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जंगल सत्याग्रह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – सत्याग्रही डॉ. हेडगेवार

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डॉ. श्रीरंग गोडबोले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार की स्पष्ट सोच थी कि देश के लिए जान देने वाले नहीं, बल्कि जीवन देने वाले लोग चाहिएं; देश का कल्याण कुछ समय के लिए नहीं, बल्कि स्थायी देशभक्ति से संभव है; और व्यक्ति निर्माण के कठिन तथा दीर्घकालीन मार्ग से ही राष्ट्र निर्माण होता है. ऐसी स्पष्ट धारणा वाले डॉ. हेडगेवार ने जंगल सत्याग्रह में हिस्सा लेने के लिए 12 जुलाई, 1930 को अपने संगठन का नेतृत्व त्याग दिया था.

जंगल सत्याग्रह के लिए डॉ. हेडगेवार की टुकड़ी में कुल बारह सत्याग्रही थे, जिनमें नागपुर के विठ्ठलराव देव, गोविंद सीताराम उपाख्य दादाराव परमार्थ, ‘महाराष्ट्र’ समाचार पत्र के उप-संपादक पुरुषोत्तम दिवाकर उपाख्य बाबासाहेब ढवळे, वर्धा के हरी कृष्ण उपाख्य आप्पाजी जोशी (संघ के जिलाधिकारी), रामकृष्ण भार्गव उपाख्य भैय्याजी कुंबलवार, सालोडफकीर (वर्धा) के त्र्यंबक कृष्णराव देशपांडे (संघचालक), आर्वी (वर्धा) के नारायण गोपाल उपाख्य नानाजी देशपांडे (संघचालक), आनंद अंबाडे, चांदा के राजेश्वर गोविंद उपाख्य बाबाजी वेखंडे, घरोटे, और पालेवार शामिल थे.

सत्याग्रही टुकड़ी को विदाई

डॉ. हेडगेवार के नेतृत्व में यह सत्याग्रही टुकड़ी 14 जुलाई, 1930 को नागपुर रेलवे स्टेशन से पुसद (यवतमाल जिला) के लिए निकली. स्टेशन पर लगभग 200-300 लोग उन्हें विदाई देने के लिए मौजूद थे, जिनके समक्ष डॉ. हेडगेवार ने भाषण देते हुए कहा, “वर्तमान आंदोलन ही स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई है तथा स्वतंत्रता मिल जाएगी, इस भ्रम में मत रहिये. इसके आगे असली लड़ाई लड़नी है तथा उसमें सर्वस्व की बाजी लगाकर कूदने की तैयारी करो. हम लोगों ने तथा अन्यों ने इस लड़ाई में भाग लिया, इसका कारण यही है कि हमें भरोसा है कि यह कदम हमें स्वतंत्रता के मार्ग पर आगे ले जाएगा.” इसके बाद ‘वंदे मातरम्’ उद्घोष के बीच रेलगाड़ी वर्धा के लिए रवाना हो गयी.

15 जुलाई, 1930 को यह मंडली वर्धा में थी और वहां के श्रीराम मंदिर में डॉ. हेडगेवार और उनके सहयोगियों का जोरदार स्वागत किया गया. स्थानीय लोगों द्वारा एक शोभायात्रा निकालकर उन्हें आगे की यात्रा के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचाया गया. वर्धा के बाद पुलगांव, धामणगांव इत्यादि स्थानों पर सम्मान स्वीकार करते हुए यह मंडली पुसद पहुंची. (‘केसरी’, 22 जुलाई, 1930)

बरार युद्ध मंडल के अध्यक्ष डॉ. जी.जी. भोजराज की 17 जुलाई, 1930 को हुई गिरफ्तारी के बाद उनके तथा गंगाधर बलवंत उपाख्य अण्णा साहेब पांडे हिरवेकर के अभिनंदन हेतु अधिवक्ता दामले की अध्यक्षता में यवतमाल में एक जनसभा का आयोजन किया गया. ‘अनधिकृत’ पत्र-पत्रिकाओं पर प्रतिबन्ध एवं कांग्रेस कार्यसमिति को अवैध ठहराने वाले सरकारी आदेश के निषेध का एक प्रस्ताव जनसभा में पेश किया गया. जनसभा को डॉ. हेडगेवार और अप्पाजी जोशी ने संबोधित किया. (के.के. चौधरी, संपादक, सिविल डिसओबिडियंस मूवमेंट अप्रैल-सितंबर 1930 खंड 9, गैजेटीयर्स डिपार्टमेंट, महाराष्ट्र सरकार,1990, पृ. 997)

19 जुलाई, 1930 को लक्ष्मण राव ओक की अध्यक्षता में यवतमाल में एक अन्य जनसभा का आयोजन किया गया. यहाँ यवतमाल जिला युद्ध मंडल की ओर से टी.एस. बापट ने आगे का सत्याग्रह पुसद के स्थान पर यवतमाल से चार मील की दूरी पर धामणगांव रास्ते के निकट जंगल में करने की घोषणा की. 21 जुलाई, 1930 से 21 दिन के इस सत्याग्रह की शुरुआत डॉ. हेडगेवार के हाथों हुई (चौधरी, पृष्ठ 998).

और डॉ. हेडगेवार को बंदी बना लिया गया

21 जुलाई, 1930 को यवतमाल में जंगल कानून तोड़ने के आरोप में डॉ. हेडगेवार और उनके साथ ग्यारह सत्याग्रहियों को अंग्रेज सरकार द्वारा बंदी बना लिया गया. ‘केसरी’ ने इस घटना का वर्णन 26 जुलाई, 1930 के अपने अंक में इस प्रकार किया है : “यवतमाल में 21 तारीख को अवज्ञा आंदोलन शुरू किया गया. डॉ. मुंजे के पथक में शामिल होने की तैयारी से नागपुर से पधारे डॉ. हेडगेवार, ढवळे आदि लोगों ने बारह लोगों का अपना एक स्वतंत्र पथक तैयार कर पहले दिन ही कानून भंग किया. पुसद की तुलना में यह गांव बड़ा होने के कारण यहाँ 10 से 12 हजार का जनसमूह एकत्रित हुआ. यह स्थान पुसद से 4 मील 2 फलांग की दूरी पर एक पहाड़ी की तलहटी में है. आसपास पहाड़ी और सर्वत्र हरियाली होने से ‘शस्य श्यामला’ भूमि की प्राकृतिक रमणीय छटा मनमोहक थी. पांच-पांच साल के बच्चों से लेकर 70 से 75 वर्ष के पुरुष एवं महिलाएं और अनेक स्त्रियां अपने कंधों पर नन्हें बच्चे लिए पैदल चलकर इस पावन क्षेत्र में आई. डॉ. हेडगेवार ने अपने पथक के साथ जब कानून भंग किया, तब महात्मा गांधी की जय! स्वतंत्रता देवी की जय! इत्यादि गर्जनाओं से सारा जंगल गूंज उठा!”

‘केसरी’ ने आगे लिखा, “कानून की अवज्ञा करने वाले वीरों को गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर कारागार के एक कमरे में मुकदमा चलाया गया. धारा 117 तथा धारा 279 के तहत आरोप प्रत्यारोपित कर डॉ. हेडगेवार पर को क्रमशः 6 और 3 माह यानि कुल 9 माह का सश्रम कारावास सुनाया गया. वहीँ  ग्यारह सत्याग्रहियों में प्रत्येक को धारा 379 के तहत 4 माह के सश्रम कारावास का दंड सुनाया गया. इन सभी को तुरंत अकोला कारागार ले जाया गया.”

नागपुर में प्रतिक्रिया

डॉ. हेडगेवार ने जिस दिन सत्याग्रह किया, उसी दिन शाम को संघ स्थान पर स्वयंसेवकों की एक सभा हुई. उमाकांत केशव उपाख्य बाबासाहब आपटे ने वहां एकत्रित स्वयंसेवकों के बीच एक भाषण दिया. रात्रि साढ़े दस बजे ‘महाराष्ट्र’ द्विसाप्ताहिक के कार्यालय में तार आया, जिसमें लिखा था कि डॉ. हेडगेवार को नौ महीने तथा अन्य लोगों को चार माह के सश्रम कारावास का दंड सुनाया गया है.

डॉ. हेडगेवार तथा उनकी टुकड़ी को यवतमाल में और डॉ. नारायण भास्कर खरे, पूनमचंद रांका, नीलकंठराव देशमुख विरुलकर, शंकर त्र्यंबक उपाख्य दादा धर्माधिकारी को नागपुर में गिरफ्तार करने के कारण 22 जुलाई, 1930 को नागपुर में एक बड़ी हड़ताल की गई. दोपहर में समस्त विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के छात्र जुलूस निकालकर कांग्रेस पार्क में एकत्रित होने शुरू हो गए. वहां डॉ. मुंजे की अध्यक्षता में एक जनसभा हुई, और गिरफ्तार मंडली के अभिनंदन का एवं सरकार का निषेध करने वाला प्रस्ताव पारित किया गया. दोपहर में ही चिटणवीस पार्क में भी एक अन्य निषेध जुलूस का नेतृत्व युद्धमंडल के नवीन अध्यक्ष गणपतराव टिकेकर, पी.के. साळवे, छगनलाल भारुका, ढवले, रामभाऊ रुईकर, नंदगवली, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसेनापति मार्तंडराव जोग और अनसुया बाई काले ने किया (चौधरी, पृष्ठ 994).

शाम को संघ स्थान पर डॉ. हेडगेवार और उनकी टुकड़ी का अभिनंदन करने के लिए संघ के स्वयंसेवकों सहित नागपुर के प्रतिष्ठित स्थानीय निवासियों तथा विद्यार्थियों की जनसभा हुई. संघ प्रार्थना के पश्चात सरसंघचालक डॉ. परांजपे और डॉ. मुंजे ने सभा को संबोधित किया. रात्रि में चिटणवीस पार्क में डॉ. हेडगेवार एवं पुरुषोत्तम उपाख्य बाबासाहेब ढवले की सजा का ब्यौरा दिया गया. इस सभा में संघ के शारीरिक प्रशिक्षण प्रमुख अनंत गणेश उपाख्य अण्णा सोहनी सहित 250 स्वयंसेवक उपस्थित थे. डॉ. हेडगेवार की गिरफ्तारी के बावजूद संघ के प्रतिदिन के क्रियाकलाप नहीं रुके. 23 जुलाई, 1930 से ही संघ की शाखाएं नियमित रूप से संचालित हुई और वहां दैनिक उपस्थिति 100 से अधिक होती थी.

24 जुलाई की शाम को नागपुर से मराठी प्रांत युद्धमंडल के नए अध्यक्ष गणपतराव टिकेकर के नेतृत्व में 24 सत्याग्रहियों की एक टुकड़ी तलेगांव (वर्धा) पहुंची. उसमें दो स्वयंसेवक, रामाभाउ वखरे और विठ्ठलराव गाडगे, शामिल हुए थे. भंडारा संघ के उपसंघचालक कर्मवीर पाठक ने संघ की ओर से इनका स्वागत किया और अपने भाषण में स्पष्ट करते हुए कहा, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय संस्कृति के पुनरुज्जीवन के लिए जन्म लिया है और वह अपना राजकीय ध्येय साध्य करने के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु निकली किसी भी संस्था से सहयोग करेगा” (संघ अभिलेखागार, हेडगेवार प्रलेख, 7/DSC_0236 – 239).

स्वाभिमान का रुद्रावतार

एक बंदी के रूप में यवतमाल से अकोला जाते समय जगह-जगह डॉ. हेडगेवार का सत्कार और जय-जयकार होती रही. स्टेशन पर लोगों का हुजूम लगता और डॉक्टर जी को पांच-पांच मिनट बोलने के लिए आग्रह किया जाता. गाड़ी जब दारव्हा (यवतमाल मार्ग पर एक बड़ा स्टेशन) पहुंची तो स्थानीय लोगों ने प्लेटफार्म पर मंच बनाकर उनके स्वागत की तैयारी कर रखी थी. लगभग सात सौ से हजार की संख्या में जन समुदाय वहां मौजूद था.

दारव्हा तक दरवाजे में खड़े होकर ही डॉक्टर जी स्वागत-अभिवादन स्वीकार करते रहे. दारव्हा में नीचे उतर प्लेटफार्म पर बने मंच पर उन्होंने पंद्रह-बीस मिनट का एक भाषण दिया. गाड़ी जरा ज्यादा देर रुकी थी. गार्ड, सब-इंस्पेक्टर और स्टेशन मास्टर सभी जल्दबाजी करने लगे. लोगों ने फलाहार आदि टोकरों में भरकर डिब्बे में चढ़ा दिए. दारव्हा रेलवे स्टेशन से गाड़ी छूटने पर घटित प्रसंग में डॉ. हेडगेवार के स्वाभिमान का रुद्रावतार कैसे हुआ, इसका वर्णन प्रत्यक्षदर्शी अप्पाजी जोशी ने इन शब्दों में किया : “राम सिंह हथकड़ी निकालो”, दारव्हा से गाड़ी आगे बढ़ते ही 27-28 साल के सब-इंस्पेक्टर ने अपने सिपाही से कहा.

इस पर डॉ हेडगेवार ने पूछा, “हथकड़ी किस लिए?”

“मैं क्या करूँ? डी.एस.पी. साहब की ओर से ऐसा आदेश आया है और नौकर होने के कारण मुझे उसका पालन करना होगा,” सब-इंस्पेक्टर बोला.

“डी.एस.पी. की वैसी इच्छा होती तो सत्याग्रह से अब तक (हथकड़ी) पहनाई जा सकती थी, पर आपने देखा है कि उन्होंने अब तक हथकड़ी पहनाई नहीं है,” डॉक्टर जी ने उत्तर दिया.

“पर अब ऐसी आज्ञा है,” सब-इंस्पेक्टर ने झूठ बोलते हुए कहा.

“यह कोई पहली बार कारावास नहीं है. हमने अपनी इच्छा से सत्याग्रह किया है. भाग कर जाने वालों में हम नहीं हैं. हथकड़ी पहनाने के चक्कर में मत पड़ो,” डॉक्टर जी ने कहा.

फिर भी सब-इंस्पेक्टर ने सुना नहीं और अपने सहयोगी से बोला, “रामसिंह, हथकड़ी क्यों नहीं निकालते”?

इस पर डॉक्टर जी ने कड़े शब्दों में कहा, “तुम्हें विनती रास नहीं आती, ऐसा प्रतीत होता है.” इन कड़े शब्दों से वह हड़बड़ा गया. डॉक्टर जी ने आगे कहा, “मैं कौन हूं यह तुम जानते नहीं, ऐसा लगता है. तुम हथकड़ी पहनाने पर तुले हो ऐसा जान पड़ता है. फिर मुझे भी मेरा निश्चय दिखाना होगा.”

“मतलब आप मुझे हथकड़ी पहनाने नहीं देंगे?” सब-इंस्पेक्टर बोला.

डॉ. हेडगेवार अत्यंत क्रोधित हो उठे. मैंने इतना क्रोधित उन्हें इसके पूर्व कभी नहीं देखा था. उन्होंने कहा, “पहनाओ तो कैसे पहनाते हो! ज्यादा नखरे करोगे तो तुम्हें डिब्बे से बाहर फेंक दूंगा. एक और मुकदमा सही हम पर! हम तो सत्याग्रही हैं, नौ माह की सजा होगी यह पता नहीं था. नौ की जगह अठारह माह की सजा हो जाएगी. देखता हूं कैसे हथकड़ी पहनाते हो.”

डॉ. हेडगेवार के क्रोध से वृद्ध रामसिंह और साथ के सिपाही और भी हड़बड़ा गए. यह देखते हुए अप्पाजी ने कहा, “इस प्रांत में डॉक्टर जी का क्या स्थान है, सरकार का उनके प्रति व्यवहार कैसा है? आप यहाँ नए हो, इसलिए ऐसा लगता है कि इन सब बातों की जानकारी आपको नहीं है. डी.एस.पी. ने आदेश दिया है ‘यह सब झूठ है’. जगह-जगह डॉ. हेडगेवार के अभिवादन से आप उग्र हो गये हैं, लेकिन इन चक्करों में न उलझो. अगर आप यह सोच रहे हो कि डी.एस.पी. एक मुसलमान है और उसे प्रसन्न कर साधा जा सकता है तो आपकी सोच गलत है. बेड़ियां डाल कर देखो, फिर तुम्हें डी.एस.पी. से ही बातें सुननी पड़ेंगी, तब समझ में आएगा कि डॉ. हेडगेवार और उनके संबंध कैसे हैं. हम क्या भाग कर जाने वाले हैं?” अप्पाजी की इन बातों को गंभीरता से लेते हुए साथ के सिपाहियों ने बेड़ियां न पहनाने के लिए सब-इंस्पेक्टर को समझाने का प्रयास किया.

सब-इंस्पेक्टर की अकड़ अब तक उतर चुकी थी. नीची आवाज में वह कहने लगा, “मैं गरीब आदमी. अलग-अलग स्टेशन पर आप उतरते हैं, तब आप में से कोई भाग गया तो मेरे गले में रस्सी होगी!” इस पर अप्पाजी ने कहा, “भागना ही होता तो अब तक भाग नहीं गए होते! आप चिंता न करें. हम बारह लोगों को ठीक से कारावास पहुंचाने का श्रेय आपको मिलेगा, इसका विश्वास रखो.” आखिरकार सब-इंस्पेक्टर को समझ में आ गया. वहां मची यह खलबली शांत होती दिखाई देने लगी. डॉ. हेडगेवार ने हंसते हुए पूछा, “विश्वास हुआ? समझ दिलाने का श्रेय अप्पाजी को जाना था, इसलिए मेरे बताने के बाद भी समझ नहीं आया.”

सभी लोग खुलकर हंसे और फिर डिब्बे में चढ़ाए गए फलाहार का सब-इंस्पेक्टर सहित सभी ने स्वाद चखा. रात्रि दस बजे मूर्तिजापुर से गाड़ी बदलकर सभी सत्याग्रही रात्रि साढ़े बारह बजे के आसपास अकोला पहुंचे. फिर उन्हें एक ट्रक में बैठाकर जेल पहुंचाया गया. सभी को एक ही कमरे में ठूंसा गया था (संघ अभिलेखागार, हेडगेवार पत्रक, Nana Palkar/Hedgewar notes – 5 5_115-119).

इस प्रकार अकोला कारागृह में डॉ. हेडगेवार का कारावास 14 फरवरी, 1931 को समाप्त हुआ. जंगल सत्याग्रह करने कारण डॉ. हेडगेवार जेल गए, लेकिन अन्य संघ स्वयंसेवकों की जंगल सत्याग्रह में क्या भूमिका थी, वह अगले लेख में बताया जाएगा.

(मूल मराठी से अनुदित)

क्रमशः

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