्रता साल-छह महीने काम करने से नहीं, बल्कि वर्षानुवर्ष सतत संगठन करने से मिलेगी. जब तक हम यह मौसमी देशभक्ति नहीं छोड़ेंगे और देश के लिए मरने की सिद्धता नहीं रखेंगे और उससे भी अधिक देश की स्वतंत्रता के लिए संगठन का कार्य करते हुए जीने का निश्चय नहीं करेंगे, तब तक देश का भाग्य नहीं बदलेगा. यह वृत्ति युवकों में उत्पन्न करना तथा उनका संगठन करना ही संघ का ध्येय है” (संघ अभिलेखागार, हेडगेवार प्रलेख, Nana Palkar/Hedgewar notes-3 3_131,132).

अपनी अनुपस्थिति में संघ की सांगठनिक व्यवस्था करके और सत्याग्रह में जाने की भूमिका स्पष्ट करने के बाद डॉ. हेडगेवार सत्याग्रह हेतु जाने के लिए पूरी तरह तैयार हुए.

…..(क्रमश:)

(मूल मराठी से अजय भालेराव द्वारा अनुवादित)

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