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खिलाफत आंदोलन – बुलबुलों की उड़ान

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डॉ. श्रीरंग गोडबोले

कविता को अंतरतम भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति माना जाता है. लेकिन जहां कविता जो लोगों की सामूहिक चेतना को भेदती है, वह उनके मानस को भी दर्शाती है और साथ ही उनके व्यवहार को भी अभिव्यक्त करती है. बंकिम का  वंदे मातरम, मातृभूमि की प्रशंसा केवल जमीन के एक टुकड़े के रूप में नहीं करता बल्कि वास्तव उनके लिए वह दिव्य मातृभूमि है, जो अपने बच्चों द्वारा वन्दनीय है. और एक बार दिव्य माँ का यह स्वरुप लोगों के सामने प्रकट हो गया तो फिर जैसा कि श्री अरबिंदो ने कहा, “… तब तक कोई विश्राम नींद और शांति नहीं हो सकती, जब तक कि उनका मंदिर तैयार नहीं हो जाता, प्रतिमा स्थापित कर उनको हविष्य अर्पण नहीं कर दिया जाता”(ऋषि बंकिम चंद्र, कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ श्री अरबिंदो, 16 अप्रैल 1907).

किसी  समुदाय के लोगों के लिए उस देश के विषय में जहां वे निवास करते हैं, भिन्न दृष्टिकोण रखना संभव है. उनके लिए भूमि के एक टुकड़े को उनकी मां के रूप में बताना उसकी पवित्रता को दूषित करने के समान है, और इस भूमि को ईश्वरीयता प्रदान करना और इसके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना ईशनिन्दा के समतुल्य है. अपनी कविता तराना-ए-हिंदी (हिंदुस्तानियों का गान जो सारे जहाँ से अच्छा के रूप में विख्यात है) में, कवि इकबाल ने अपने निवास के देश के बारे में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, हम बुलबुलें है इसकी , ये गुलिस्तां हमारा. पक्षी पेड़ों पर लगने वाले  फलों का आनंद लेने के लिए बगीचे में जाते हैं. परन्तु निश्चित रूप से वे वहाँ रहने के लिए बाध्य नहीं हैं यदि बगीचा उजड़ जाता है; तो वे भी वहां से निकल जाते हैं! 1920 की गर्मियों में, खिलाफत आंदोलन अभी भी आगे की कार्रवाई के संबंध में अनिश्चय की स्थिति में था. मई से नवंबर 1920 तक, लगभग 60,000 बुलबुलों ने हिजरत किया क्योंकि उनका मानना था कि विधर्मी शक्तियों के कारण उनका निवास अपवित्र हो गया था. यह समझ से बाहर है कि बिना मजहबी आधार के इतने बड़े पैमाने पर अन्यत्र स्थान की ओर प्रस्थान कैसे हो सकता है?

हिजरत पर इस्लामी आदेश

कुरान स्पष्ट रूप से इस्लाम के अनुयायियों को एक ऐसी भूमि की ओर देशांतर गमन की आज्ञा देता है जहाँ वे खुद को विधर्मियों के बीच रहने के बजाय अपने विश्वास को कायम रख कर जीवनयापन कर सकते हैं. उन लोगों के लिए कहा गया है जो यह मानते हैं कि उस जगह उन पर ज़ुल्म किया गया था, फिर भी वे अन्यत्र प्रस्थान नहीं करते, (फ़रिश्ते) कहेंगे, ”क्या अल्लाह की धरती इतनी विस्तृत नहीं थी कि तुम वहाँ से पलायन नहीं कर सकते थे? उनका निवास नरक होगा, एक बुरी यात्रा का अंत”(कुरान 4.97). इससे केवल वही बच पाएंगे जो कमजोर हैं और किसी  योजना को तैयार करने में असमर्थ हैं और जिन्हें कोई रास्ता नहीं दिखाया गया है. कुरान उन लोगों को जो अन्यत्र प्रस्थान करेंगे यह आश्वासन देती है, “जो कोई भी अल्लाह के लिए के लिए पलायन करता है, उसे बहुत से घर और बहुतायत में भूमि मिलेगी, जो अल्लाह के लिए घर को छोड़ देता है, और इसमें उसे मृत्यु प्राप्त होती है  तो इसका भी प्रतिफल अल्लाह के पास निश्चित हो गया है ”(कुरान 4.100).

पैगंबर ने हिजरत को प्रोत्साहित किया, वास्तव में उन्होंने इसे स्वयं किया. अपने मिशन के पाँचवें वर्ष में, जब पैगंबर ने अपने साथियों के दुख को देखा … उन्होंने उनसे कहा: ‘यदि आप अबीसीनिया जाना चाहते थे (तो यह आपके लिए बेहतर होगा), क्योंकि यह एक मित्र देश है, वहां तब तक रहिये जब तक कि अल्लाह आपको संकट से छुटकारा नहीं दिला देता ‘(द लाइफ ऑफ मुहम्मद, ए ट्रांसलेशन ऑफ इसहाक’स सीरत रसूल अल्लाह विद इंट्रोडक्शन एंड नोट्स,  ए गिय्यूम, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1965, पृष्ठ 146). यहाँ विपत्ति और क्लेश से तात्पर्य अभी तक गैर-मुस्लिम कुरैश लोगों द्वारा ‘उत्पीड़न’ से है. सितंबर 622 में, अपने चाचा अबू तालिब की मृत्यु के बाद अपने कबीले के समर्थन अभाव के कारण, पैगंबर ने खुद मक्का से मदीना की ओर हिजरत किया. यह ध्यान दिया जा सकता है कि हिजरत कायरों का पलायन नहीं है. यह इस्लामी भूमि में इकट्ठा होने और फिर इस्लाम के लिए काफिर हो गई भूमि को पुनः प्राप्त करने के लिए युद्ध छेड़ने की रणनीति है. हिजरत और जिहाद अलग नहीं हैं. हिजरत प्रतिशोध के साथ जिहाद छेड़ने की तैयारी कर रहा है! स्पष्ट रूप से, जो लोग अपने जन्म के देश को दिव्य मातृभूमि  के रूप में देखते हैं और ऐसे लोग जिनका देश के प्रति लगाव उनके विश्वास की स्थिति पर निर्भर करता है दोनों सर्वथा भिन्न हैं. जो लोग इस सरल सत्य को समझ नहीं सकते हैं या नहीं समझ सकते, वे 1920 के हिज़रत की वास्तविकता नहीं समझ पाएंगे.

दार-उल-हर्ब के रूप में भारत

1803 के कुछ समय बाद शाह वलीउल्लाह के पुत्र शाह अब्दुल अज़ीज़ (1746-1824) ने एक फतवा (फतवा-ए-अज़ीज़ी) जारी किया कि देश पर ‘इमाम-उल-मुस्लिमीन’ के आदेश के बजाय ईसाई शासकों द्वारा शासन किया जा रहा है. अंग्रेजों के अधीन भारत के संबंध में, उनके शिष्य और दामाद अब्दुल हई (1828) द्वारा जारी मजहबी आदेश  और भी अधिक विशिष्ट था.  उनके अनुसार यह ‘शत्रु देश’ था, और उनके अनुसार यहाँ ‘हमारे पवित्र कानूनों के लिए कोई स्थान नहीं’. परन्तु दिलचस्प बात यह है कि इन्हीं अब्दुल हई ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी स्वीकार कर ली(खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया, 1919-1924, मुहम्मद नईम कुरैशी, लंदन विश्वविद्यालय को प्रस्तुत शोध प्रबंध, 1973, पृ .18; शाह अब्दुल अज़ीज़: हिज लाइफ एंड टाइम; मुशीरुल हक, इंस्टीट्यूट ऑफ इस्लामिक कल्चर, 1995, पृ. 24-26).

इस्लाम की मज़हबी सीख के अनुसार दार-उल-हर्ब में उन देशों को शामिल किया जाता है जहां धर्म उपासना संबंधी मामलों और इस्लाम के अनुयायियों और धिम्मियों (गैर-मुस्लिम जो सुरक्षा प्राप्त करने के लिए कर का भुगतान करते हैं) की सुरक्षा हेतु मुस्लिम कानून लागू नहीं होते. जब एक मुस्लिम देश एक दार-उल-हर्ब बन जाता है, तो सभी मुस्लिमों के लिए यह कर्तव्य हो जाता है कि इस दार-उल-हर्ब पर विजय प्राप्त कर पुन: दार-उल-इस्लाम में वापस लाया जाए. जब 622 में पैगंबर ने मदीना की ओर हिज़रत किया, तो वह आठ साल बाद एक विजेता के रूप में मक्का लौटे. 1920 के हिज़रत के समर्थकों ने अफगानिस्तान की ओर हिज़रत की पैरवी की, और पैगम्बर का उदाहरण सदैव उनके सामने था कि कैसे उन्होंने बल एकत्र कर मक्का को पुन: विजित कर लिया था(कुरैशी, उक्त, पृ. 119). चूंकि ब्रिटिश शासक खिलाफत को खतरे में डाल रहे थे, इसलिए खिलाफ़तवादियों के दृष्टिकोण से भारत ‘अपवित्र’ हो गया था. इस मत के मुख्य प्रवर्तक अली बंधु थे. 24 अप्रैल 1919 को वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड को लिखे एक पत्र में, उन्होंने कहा, “उन्हें (एक मुस्लिम) किसी अन्य अधिक स्वतंत्र स्थान के लिए पलायन करना चाहिए, इस निश्चय के साथ कि जब वह इस्लाम के लिए अधिक सुरक्षित हो जाएगी तो फिर वहां वापस लौटेंगे … हमारी कमजोर स्थिति को देखते हुए प्रवास हमारे लिए एकमात्र विकल्प है …”(कुरैशी, उक्त, पृ.119,120).

अफगान प्रस्ताव

चूंकि तुर्की, अरब और फारस यूरोपीय ईसाई शासन के अधीन थे, इसलिए अफगानिस्तान एकमात्र दार-उल-इस्लाम था. अन्य क्षेत्रीय दावेदारों की तरह, अफगानिस्तान भी ओटोमन साम्राज्य के विघटन के कारण पैदा हुए  खाली स्थान को भरने का सपना देखता था. 9 फरवरी 1920 को, अफगानिस्तान के अमीर अमानुल्लाह (1892-1960) ने एक भाषण दिया जिसमें कहा गया था कि वह खिलाफत के लिए अपनी जान भी देने के लिए तैयार हैं और भारत से अफगानिस्तान में आने वाले मुहाजरीन (हिजरत करने वालों) का स्वागत करेंगे. इस भाषण को भारत में व्यापक रूप से प्रचारित किया गया और इसने बड़े पैमाने पर उत्साहवर्धन किया (द हिज़रत ऑफ़ 1920 एंड अफगानिस्तान, अब्दुल अली, प्रोसीडिंग्स ऑफ़ इंडियन  हिस्ट्री कांग्रेस, वॉल्यूम 43, 1982, पृ. 726, 727). अमीर अमानुल्लाह ने मुहाजिरीन की सुविधा के लिए निम्नलिखित निज़ामनामा (अध्यादेश) जारी किया (सोर्स मटेरियल फॉर हिस्ट्री ऑफ़ फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया: खिलाफत मूवमेंट वॉल्यूम , महाराष्ट्र सरकार, 1982, पृ. 398,399).

(1) कोई भी व्यक्ति जो अफगानिस्तान में हिज़रत करने के बारे में सोचता है, उसे पेशावर या ढाका में पासपोर्ट प्राप्त करना होगा. वह जो अफगानिस्तान की धरती पर पैर रखता है, उसे ऐसे अफगान प्रजा के रूप में माना जाएगा जिसे पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे. इसके फलस्वरूप वह मुहम्मडन कानून और राज्य के आंतरिक कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य होगा.

(2) अफगानिस्तान की धरती पर प्रवेश करने वाले और अफगानिस्तान सरकार के प्रति निष्ठा की कसम खाने वाले किसी भी व्यक्ति को नीचे दी गई खेती योग्य भूमि के भूखंड दिए जाएंगे: – एक अविवाहित आदमी 6 जरीब (1 जरीब = 0.49 एकड़ या 2000 वर्गमीटर) भूमि. एक विवाहित व्यक्ति को 8 ज़रीब जमीन प्राप्त होगी. अविवाहित लड़की या किसी भी नाबालिग को जमीन का कोई भूखंड नहीं मिलेगा.

(3) इससे पहले कि उन्हें (मुहाजिरीन) आवंटित भूमि से फसलें तैयार हो जाएँ, इन व्यक्तियों को निम्नलिखित राशन मिलेगा: – एक वयस्क.. 5 सीर (काबुल का वजन मात्रक; 1 सीर = 7.066 किलोग्राम या 15.58 पाउंड); प्रति माह गेहूं का आटा; एक नाबालिग (6 वर्ष की आयु से लेकर यौवन प्राप्ति तक की अवधि) को 3 सीर गेहूँ प्रति माह दिया जाएगा.

(4) जिन व्यक्तियों को भूमि के भूखंड आवंटित किए गए हैं, उन्हें पहले वर्ष में, तकावी के रूप में, 6 सीर  गेहूं और 5 रूपये प्रति जरीब दिए जायेंगे ताकि वे इसकी जुताई भली भाँति कर सकें. नकद तकावी तीन साल के बाद तीन साल की तीन किश्तों में वापस ली जाएगी.

(5) भारतीय मुहाजिर को तीन साल की अवधि के लिए भू राजस्व के भुगतान से छूट दी जाएगी. हालाँकि, यह चौथे वर्ष में राज्य के नियमों के अनुसार वसूल किया जाएगा.

(6) अफगान सरकार से परामर्श के बिना कोई भी राजनीतिक कार्य नहीं किया जाएगा.

(7) जो लोग शिक्षित हैं, या जो लोग कला और विज्ञान को जानते हैं, और सरकार उनकी सेवाओं को राज्य के लिए आवश्यक समझती है, और यदि इसके प्रति मुहाजिर सहमति व्यक्त करते हैं, तो उन्हें सेवा में लिया जाएगा और उनकी योग्यता के अनुसार भुगतान किया जाएगा. बाकी पुरुषों को सेवा में जाने या किसी भी व्यापार या पेशे को अपनाने के लिए स्वतंत्रता होगी.

(8) भारतीय मुहाजिरीन, जब पहली बार अफगानिस्तान की धरती में प्रवेश करेंगे तो एक से दो महीने की अवधि के लिए जबल-उन-सिराज में रुकेंगे, जब तक सरकार द्वारा उन स्थानों का चयन किया जाएगा, जहां उन्हें भूमि के भूखंड उन्हें आवंटित किए जाने हैं और आवास उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में उनके लिए ऐसे आवास बनाये जा सके.

25 अप्रैल, 1920 को दिल्ली में आयोजित खिलाफत कार्यकर्ता सम्मेलन में अफगान प्रस्ताव का स्वागत किया गया. हिज़रत किया जाए अथवा नहीं इस विषय पर उलेमा विभाजित थे. हिज़रत की वकालत करने वाले एक प्रमुख खिलाफतवादी, कांग्रेस के ‘परमप्रिय राष्ट्रवादी ’मौलाना आजाद थे.

हिज़रत के चैंपियन मौलाना आज़ाद

खिलाफत आंदोलन में मौलाना आज़ाद का योगदान मुख्य रूप से वैचारिक था. 28-29 फरवरी 1920 को कलकत्ता खिलाफत सम्मेलन में उनके भाषण ने खिलाफत आंदोलन की धार्मिक व्याख्या इस्लामी मजहबी सिद्धांतो के आधार पर की. उनका ग्रंथ मसाला-ए-खिलाफत-वा-जज़ीरत-अल-अरब (ख़िलाफ़त और इस्लाम के पवित्र स्थान) खिलाफ़त पर भारतीय मुसलमानों के विचारों को सारांशित करने वाला प्रमुख इस्लामी दस्तावेज़ था. 25 मार्च 1920 को, मौलाना आज़ाद ने तर्क दिया था कि हिजरत संभव नहीं है,  क्योंकि मुसलमानों के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी. परन्तु फिर उन्होंने एक गंभीर मोड़ लिया और तथाकथित ‘हिजरत का फतवा’ लिखा जो 30 जुलाई 1920 को अमृतसर के उर्दू दैनिक अहल-ए-हदीस में प्रकाशित हुआ था. यह सलाह उन लोगों के लिए थी जो ‘सही राह’ पर चलना चाहते थे और या तो उनके सपर्क में थे या हिज़रत के समर्थक उलेमा से मार्गदर्शन चाहते थे.

अपने फतवे में, आजाद ने कहा, “शरीयत के सभी प्रावधानों, समसामयिक घटनाओं, मुसलमानों के हितों, और फायदे और नुकसान(राजनीतिक मुद्दों के) को ध्यान में रखने के बाद, मैं संतुष्ट महसूस करता हूँ… भारत के मुसलमानों के पास भारत से पलायन करने के अलावा कोई मार्ग नहीं है… जो लोग तुरंत नहीं जा सकते हैं उन्हें प्रवासियों (मुहाजिरीन) की मदद करनी चाहिए.” जो लोग भारत में बने रहे, उन्हें “इस्लाम के दुश्मन” के रूप में जाने जाने वाले निकायों के साथ कोई सहयोग या संबंध रखने की अनुमति नहीं थी, और जो ऐसा करने में विफल रहता है, पवित्र कुरान के अनुसार वह भी “इस्लाम के दुश्मन” के रूप में गिना जाता. आजाद ने कहा कि उनकी राय राजनीतिक आधार पर बिल्कुल भी नहीं थी.

आज़ाद का उद्देश्य (सांसारिक उद्देश्य) कॉन्स्टेंटिनोपल को बचाने का नहीं था बल्कि  मुस्लिम विश्वास को बचाना था. हिज़रत के बारे में उसका एकमात्र संदेह उसके कार्यकरण और आचरण के बारे में था. उनके अनुसार इसे ‘संगठित रूप में किया जाना चाहिए, न कि बेतरतीब ढंग से.’ उनकी अन्य विशिष्टता यह थी कि वे वास्तव में पलायन करने से पहले प्रवास की शपथ लेना आवश्यक समझते थे. फिर भी, इस अभियान के उत्तरार्ध में, जब वह अपनी सीमाओं और खतरों को देख पा रहे थे, तब भी  वह अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग और सच्चे बने रहे, और केवल व्यावहारिक आधारों पर कुछ मामूली छूटें ही प्रदान कीं(हिजरत: द फ्लाइट ऑफ द फेथफुल ए ब्रिटिश फाइल ऑन द एज़ ऑफ मुस्लिम पीजेंट्स फ्रॉम नॉर्थ इंडिया टू अफगानिस्तान इन 1920, डिट्रीच रीट्ज़, वर्ल. डास अरबिस्क बुच, बर्लिन, 1995, पृ. 35, 36).

हिजरत की तैयारी

लगता है कि ख़िलाफ़त समिति हिज़रत अभियान का मुख्य संगठनात्मक आधार रही. एक केंद्रीय हिज़रत कार्यालय खोला गया जिसकी शाखाएं पूरे भारत खोली गई थीं.  और इनसे एक व्यापक-आधार वाला प्रचार अभियान शुरू किया गया. स्थानीय हिजरत समितियां पूरे भारत में और विशेष रूप से सीमांत प्रांत में फैली हुई थीं. पेशावर समिति ने हिजरत की तैयारियों की जिम्मेदारी उठाई और इसे अंजुमन-ए-मुहाजिरिन-ए-इस्लाम सुबाह सरहदी के नाम से जाना जाता था(ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक इमिग्रेंट्स ऑफ फ्रंटियर प्रोविंस; डायट्रिच रीट्ज, उक्त, पृ. 44, 45). हिजरत को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य के लिए मस्जिदों का अक्सर उपयोग किया जाता था. मौलवी मस्जिद के मिम्बर से उपदेश देते कि जो मुस्लिम पलायन नहीं करेंगे वे काफिर बन जाएंगे. लेखकों ने गद्य और कविता के माध्यम से लोकप्रिय भावनाओं को उभारा. अफगानिस्तान में लुभावने जीवन की संभावनाओं को प्रकाशित किया. लोगों को उस गर्मजोशी से भरे स्वागत की कहानियां सुनाई गईं, जो मुहाजिरीन का इंतजार कर रहा था (कुरैशी, उक्त, पृ. 125, 126).

आस्थावानों की भेड़चाल

अभियान की शुरुआत के लिए एक प्रतीकात्मक इशारा किया गया था. उर्दू-पत्र ज़मींदार ने 7 मई 1920 को घोषणा की कि 1338 लोग अफगानिस्तान में आगे बढ़ने के लिए तैयार थे, यह संख्या उस वर्ष चलने वाला मुस्लिम हिजरी वर्ष भी थी. हालांकि कुछ उत्साही लोगों ने गुप्त रूप से सीमा पार करना शुरू कर दिया था. एक संगठित पलायन के रूप में हिज़रत 15 मई 1920 को शुरू हुआ- जिस दिन भारत में तुर्की के साथ शांति की शर्तें प्रकाशित हुई थीं, जब कुछ अतिउत्साहित मुहाजिरों का  पहला  क़ाफ़िला बहुत खुशी और सफलता के साथ काबुल की सीमा को पार कर गया.

शुरुआत में, हिजरत ने धीरे-धीरे उड़ान भरी. इसका एक कारण यह भी था कि सेंट्रल खिलाफत कमेटी और जमीयत-उल-उलमा असहयोग आन्दोलन के प्रस्तावित उद्घाटन के प्रति सशंकित थे. इसके अलावा हिज़रत को अजमल खान, सैफुद्दीन किचलू, जिन्ना, इकबाल जैसे प्रमुख खिलाफतवादियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा था, जो ईमानदारी से मानते थे कि यह कदम समुदाय के सर्वोत्तम हित में नहीं था (कुरैशी, उक्त, पृ. 126).

उत्तर पश्चिम सीमान्त में आने वाले प्रवासियों के पहले जत्थे में 53 लोग शामिल थे, जिन्होंने 15 मई 1920 को सप्ताहांत के दौरान प्रसिद्ध खैबर दर्रे को पार किया था. अपने चरम के दौरान(जुलाई 1920) अभियान उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत तक सीमित रहा था जहाँ से कुल प्रवासियों की संख्या के लगभग 85 फीसदी प्रवासियों ने अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश किया, जबकि लगभग 10 प्रतिशत पंजाब से और दूसरा 5 प्रतिशत हिस्सा सिंध से आया. मुहाजिरीन की संख्या के उच्चतम आकलन के अनुसार 50,000 से अधिक लोग अफगानिस्तान में प्रवेश कर गए थे(डीट्रिच रीट्ज, उक्त, पृ. 52). अफगानों द्वारा अनुमानित 40,000 मुहाजिरीन के प्रवेश के बाद जब अमीर ने हिजरत को निलंबित करने की घोषणा की, उसके बाद भी 7000 से अधिक लोग अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश कर गए. इसके अलावा, कुछ छोटे दल सितंबर 1920 के अंत तक खोस्त के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान चले गए थे और बड़ी संख्या में मुहाजिरीन खैबर दर्रे के अलावा अन्य मार्गों से भी अफगानिस्तान गए थे. इस प्रकार इस हिज़रत में शामिल लोगों की कुल संख्या पचास और साठ हजार के बीच अनुमानित की जा सकती है (कुरैशी, उक्त, पृ. 148). दो कारक अंग्रेजों के लिए चिंताजनक थे. जब पूरे गाँव खाली कर दिए गए थे, और इनके निवासियों की  जमीन और संपत्ति को बड़े पैमाने पर जल्दबाजी में बेचा गया  जिसके कारण कीमतें गिर गईं. दूसरा पहलू जिसने ब्रिटिश अधिकारियों को चिंतित किया, वह था पुलिस अधिकारियों और सेना पर हिजरत का बढ़ता प्रभाव. अगस्त की शुरुआत में, हिज़रत के लिए जाने वाले मुस्लिम सैनिकों की संख्या अधिकारियों से युक्त एक पूरी कंपनी के बराबर थी (डीट्रिच रीत्ज़, उक्त, पृ. 53, 54, कुरैशी, उक्त, पृ. 132).

अखिल- इस्लामवाद का बुलबुला

मुहाजिरीन को भारत के गर्मियों के मौसम की कड़ी गर्मी में बंजर पहाड़ी इलाकों से गुजरना पड़ा जहाँ भोजन और पानी दुर्लभ थे. एक बार जब वे भारतीय क्षेत्र से बाहर निकल गए, तो उनकी यात्रा एक दु:स्वप्न में बदल गई. अमीर के वादों के बावजूद, वास्तविकता में बहुत कम कार्य किया गया था. मुहाजिरीन को अमीर के अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किया गया था, जिन्होंने उन्हें पीटा और पैरों तले रौंदा. उनके अपनाए गए देश के लोगों के हाथों भी कठोर और निर्दयतापूर्ण व्यवहार किया गया. उनकी महिलाओं को बेइज्जत किया गया. बताया जाता है इस सबके कारण मुहाजिरीन उन लोगों के प्रति जिन्होंने उन्हें हिज़रत के लिए प्रेरित किया था, इतनी नफरत  से भर गये  कि उन्होंने कसमे खाईं कि अपने घरों को वापस लौटने पर  उन  मुल्लाओं को गोली मार देंगे. सीमान्त से काबुल तक की सड़क मुहाजिरीन की कब्रों से पट गई थी. चश्मदीदों के मुताबिक, खैबर दर्रे में लाशों के ढेर लगे हुए थे (डीट्रिच रीट्ज़, उक्त, पृ. 69). अगस्त 1920 के दौरान, काबुल की सड़कों पर भीड़भाड़ थी और सर्दी आ रही थी. अफगानिस्तान सर्दियों में केवल 40,000 मुहाजिरिन को समायोजित कर सकता था . 12 अगस्त 1920 को, अमीर ने हिजरत को स्थगित कर दिया. ऐसी खबरें थीं कि अफ़गान बंदूक और संगीन के बल पर मुहाजिरीन को वापस लौटा रहे थे (कुरैशी, उक्त, पृ. 141).

निराश होकर मुहाजिरीन भारत में वापस आना चाहते थे. लेकिन इससे पहले, खोस्त क्षेत्र के अफ़गानों के एक समूह ने मुहाजिरीन की लगातार बढ़ती हुई संख्या के दबाव के चलते अपनी ही भूमि से भागने का प्रयास किया और एक तरह से ‘उल्टी हिज़रत’ करते हुए भारतीय पक्ष में आ गए. वे मुहाजिरीनो के लिए अपनी ही भूमि से वंचित कर दिए गए थे. खोस्त क्षेत्र में परेशानी बढ़ रही थी जहाँ आने वाले प्रवासियों और स्थानीय आबादी दोनों में गहरा असंतोष था (डीट्रिच रीट्ज़, उक्त, पृ. 70). लगभग पचहत्तर प्रतिशत भारतीय मुहाजिरिन भारत लौट आए (कुरैशी, उक्त, पृ. 146).

हिजरत आंदोलन, जैसा कि अनुमान लगाया गया था, उसके विपरीत अखिल-इस्लामवाद की अवधारणा पर विश्वास करवा पाने में विफल रहा. एक बार जब अफगानों ने हिजरत के दुष्प्रभावों को महसूस करना शुरू कर दिया, तो उन्होंने इसे निलंबित कर दिया और अपने मुस्लिम भाइयों को और उनकी महिलाओं को बेईज्जत करने के बाद वापस कर दिया. जिन बुलबुलों ने अपने ही बगीचे को उजाड़ दिया था, उन्हें पता चल गया था कि दूसरी तरफ की घास निश्चित रूप से हरी नहीं थी!…………….क्रमश:..

(लेखक ने इस्लाम, ईसाई धर्म, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धी आंदोलन और धार्मिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं)

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