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कारसेवा – श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन

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कैलाश पाली

सैकड़ों वर्षो से श्रीराम जन्मभूमि पर कलंक का दंश झेल रहा समाज एक बार संगठित होकर ढांचे को हटाने के लिए अपना मन बना चुका था. इसका प्रारंभ 1986 से हो गया था, जब राम जन्मभूमि का ताला खुलने पर वहां श्रद्धालु जाना प्रारम्भ हो गए थे. वह अपने पूर्वजों पर मुगलों द्वारा किए गए अत्याचार देखकर क्रांति करने को आतुर थे. समाज की भावनाओं को जानकर वर्षों से जन्मभूमि के लिए संघर्ष कर रही विश्व हिन्दू परिषद ने संतों के नेतृत्व में समाज को जगाने का कार्य प्रारंभ किया. पहले राम ज्योति यात्रा, उसके बाद शिला पूजन के कार्यक्रमों में नगरीय समाज को ही नहीं, अपितु ग्रामीण समाज में भी एक भाव भर दिया कि अयोध्या में राम जन्मभूमि पर एक विशाल मंदिर बने.

समाज की भावनाओं को समझ कर भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी 25 सितंबर, 1990 को सोमनाथ गुजरात से राम रथ लेकर अयोध्या के लिए निकल पड़े और उन्होंने आह्वान किया कि 30 अक्तूबर को अयोध्या में कारसेवा करके मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेंगे. एक अपार जनसमर्थन उन्हें मिलने लगा, जहां भी राम रथ यात्रा पहुंची बड़ी संख्या में नर-नारी उसके स्वागत के लिए उमड़ पड़े. विश्व हिन्दू परिषद द्वारा जनमानस तैयार किया गया था, उसका परिणाम राम रथ यात्रा के समय देखने को मिला. प्रत्येक ढाणी, गांव, कस्बे और नगर से कारसेवक अयोध्या जाने के लिए तैयार होने लगे. गांव में हवन करके कारसेवकों को विदा किया जाने लगा.

23 अक्तूबर को मेरे गांव पाली (महेंद्रगढ़) में भी हवन किया गया. हवन में आहुति के बाद ग्रामीण कारसेवकों को ढोल-नगाड़ों के साथ गांव के बस स्टैंड तक छोड़ने आए. ऐसा तय हो गया था कि सभी कारसेवक पास के कस्बे महेंद्रगढ़ में एकत्रित होकर शाम को अयोध्या के लिए प्रस्थान करेंगे. जैसे ही गांवों से कारसेवक महेंद्रगढ़ पहुंचे, बिहार के समस्तीपुर से लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करने की सूचना समाचार माध्यमों से मिलनी शुरू हो गई. सारे समाज में एक आक्रोश का वातावरण बनने लगा. चारों तरफ लोग बिहार के मुख्यमंत्री के कृत्य पर उनकी आलोचना करने लगे. अगले दिन भारतीय जनता पार्टी के आह्वान पर भारत बंद की घोषणा कर दी गई.

विश्व हिन्दू परिषद् व अन्य हिन्दू संगठनों ने उनकी घोषणा का समर्थन किया. केन्द्र सरकार से भाजपा ने समर्थन वापिस ले लिया. कारसेवक महेंद्रगढ़ नगर में आकर एकत्रित हो चुके थे. सभी ने बैठकर फैसला लिया कि कल बंद के उपरांत शाम को अयोध्या के लिए प्रस्थान किया जाए. बंद ऐतिहासिक था, कोई भी व्यापारिक प्रतिष्ठान नहीं खुला. दिनभर लोग राम मंदिर के समर्थन में बातें करते रहे. दोपहर बाद कारसेवकों ने अयोध्या के लिए चलने का मन बनाया, परंतु साधनों के अभाव में 24 अक्तूबर को भी महेंद्रगढ़ से प्रस्थान नहीं कर सके. 25 तारीख को पुन: सभी कारसेवक कमला धर्मशाला महेंद्रगढ़ में एकत्रित हुए और वहां से योजना बनी कि दो बसें किराए पर लेकर दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंचा जाए. छोटा कस्बा होने के कारण केवल एक या दो ट्रांसपोर्टरों के पास बसें थी. एक बार उन्होंने बसें देने की हां भी भर ली थी, परंतु सरकार के दबाव के चलते ऐन वक्त पर मना कर दिया. जिसके पश्चात दो कैन्टर किराए पर लिये गए कि इनमें बैठकर दिल्ली तक का सफर तय करेंगे. परंतु उन पर भी प्रशासन की गाज गिर गई. 2:30 बजे कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने बैठकर निर्णय लिया कि 3:15 बजे आने वाली गाड़ी से दिल्ली के लिए प्रस्थान किया जाए. जय श्रीराम के नारे लगाते हुए सभी कारसेवक रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ने लगे और जगह-जगह लोग उनका अभिवादन करने लगे. गाड़ी में बैठ कर 7:30 बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंचे, दिल्ली तक के सफर में कारसेवक श्रीराम धुन बजाते हुए पहुंचे.

दिल्ली पहुंचने पर पता चला कि लखनऊ और अयोध्या जाने वाली सभी गाड़ियों को रेल विभाग ने निरस्त कर दिया है. रेलवे स्टेशन पर कारसेवकों ने अपने साथ लाया भोजन किया और फिर समाचार पत्रों को प्लेटफार्म पर बिछाकर अपना बिछोना बनाया और रात्रि दिल्ली के प्लेटफार्म पर इस आशा में बिताई कि सुबह कोई गाड़ी अवश्य लखनऊ के लिए प्रस्थान करेगी. सुबह 5:00 बजे उठकर सभी अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त हुए और रेलवे विभाग की तरफ से अनाउंसमेंट हुआ कि 8:15 पर लखनऊ के लिए गाड़ी जाएगी. विभिन्न प्रांतों से हजारों की संख्या में कारसेवक रेलवे स्टेशन पर रात भर में जुट चुके थे. सभी लखनऊ जाने को आतुर थे. एक ट्रेन होने के कारण गाड़ी में बहुत भीड़ हो गई. खचाखच भरी हुई गाड़ी 9:30 बजे दिल्ली रेलवे स्टेशन से चली. कारसेवक ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ के नारे लगाते हुए जहां से भी गुजर रहे थे, लोग उनका अभिवादन कर रहे थे. रेल विभाग जानबूझकर गाड़ी को देरी से चला रहा था. एक-एक स्टेशन पर 15 मिनट, आधा घंटा गाड़ी को रोक दिया जा रहा था. दोपहर 2:00 बजे के आस-पास गाड़ी हापुड़ के पास कचेसर रोड पहुंची. तब गाड़ी को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया. गाड़ी में सवार संतों को जबरदस्ती पुलिस वाले गाड़ी से उतार रहे थे. उनके साथ गाली-गलौज किया जा रहा था. हमारे साथ भी डब्बे में कुछ संत थे, उन्हें भी गाड़ी से उतारने की मुहिम शुरू हुई. जब उन्हें गाड़ी से उतारा जा रहा था, हमने इसका विरोध किया. हमें भी गाड़ी से नीचे उतार दिया गया. साथ में चल रहे कई राजनेता भी गाड़ी से नीचे आ गए और हंगामा शुरू हो गया. कुछ कारसेवक गाड़ी के आगे लेट गए कि जब तक सभी को गाड़ी में सवार नहीं किया जाएगा, गाड़ी को चलने नहीं दिया जाएगा. भारी संख्या में पुलिस बल वहां आ गया और कारसेवकों को कहा गया कि आप को गिरफ्तार कर लिया गया है. कुछ ट्रक लाए गए और उन में बैठने के लिए कारसेवकों को कहा गया. कारसेवकों ने उनमें बैठने से मना कर दिया और गाड़ी को भी नहीं चलने दिया गया. प्रशासन द्वारा 8 बसों का इंतजाम किया गया. तब कारसेवकों ने बस में बैठ कर अपनी गिरफ्तारी दी. बसों में कारसेवकों को भरकर गाजियाबाद लाया गया, जहां रात 11:00 बजे कारसेवकों की बसें जैसे ही पहुंची स्थानीय जनमानस व सामाजिक संगठनों ने सभी के लिए भोजन के पैकेट चाय का प्रबन्ध कर रखा था. सभी ने वहां न्यायालय परिसर में ही भोजन किया…………….क्रमशः

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