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खिलाफत आंदोलन और इसके सबक

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श्रीरंग गोडबोले

04 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा में हुए नरसंहार के बाद, गांधी ने असहयोग आंदोलन को अचानक बंद कर दिया. हालाँकि, असहयोग आंदोलन मात्र एक उपांग था, परंतु इसके कारण खिलाफत आंदोलन के वास्तविक मंतव्य छुप जाते थे.  जैसा कि स्पष्ट है कि खिलाफत आंदोलन के उद्देश्य  पूरे नहीं हुए  इसलिए यह असहयोग आंदोलन की समाप्ति के  बाद भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति में लगा रहा. खिलाफत आंदोलन के चार मूल उद्देश्य थे – तुर्की साम्राज्य की पूर्ण स्वतंत्रता, दक्षिण-पूर्व यूरोप में स्थित थ्रेस क्षेत्र की तुर्की को वापसी, स्मिर्ना (आधुनिक इज़मिर) और एशिया माइनर (आधुनिक काल के  अनातोलिया या एशियाई तुर्की) की तुर्की को वापसी  और जज़ीरत-उल-अरब (अरब प्रायद्वीप जिसमें इस्लाम के पवित्र स्थान शामिल थे) की स्वतंत्रता और सुरक्षा.

खिलाफत का अंत

मित्र राष्ट्रों और तुर्की के बीच लॉसन की संधि (24 जुलाई 1925) के अनुसार, तुर्की ने कॉन्स्टेंटिनोपल और थ्रेस की मेरिट्ज़ा लाइन तक अधिकार बनाए रखा. तुर्की ने अपना विशाल साम्राज्य तो खो दिया,  लेकिन इस संधि के द्वारा वह यूरोप के निकट पूर्व में मुख्य शक्ति के रूप में  उभरने में एक बार फिर सफल रहा. यह संधि पहले तीन उद्देश्यों को तो पूरा करती थी, परंतु इस्लामिक दृष्टिकोण से चौथा उद्देश्य सबसे अधिक महत्वपूर्ण था. इसके लिए खिलाफतवादियों ने आंदोलन जारी रखने का संकल्प लिया और यहाँ तक ​​कि आरम्भ में मुस्तफा कमाल को भी समर्थन दिया, क्योंकि उन्हें ऐसा नहीं लगता था कि वह खिलाफत को समाप्त  कर देंगे. जबकि नवगठित तुर्की गणराज्य की  दृष्टि में  खिलाफत  एक ‘विसंगतियों से भरी काल-बाह्य संस्था’ थी, जिसे मुस्तफा कमाल  तुर्की गणराज्य के लिए एक बाधा और और सतत खतरा मानते थे. उनका तर्क था कि तुर्की अब ना तो सैन्य अभियानों का व्यय वहन करने की स्थिति में है और ना ही  इस्लाम की रक्षा करने वाली  शक्ति होने का दावा करने की स्थिति में.

03 मार्च 1924 को खिलाफत की व्यवस्था की समाप्ति के साथ ही खलीफा भी पदच्युत हो गए. तुर्की राष्ट्रवादियों ने खलीफा को नीचा दिखाने और अपमानित करने के लिए जो कुछ भी किया जा सकता था. वह सब कुछ किया. कुछ ही घंटों के भीतर, शाही परिवार को तुर्की छोड़ने के लिए कहा गया. अपदस्थ खलीफा को जारी किए गए पासपोर्ट में उसे केवल श्रीमान अब्दुल-मेजिद पुत्र ‘अब्दुल अजीज’ के रूप में संबोधित किया गया और इतालवी दूतावास को सूचित किया गया कि यह एक राजनयिक वीजा भी नहीं है.

तुर्की राष्ट्रवादियों ने शुक्रवार के खुतबा से ख़लीफ़ा के नाम को निकाल बाहर किया एवं उसकी जगह गणतंत्र के लिए प्रार्थना को प्रतिस्थापित किया . निर्वासित पूर्व खलीफा को अपना शेष जीवन हैदराबाद के निज़ाम के वजीफे, भारतीय राजकुमारों और धनी लोगों तथा रेड क्रीसेंट सोसाइटी से प्राप्त दान से चलाना पड़ा.(खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया, 1919-1924, मुहम्मद नईम कुरैशी, लंदन विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया गया शोध प्रबंध, 1973, पृ. .69-271, 276).

खिलाफत आंदोलन की समाप्ति

तुर्की की घटनाओं से हतप्रभ खिलाफ़तवादियों ने अपना अभियान फिर भी जारी रखा. मौलाना आज़ाद ने यहाँ तक ​​ प्रस्तावित किया कि मुस्तफा कमाल को स्वयं को खलीफा घोषित कर देना चाहिए. जब खिलाफतवादियों को वास्तविकता का आभास हुआ, तो उनके आंतरिक विरोधाभास भी सामने आए. विवाद का एक बिंदु  सरकार से असहयोग  का भी था, विशेष रूप से विधान परिषदों में प्रवेश का विषय . मौलाना अब्दुल बारी और अजमल खान जैसे लोगों ने सेंट्रल खिलाफत कमेटी की आधिकारिक नीति और जमीयत-उल-उलमा द्वारा जारी एक फतवे के विरोध में जाकर भी  परिषदों में प्रवेश का समर्थन किया. खिलाफतवादियों के एक वर्ग को ऐसा लगा कि वे अपने कार्यक्रम कांग्रेस की अधीनस्थता में कर रहे हैं. खिलाफतवादियों के लिए, ब्रिटिश विरोधी भावना तात्कालिक  थी, जो तुर्की में घटित घटनाओं के परिणामस्वरूप थी. मौलाना अब्दुल बारी और किदवई जैसे कुछ ख़िलाफ़तवादी फरवरी 1922 के बाद अंग्रेजों के साथ मेल मिलाप के पक्षधर होने लगे , जब उन्हें लगने लगा कि अंग्रेज़ भी अब तुर्की के पक्ष में आ गए हैं. हालांकि, सभी खिलाफतवादियों को ऐसा नहीं लगा कि ब्रिटिश तुर्की की पर्याप्त सहायता कर रहे हैं.

यहां अहिंसा का सिद्धांत भी था, जिसके लिए दिखावटी प्रेम की कीमत भी चुकानी पड़ी. 1922 के बाद दंगों की बढ़ती संख्या ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के मिथक को तोड़ ही दिया. जुलाई 1924 में, दिल्ली में बकरीद पर भीषण दंगे हुए, इसी महीने नागपुर में और अगस्त में पानीपत में एक और दंगा भड़का. उसके बाद लाहौर, लखनऊ, मुरादाबाद, भागलपुर, रुड़की, आगरा, हनपुर, रामपुर, मेरठ, आबेदराबाद, पीलीभीत, शाहजहांपुर, हरदोई, कालपी, इलाहाबाद, झाँग और यहाँ तक कि निजाम के राज्य में स्थित  गुलबर्गा में भी दंगों की बाढ़ आ गई. दिसंबर 1923 में आर्य समाज के नेता और शुद्धि आन्दोलन के नायक स्वामी श्रद्धानंद की हत्या ने हिन्दुओं में आक्रोश पैदा किया.

खिलाफत के लिए एकत्र धन, जिनमें कई लाख रुपये की राशि थी, का निर्ममता से दुरूपयोग किया गया, इस तथ्य के उजागर होते ही खिलाफत के नेताओं की विश्वसनीयता को बुरी तरह से क्षति पहुँची. न केवल सेंट्रल खिलाफत कमेटी, बल्कि विभिन्न प्रांतों में भी ऐसी गंभीर दुरावस्था की शंकाएं व्याप्त हो गईं. केवल पंजाब में ही 40,000 से 50,000 रुपये के बीच का गबन किया गया. खिलाफत कोष का लगभग 16 लाख से अधिक का धन कोषाध्यक्ष के पास शेष पड़ा हुआ था, जिसे उसने अपनी निजी फर्म को दे दिया. इस सबके कारण खिलाफत कोष के लिए दानदाताओं की संख्या में भारी गिरावट आई.

खिलाफत आंदोलन के अंतिम चरण में घोटालों, राजनीतिक गुटबाजी, व्यक्तिगत विद्रुपों और सर्वाधिक खतरनाक हिन्दू-मुस्लिम मतभेदों की भरमार रही. 1929 के बाद, सेंट्रल खिलाफत कमेटी तो बनी रही, लेकिन कभी भी खिलाफत के लिए कोई सम्मेलन नहीं हुआ. इसके स्थान पर, असंतुष्ट और अव्यवस्थित खिलाफतवादी विभिन्न समूहों में बिखर गये. अंसारी, आज़ाद, डॉ महमूद, शेरवानी, किदवई, आसफ अली, अकरम खान, किचलू, डॉ आलम और खलीकुज़्ज़मान जैसे तथाकथित राष्ट्रवादी मुसलमानों ने अखिल भारतीय राष्ट्रवादी मुस्लिम सम्मेलन के रूप में बैठक करते हुए खुद को एक मुस्लिम राष्ट्रवादी पार्टी में शामिल कर लिया. अली ब्रदर्स, हसरत मोहानी और आजाद सुभानी जैसे अन्य लोगों ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर आल इंडिया मुस्लिम कॉन्फ्रेंस गठन किया. अब्दुल बारी, अजमल खान, डॉ अंसारी और अली बंधुओं जैसे कई खिलाफतवादी नेताओं का 1926 में निधन हो गया. खिलाफत आंदोलन विघटित हो गया और आखिरकार 1938 के आसपास पूरी तरह से लुप्त हो गया. और जो शेष बच गया वो मुंबई का  खिलाफत हाउस था (पूर्ववर्ती पैराग्राफ, कुरैशी, उक्त, पृ. 254-305).

खिलाफत आंदोलन का महत्व

हालांकि खिलाफत आंदोलन विफल हो गया, जो इसे होना ही था, परन्तु इसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता  है. इसके पूर्व वहाबी और फरायजी जैसे मुस्लिम पुनरुत्थानवादी आंदोलन हो चुके थे, लेकिन यह भारत के मुस्लिम समाज का किसी अखिल भारतीय संगठन के द्वारा निर्देशित पहला राष्ट्रव्यापी आंदोलन माना जा सकता है. पंजाब, सिंध और फ्रंटियर जैसे प्रांत, जो मुस्लिम राजनीति में पिछड़ रहे थे, ने इस बार बंबई, बंगाल और यू.पी. के साथ कदमताल कर नई राजनीतिक संरचनाओं  की स्थापना की.

1857 के बाद, मुस्लिम राजनीति में काफी हद तक उच्च और मध्यम वर्गों की प्रधानता थी. अब उलेमा मुस्लिम राजनीति में आगे आ गए और उन्होंने खुद को पश्चिमी शिक्षित मुस्लिम राजनेताओं के साथ जोड़ लिया. खिलाफत आंदोलन ने मुस्लिम जनता को संगठित किया. लामबंदी इतनी प्रभावी थी कि इसने गांधी को कांग्रेस के भीतर अपने नेतृत्व को मजबूत करने के लिए इसमें कूदने के लिए प्रेरित किया. खिलाफत आंदोलन ने एक अर्थ में, अन्य अनेक आंदोलनों को जन्म दिया. तंजीम (संगठन) नामक एक ऐसा आंदोलन 1923 की गर्मियों में डॉ किचलू द्वारा प्रारंभ  किया गया  जिसे सेंट्रल खिलाफत कमेटी द्वारा 1924 में अपनाया गया . डॉ किचलू  के अलावा शौकत अली भी इसके अग्रणी नेता बने.  किचलू ने जोर देकर कहा कि मुस्लिम समाज  के जीवन को प्रभावित करने वाले नए और अधिक गतिशील कार्यक्रमों पर जमीयत-उल-उलमा और सेंट्रल खिलाफत कमेटी द्वारा संयुक्त रुप से विचार किया जाना चाहिए. वे मुस्लिम जत्थों को संगठित करना चाहते थे. उनके उद्देश्यों में मस्जिदों में उनके प्राथमिक स्कूल होना, और साथ ही पाठ्य-पुस्तकें भी तैयार करना, खुतबे जारी करना, जो मस्जिदों में पढ़े जाते, नमाज़ में समय की पाबंदी लागू कराते. वे व्यवस्था खड़ी करना चाहते थे, जिसके द्वारा तकनीकी और व्यावसायिक कॉलेजों के लिए; वक़्फ़ की निगरानी और ज़कात का संग्रह: विधवाओं और अनाथों को राहत देने और मुस्लिम सहकारी समितियों और बैंकों को प्रारंभ करना था. 1919 में जमीयत-उल-उलमा हिंद का गठन किया गया था.

मुस्लिम राजनीति में खिलाफत आंदोलन का स्थायी योगदान यह था कि इसने पाकिस्तान निर्माण के लिए आधार तैयार किया. “इस्लाम पर जोर देकर, आंदोलन ने मुस्लिमों  को उनके मुस्लिम होने के प्रति जागरूक किया… हालांकि यह भावना पुरानी थी, लेकिन अब इसे अभूतपूर्व तीव्रता के साथ महसूस किया गया था, कि वे पहले मुस्लिम थे और बाद में भारतीय. यह मुस्लिम राष्ट्रवाद के लिए एक जीत थी, क्योंकि इसने एक आधार प्रदान किया, जिस पर विविध  प्रकार की एकता का निर्माण किया जा सकता था” (द मेकिंग ऑफ़ पाकिस्तान: अ स्टडी इन नेशनलिज्म , के के अजीज, चैटो एंड  विंडस, लंदन, 1967, पृ. 15).

पहली सीख – राष्ट्र से पहले इस्लाम

सामान्य रूप से मुस्लिम राजनीति और विशेष रूप से ख़िलाफ़त आंदोलन के अध्ययन से मुस्लिम मानस के कुछ विशिष्ट लक्षणों का पता चलता है. खिलाफत आंदोलन के आलोक में मुस्लिम राजनीति पर टिप्पणी करते हुए, डॉ एनी बेसेंट लिखती हैं, “……हम देखते हैं कि राजनीति में तलवार का वही पुराना मुस्लिम धर्म लोगों की भावनाओं को उकसा रहा है, हम देख रहे हैं शताब्दियों पुरानी उसी मुस्लिम मज़हब  की श्रेष्ठता का दंभ. हमने देखा कि शताब्दियों की विस्मृति के बावजूद अलगाव की यह प्राचीन भावना पुनर्जीवित हो गई है, जिसमे जज़ीरात उल अरब अर्थात अरब द्वीप के संबंध में यह दावा है कि यह मुसलमानों का पवित्र भूखंड है और इसे गैर मुस्लिम के अपवित्र पाँव गंदा न करें. हमने मुसलमान नेताओं को यह कहते सुना यदि अफ़ग़ान भारत पर आक्रमण करें तो हम अपने मज़हब को मानने वाले अफगानों की सहायता करेंगे और उन हिन्दुओं की हत्या करेंगे जो आक्रमणकारियों से से अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे. हमें यह विश्वास करने पर विवश कर दिया गया है कि मुसलमानों की पहली वफादारी मुस्लिम देशों के प्रति है अपनी मातृभूमि के प्रति नहीं. हमें यह भी मालूम हुआ है कि उनकी उत्कट इच्छा है ‘अल्लाह का साम्राज्य’ स्थापित करना न कि संसार के उस परमात्मा का जिसे अपने सभी प्राणियों से समान प्रेम है. मुसलमान नेताओं का यह मानना है कि मुसलमानों को अपने विशेष पैगम्बर के कानून का पालन करना चाहिए, और अपने  राज्य के कानूनों जिसमे वे रहते हैं को दरकिनार कर देना चाहिए. यह किसी भी राष्ट्र और उसकी नागरिक व्यवस्था के लिए घातक है. यह उन्हें बुरा नागरिक साबित करता है क्योंकि उनकी निष्ठा का केंद्र राष्ट्र से बाहर है. जब तक कि वे मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली जैसे मुस्लिम समुदाय के प्रमुख  नेताओं के विचारों से मतैक्य रखेंगे उन पर उनके सह नागरिक विश्वास नहीं करेंगे. यदि भारत स्वतंत्र हुआ तो मुस्लिम जनसँख्या वाला वह क्षेत्र जिसमे रह रहे अज्ञानी लोग उन लोगों का अनुसरण करेंगे जो पैगम्बर के नाम पर आह्वान करते हैं, तो भारत की स्वतंत्रता के लिए तत्काल खतरा पैदा हो जाएगा (द फ्यूचर ऑफ़ इंडियन पॉलिटिक्स, एनी बेसेंट, थियोसोफिकल पब्लिशिंग हाउस, अडयार, 1922, पृ. 301-303).

इस्लामवाद पर कटाक्ष करते हुए, डॉ अम्बेडकर लिखते हैं, “इस्लाम क्षेत्रीय मेल मिलाप को स्वीकार नहीं करता. इसकी बंधुता सामाजिक और धार्मिक है ….इसलिए यह अखिल-इस्लामवाद का आधार है. यही है जो  भारत में  प्रत्येक मुसलमान  को यह कहने के लिए कि वह पहले मुसलमान है तथा उसके बाद भारतीय है, प्रेरित करता है. इसी भावना के कारण भारतीय मुसलमानों ने भारत की प्रगति में  बहुत छोटी भूमिका निभाई तथा मुस्लिम देशों के लिए अपनी शक्ति व्यर्थ कर दी क्योंकि एक मुसलमान की सोच में मुस्लिम देशों का स्थान पहला है तथा भारत का स्थान दूसरा है” (डॉ.अम्बेडकर सपूर्ण वांग्मय खंड 15, पाकिस्तान या भारत का विभाजन, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर,  डॉ.अम्बेडकर प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, 2013 पृ.299-300).

दूसरी सीख– रणनीतिक गठजोड़, एकता नहीं है

अखिल-इस्लामवाद का एक प्राकृतिक आधार मुस्लिमों की अपने गैर-मुस्लिम देशवासियों के साथ किसी मुस्लिम देश के विरुद्ध एकजुट होने की अक्षमता है.

बंगला समाचारपत्र के संपादक ने 1924 में कवि डॉ. रविंद्रनाथ टैगोर का साक्षात्कार लिया .  टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा 18 अप्रैल 1924 को प्रकाशित की गई इस साक्षात्कार की रिपोर्ट में कहा गया है, “…दूसरा महत्वपूर्ण कारण, कवि के अनुसार, जो हिन्दू-मुस्लिम एकता को असंभव बना रहा था, वह था मुसलमानों की देशभक्ति, जो वो किसी एक देश के प्रति कायम नहीं रख सकते. कवि ने कहा कि उन्होंने कई मुसलमानों से नि:संकोच होकर पूछा कि यदि भारत पर कोई मुसलमान ताकत आक्रमण करती है तो क्या वे अपने हिन्दू पडोसी के साथ मिलकर अपने देश की रक्षा करेंगे? कवि को जो उत्तर मिले उससे उन्हें संतोष नहीं हुआ| उन्होंने कहा कि वे निश्चित रूप से कह सकते हैं कि श्री मोहमम्द अली जैसे व्यक्ति का यह कथन कि किसी भी परिस्थिति में कोई भी मुस्लिम किसी भी देश में रहता हो, इस्लाम धर्मावलम्बी के विरुद्ध उसका खड़ा होना असंभव है  (बाबा साहेब अम्बेडकर उक्त, पृ.276).

गांधी जैसे कांग्रेस नेताओं के लिए, हिन्दू-मुस्लिम एकता को केवल एक तथ्य के रूप में घोषित किया जाना था. जवाहरलाल नेहरू जैसे पुरुष किसी भी हिन्दू-मुस्लिम एकता में निहित समस्या के प्रति जानबूझकर आंखे मूंदे हुए थे. नेहरू के अनुसार, भारत में मुस्लिम समस्या जैसी कोई समस्या थी ही नहीं . सांप्रदायिकता केवल प्रचार था और यह ‘थोड़ी सी भी कठिनाई पेश नहीं करेगा.’ इस पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया गया था. इसने जनता को मौलिक रूप से प्रभावित नहीं किया था ‘. जैसे-जैसे ‘सामाजिक मुद्दे’ आगे आएंगे, यह मुद्दा  ‘पृष्ठभूमि में सिमटने के लिए बाध्य होगा’ (के के अज़ीज़, उक्त, पृ. 187). डॉ अंबेडकर इस प्रकार हिन्दुओं को सलाह देते हैं, “एकता के लिए लगातार और निष्ठापूर्ण प्रयास किये गए हैं और अब कुछ ओर करने को शेष नहीं है, सिवाय इसके कि एक पक्ष दूसरे के सामने आत्मसमर्पण कर दे. यदि कोई व्यक्ति जो आशावादी नहीं है और उसका आशावादी होना न्यायसंगत न हो, यह कहे कि हिन्दू-मुस्लिम एकता एक मृगतृष्णा की तरह है और एकता के विचार को छोड़ देना चाहिए तो कोई भी उसे निराशावादी या अधीर आदर्शवादी कहने का साहस नहीं कर सकता| यह हिन्दुओं पर निर्भर करता है कि तमाम दुर्भाग्यपूर्ण प्रयत्नों के बावजूद वे अब भी एकता की कोशिश करेंगे या इस कोशिश को छोड़कर एकता का कोई और आधार तलाश करेंगे (बाबा साहब अंबेडकर, उक्त, पृ.317,318 ).

तीसरी सीख – धर्म और राजनीति की एकता

क्या खिलाफत आंदोलन धार्मिक था या राजनीतिक प्रकृति का ? इस्लामी विचार में इन श्रेणियों की अविभाज्यता के कारण निर्णय करना एक समस्या है. इस्लाम में, आध्यात्मिक और लौकिक शक्तियां आपस में इतनी अधिक उलझी और परस्पर मिलीं हुई हैं और  इसीलिए  नागरिक और राजनीतिक जीवन के सभी कार्यों को कमोबेश इस्लामी सिद्धांतों द्वारा ही  विनियमित किया जाता है. सैय्यद अबुल अला मौदूदी (1903-1979), जिन्हें आधुनिक इस्लाम का सबसे व्यवस्थित विचारक कहा जाता है, कहते हैं, “इस्लाम केवल हठधर्मिता और कर्मकांडों का संग्रह नहीं है. यह पूरी जीवन पद्धति है. यह मानव जीवन के सभी क्षेत्रों के लिए ईश्वरीय मार्गदर्शन है, वे क्षेत्र निजी या सार्वजनिक, राजनैतिक या आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक, नैतिक या कानूनी और न्यायिक हो सकते हैं. इस्लाम एक सर्वव्यापी विचारधारा है… यह जीवन को समग्रता में देखता है और गतिविधि के हर क्षेत्र के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है … इस्लाम मज़हब  और राजनीति के बीच किसी भी अलगाव को स्वीकार नहीं करता है: धर्म के द्वारा प्रदान किये  गये  मार्गदर्शन द्वारा राजनीति का संचालन करना चाहता है  और राज्य को अल्लाह  के सेवक के रूप में उपयोग करने की बात कहता है. कुरान यह कहती है कि अल्लाह संप्रभु और कानून-प्रदाता है और उसके द्वारा प्रदत्त कानून को भूमि के कानून के रूप में अपनाया जाना चाहिए ”(द इस्लामिक लॉ एंड कांस्टीट्यूशन, अनु. खुर्शीद अहमद, इस्लामी पब्लिकेशन लिमिटेड, लाहौर, 1960, पृ. 1-5). जो लोग यह कहते हैं कि धर्म घर तक ही सीमित है और सार्वजनिक क्षेत्र में एक धर्मनिरपेक्ष संविधान कायम होना चाहिए, वे इस्लाम के मर्म को नहीं समझ पाए हैं.

चौथी सीख – अखिल-इस्लामवाद एक मिथक है

भारतीय खिलाफतवादी तुर्की खलीफा से प्रभावित थे. पर यह विचित्र बात है कि तुर्क जनता ने स्वयं ही अपने खलीफा की परवाह नहीं की. यहां तक ​​कि मक्का के शेरिफ ने जिसने स्वयं को पैगंबर के वंशज होने का दावा किया था ने भी तुर्की के खलीफा के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था. ऑटोमन तुर्की साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले अरब भी स्वयं के लिए “आत्मनिर्णय का अधिकार “ चाहते थे. अफ़गानिस्तान के अमीर जिनसे ख़िलाफ़तियों ने अपने उद्धार की आशा लगा रखी थी, उसने भी उन्हें धोखा दिया. जब भारतीय मुहाजिरों ने इस्लामिक स्वर्ण युग की आस में अफ़गानिस्तान में डेरा डाल लिया. 1924 की शरद ऋतु में, जब नज़्द के सुल्तान और सऊदी राजवंश के संस्थापक इब्न सऊद ने इस्लाम के पवित्र स्थानों पर नियंत्रण कर लिया और उन्होंने वहाँ पर स्थित मुस्लिम समाज द्वारा पवित्र माने जाने वाली कब्रों से सभी गुंबददार संरचनाओं को हटाने का आदेश दिया. इसने ख़िलाफ़तवादियों को खेमों में बाँट दिया, और वे इब्न सऊद द्वारा परम्पराओं के भंजन का समर्थन और विरोध करने लगे. यह अखिल-इस्लामवाद एक कोरी कल्पना थी जो खिलाफतवादियों को स्पष्ट होनी चाहिए थी. लेकिन वे इस पर पूरी तरह से चिपके रहे क्योंकि यह मज़हबी किताबों द्वारा सही ठहराया गया था. चूंकि ऐतिहासिकता मज़हबी किताबों के अधीन है, इसलिए यह माना जा सकता है कि मुस्लिम नेताओं की आने वाली पीढ़ियां भी इस कल्पना को जारी रखेंगी!

पांचवीं सीख – मुस्लिम व्यवहार-प्रतिमानों का पूर्वानुमान संभव है

मुस्लिम समाज का व्यवहार इस्लामिक मज़हबी प्रणाली पर आधारित है. यह व्यवस्था इस्लाम में सर्वमान्य मज़हबी किताब से उपजी है, इसलिए यह समय और स्थान के परिवर्तन से अछूती है. अनुभवों के आधार पर इस्लामिक व्यवहार-पैटर्न बहुत ही सहजता से अनुमान लगाये जाने योग्य है. उदाहरणार्थ इसमें याचना और अनुनय के स्थान पर जबरदस्ती और नरसंहार के लिए प्रवृत्त होना एक सामान्य  क्रिया है. इसी प्रकार से जिहाद में अत्याचार का सम्मिलित होना आवश्यक है. यदि संभावित व्यवहारों का आकलन पूर्वानुमान योग्य है, तो इनके बारे में पूर्वानुमान लगाने में सक्षम होना चाहिए और यदि संभव हो तो इससे जुड़ी हुई घटनाओं को टालना और उन्हें विफल भी करना चाहिए.

इस्लाम की इन व्यवहारों से जुड़ी व्यवस्था और व्यवहार-पद्धति के संबंध में भविष्यवाणी करने के लिए इस्लाम की मजहबी संरचना से परिचित होना चाहिए. अगर ऐसी व्यवहार संबंधी घटनाओं को इस संरचना से अलग-थलग कर देखना जारी रखा जाएगा तो अपर्याप्त और अविचारित प्रतिक्रियाएं ही सामने आएंगीं, जिनके गंभीर परिणाम होंगे.

खिलाफत आंदोलन के दौरान, हिन्दू नेता, अपने समाज को बहुत कम सुरक्षित रख पाने में सफल रहे. ऐसा लगता है कि उन्होंने इस्लामी विश्वास-प्रणाली को समझने या अपने हिन्दू अनुयायियों को शिक्षित करने का कोई प्रयास ही नहीं किया. तब से आज तक ज्यादा कुछ नहीं बदला है! अगर ख़िलाफ़त आंदोलन का समर्थन करने वाले लोग इस्लामी विश्वास और इससे जुड़ी व्यवस्थाओं को समझने का प्रयास करते, तो ख़िलाफ़तवादी हिंसा के शिकार बन हजारों लोग व्यर्थ में अपनी जान न गँवाते. खिलाफत आंदोलन को एक सदी बीत चुकी है, लेकिन इसके द्वारा दिए गए सबक़ को केवल पुनः नये संकटों की कीमत पर ही नकारा जा सकता है.

समाप्त

(लेखक ने इस्लाम, ईसाई धर्म, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धी आंदोलन और धार्मिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं)

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