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काशी तमिल संगमम – भारत अनादिकाल से एक है

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बलबीर पुंज

19 नवंबर (शनिवार) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तरप्रदेश के वाराणसी में ‘काशी तमिल संगमम’ का शुभारंभ किया. इस दौरान उन्होंने जो कुछ कहा, वह अपने भीतर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सहेजे हुए है. प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत का स्वरूप क्या है… यह विष्णु पुराण का एक श्लोक हमें बताता है, जो कहता है – उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्. वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ अर्थात्, भारत वो जो हिमालय से हिंद महासागर तक की सभी विविधताओं और विशिष्टताओं को समेटे हुए है और उसकी हर संतान भारतीय है.”

वास्तव में, भारतीय एकता का प्रश्न एक दुखती रग है. सहस्राब्दियों से यह भूखंड सांस्कृतिक, राजनीतिक और भौगोलिक रूप से एक इकाई रहा है, जो आज चार भागों – अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और खंडित भारत में विभाजित है. खंडित भारत को फिर से तोड़ने के लिए कई षड्यंत्र और कुचक्र आज भी रचे जा रहे हैं.

देश को पुन: खंडित करने में व्यस्त समूह अक्सर तर्क देता है – ‘भारत कभी एक देश नहीं रहा’, यहां ‘भाषाएं, वेशभूषाएं, खानपान आदि अलग-अलग हैं’, इसलिए उसका एक ध्वज के नीचे रहना असंभव है. इस पृष्ठभूमि में वैचारिक कारणों से भारत-हिन्दू विरोधी वामपंथियों ने स्वाधीनता पूर्व ब्रितानियों के समक्ष अविभाजित भारत को एक दर्जन से अधिक टुकड़ों में बांटने का प्रस्ताव भी रखा था. यह नैरेटिव विशुद्ध रूप से आधारहीन और झूठा था. सांस्कृतिक भारत का स्वरूप अटक से कटक तक और कंधार से कन्याकुमारी तक था. राज्य भले ही अलग थे, किंतु उसके निवासियों को उनकी आध्यात्मिकता, बहुलतावादी सनातन संस्कृति, साझी पहचान-विरासत और मानबिंदु एक साथ जोड़े हुए थे. चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से लेकर ललितादित्य और चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक और उसके बाद के साम्राज्य में भी यह देश सांस्कृतिक रूप से एक पताका के नीचे पुष्पित और पल्लवित हो रहा था. यह ठीक है कि समुचित संचार और यातायात व्यवस्था के अभाव में सतह पर दूरदराज क्षेत्रों का आपस में संपर्क नहीं हो पाता था, किंतु उनके बीच सांस्कृतिक जुड़ाव सदैव अक्षुण्ण था. इस तथ्य को विदेशी भी समझते थे, इसलिए उनके समकालीन इतिहासकारों, लेखकों और यात्रियों ने इस भूखंड को एक ईकाई – भारत, इंडिया, हिंदुस्तान की संज्ञा दी.

जब ब्रितानी भारत आए, तब यहां भारतीयों का एक वर्ग इस्लामी शासन की शारीरिक गुलामी से जकड़ा हुआ था. फिर भी वे मानसिक रूप से उन्हें श्रेष्ठ नहीं मानते थे. गुलाम रहते हुए भी उनका स्वाभिमान और उनकी मौलिक पहचान जीवंत थी. अंग्रेज कुटिल आक्रमणकारी और चर्च की ‘व्हाइट मैन बर्डन’ मानसिकता से ग्रसित थे. अंग्रेजों ने भले ही इस्लामी आततायियों की भांति भारतीयों का खुलकर मजहबी दमन नहीं किया, किंतु उन्होंने इसके स्थान पर अपने शासन को चिरायु बनाने और 1857 जैसी क्रांति से बचने के लिए ऐसे मनगढ़ंत नैरेटिव स्थापित किए, जिससे जन्मे असंख्य रक्तबीज आज भी स्वतंत्र भारत को तोड़ने हेतु लालायित हैं. ‘दक्षिण बनाम उत्तर भारत’, ‘हिंदी/संस्कृत बनाम तमिल भाषा’ और ‘आर्य बनाम द्रविड़’ आदि ऐसे ही ब्रितानी कुटिलता से जनित नैरेटिव हैं, जिन्हें वामपंथी अपने भारत-हिन्दू विरोधी एजेंडे की पूर्ति हेतु ढोते हैं. वाराणसी में प्रधानमंत्री के उद्बोधन ने उसी झूठ के एक पक्ष को पुन: ध्वस्त किया है.

जो बात प्रधानमंत्री ने कही, उसी विचार को एक सदी से अधिक पहले गांधी जी ने अपनी ‘हिंद स्वराज्य’ (1909) पुस्तक में दूसरे शब्दों में पिरोया था. इसके अनुसार, “…अंग्रेजों ने सिखाया है कि आप एक राष्ट्र नहीं थे और एक-राष्ट्र बनने में आपको सैकड़ों वर्ष लगेंगे. यह बात बिल्कुल निराधार है. जब अंग्रेज हिंदुस्तान में नहीं थे, तब भी हम एक राष्ट्र थे, हमारे विचार एक थे, हमारा रहन-सहन एक था. …भेद तो अंग्रेजों ने बाद में हमारे बीच पैदा किए… दो अंग्रेज जितने एक नहीं, उतने हम भारतीय एक थे और एक हैं….” यह दुर्भाग्य है कि गांधी जी की विरासत के स्वघोषित उत्तराधिकारी और स्वयंभू गांधीवादी, इस शाश्वत विचार की अवहेलना करके ब्रितानी तर्कों को आगे बढ़ाते हुए भारत को ‘राष्ट्र’ नहीं, अपितु ‘राज्यों का समूह’ मानते हैं. विरोधाभास की पराकाष्ठा है कि स्वतंत्रता पूर्व, जो वामपंथी-जिहादी गांधी जी को गरियाते थकते नहीं थे, उसका एक वर्ग आज अपने एजेंडे की पूर्ति हेतु गांधी जी को अपनाने का स्वांग कर रहा है.

भारत अनादिकाल से एक राष्ट्र है, जिसमें आदि शंकराचार्य का भी महान योगदान है. उन्होंने सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु भारत के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की, जिनमें से एक तमिलनाडु स्थित रामेश्वरम (संस्कृत शब्दावली) में है. इसके अतिरिक्त, 12 प्राचीन ज्योतिर्लिंगों से दो दक्षिण भारत में स्थित हैं. हिमालयी क्षेत्र स्थित बद्रीनाथ धाम में पूजा करने का अधिकार केवल केरल के नंबूदरी ब्राह्मण को प्राप्त है, तो रामेश्वरम में उत्तर भारत के ब्राह्मण पुजारी को नियुक्त करने की परंपरा है. नेपाल स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में भी मुख्य पुजारी (भट्ट) और उनके चार सहायक दक्षिण भारत के विंध्याचल पर्वत के ब्राह्मण होते हैं.

आज मूल भारतीय वास्तुकला के जीवंत प्रतीक देश के उत्तरी हिस्से से अधिक दक्षिण क्षेत्र में प्रत्यक्ष है. तिरुमाला वेंकटेश्वर रूपी दर्जनों प्राचीन आदि दर्जनों मंदिर इसके प्रमाण हैं. उत्तर भारत के अधिकांश प्राचीन मंदिरों के भवन मात्र 200-250 वर्ष पुराने हैं. इसका कारण इस्लामी आक्रांताओं का सदियों पुराना मजहबी उन्माद है, जिसमें उन्होंने हिन्दू मंदिर-मठों को ध्वस्त करके उसके अवशेषों से ही पराजितों को अपमानित करने और उन पर अपना नियंत्रण रखने हेतु कई इस्लामी ढांचों का निर्माण किया था. वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद परिसर इसका एक प्रमाण है. अंग्रेज, इस्लामी हमलावरों से भिन्न थे. उन्होंने इस्लामियों की भांति भारत में स्थानीय भवनों को तो नहीं तोड़ा, किंतु अपनी बौद्धिक दक्षता के बल पर भारत के प्रभावशाली वर्ग को मानसिक रूप से पंगु बना दिया.

वास्तव में, राष्ट्रीय-सनातनी परंपराओं के साथ पुरातात्विक अनुसंधान भी मार्क्स-मैकॉले इतिहासकारों के उन दावों को निर्णायक रूप से ध्वस्त करते हैं, जिसमें आर्यों को विदेशी आक्रमणकारी बताकर भारतीय जनमानस को उनकी मूल जड़ों से काटने का प्रयास किया जाता है. यह स्थिति तब है, जब स्वयं संविधान निर्माता डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर इसे अपने साहित्य के माध्यम से निरस्त कर चुके थे. ऐसे ही दूषित नैरेटिव को जमींदोज करने हेतु भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईएचसीआर) 30 लेखकों की एक पुस्तक जारी करने के साथ देश के 90 विश्वविद्यालयों में व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन कर रहा है. इस दिशा में ‘काशी तमिल संगमम’ का आयोजन भी एक बड़ा प्रयास है.

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद हैं)

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