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महाराष्ट्र सरकार ने वापस लिया कोबाड गांधी की पुस्तक ‘फ्रैक्चर्ड फ्रीडम’ का पुरस्कार

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6 दिसंबर, 2022 को महाराष्ट्र सरकार ने यशवंतराव चव्हाण राज्य साहित्य पुरस्कारों के तहत दिए जाने वाले विभिन्न साहित्यिक पुरस्कारों की घोषणा की थी, जिसमें प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पूर्व पोलित ब्यूरो सदस्य कोबाड गांधी की पुस्तक ‘फ्रैक्चर्ड फ्रीडम’ को अनुवाद श्रेणी में पुरस्कार घोषित किया गया था. हालांकि, अब 12 दिसंबर 2022 को महाराष्ट्र सरकार ने घोषणा की है कि उक्त पुस्तक को प्रदत्त पुरस्कार वापस लिया जा रहा है. साथ ही अब इस पुरस्कार का नाम 20वीं सदी के मराठी साहित्य समीक्षक तारकतीर्थ लक्ष्मणशास्त्री जोशी के नाम पर रखा गया है.

इसी के साथ सरकार ने पुरस्कार के लिए उस समिति को भी खारिज कर दिया है, जिसने इस पुस्तक को पुरस्कृत करने का सुझाव दिया था. इस सन्दर्भ में सरकारी प्रस्ताव में कहा गया है कि “चयन समिति के निर्णय को प्रशासनिक कारणों से उलट दिया गया है और पुरस्कार, जिसमें एक लाख रुपये का नकद पुरस्कार शामिल था, वापस ले लिया गया है. साथ ही पुस्तक की अनुशंसा करने वाली समिति को भी रद्द कर दिया गया है.”

इस निर्णय की घोषणा करते हुए, महाराष्ट्र के मराठी भाषा विभाग के मंत्री दीपक केसरकर ने कहा कि “हर किसी को विचार की स्वतंत्रता है. फिर भी नक्सली विचारों का उभार हमारी सरकार को मंजूर नहीं है. हमारे लिए देश सबसे पहले है.” दीपक केसरकर ने इस मामले की जांच के भी आदेश दिए हैं.

उन्होंने कहा कि “साहित्य लेखन की स्वतंत्रता है. लेकिन जो प्रतिबंधित है, वह लिखा नहीं जा सकता. ‘फ्रैक्चर्ड फ्रीडम’ किताब पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन राज्य में नक्सलवाद का महिमामंडन नहीं किया जा सकता है. महाराष्ट्र नक्सलवाद पर नकेल कसने वाला पहला राज्य है.

“नक्सलियों में 100 प्रतिशत भर्ती हमारे जनजातीय (आदिवासी) भाइयों से हो रही थी, जो अब लगभग बंद हो गई है. ऐसे में नक्सलियों के पक्ष में लिखे जाने वाले साहित्य को समाज क्षमा नहीं कर सकता. शहरी नक्सलवादी (अर्बन नक्सल्स) ऐसे साहित्य लिखते और इसके प्रसार प्रचार में भाग लेते हैं, यह दिखावा करते हुए कि “हम दुनिया से कुछ अलग कर रहे हैं, इसे अनुमति नहीं दी जा सकती. किसी भी परिस्थिति में राज्य सरकार द्वारा नक्सलवाद का महिमामंडन नहीं किया जा सकता है.”

महाराष्ट्र सरकार के निर्णय पर कुछ तथाकथित प्रगतिशील मराठी लेखक आक्रोश प्रदर्शित कर रहे हैं. जानकारी है कि पुरस्कार वापस लिए जाने के तुरंत बाद, मराठी साहित्यिकारों में ‘पुरस्कार वापसी’ गिरोह अति सक्रिय हो गया और विभिन्न अन्य लेखकों ने अपने पुरस्कार राज्य सरकार को लौटाने और साहित्य से संबंधित समितियों पर जिम्मेदारी के विभिन्न पदों से त्यागपत्र देने का क्रम शुरू कर दिया है.

इस क्रम में 2015 में महाराष्ट्र में पुरस्कार वापसी अभियान का नेतृत्व करने वाली लेखिका और कवयित्री प्रज्ञा दया पवार (जिन्हें वर्ष 2021 में महाविकास अघाड़ी सरकार के दौरान महाराष्ट्र राज्य साहित्य संस्कृति महामंडल का सदस्य नियुक्त किया गया था) ने भी अवार्ड को वापस लिए जाने का विरोध करते हुए पद से त्यागपत्र दे दिया है. वहीं कवि नीरजा को भी उसी निकाय के सदस्य के रूप में नामित किया गया था, उन्होंने भी सरकार के फैसले का विरोध करते हुए त्यागपत्र दिया है.

यह सारा विवाद पूर्व माओवादी कोबाड गन्धी से जुड़ा हुआ है, प्रतिबंधित माओवादी संगठन में शामिल होने से पहले कोबाड ने कुछ समय के लिए एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में एक योग्य वित्त पेशेवर के रूप में काम किया था. जिसके उपरांत वर्ष 1981 में कोबाड तत्कालीन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पीपुल्स वार में केंद्रीय समिति के सदस्य के रूप शामिल हो गए थे.

सितंबर 2004 में हुए पीपुल्स वार और एमसीसीआई (माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया) के विलय में कोबाड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसी विलय से वर्तमान में माओवादियों के सबसे अग्रणी संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई (माओवादी) का गठन किया गया था. कोबाड भाकपा (माओवादी) के शिर्ष विचारकों में से एक रहे और उन पर 2005 में नेपाली माओवादी नेता प्रचंड के साथ एक बैठक में भाग लेने का भी आरोप है.

कोबाड को सितंबर 2009 में दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था. पोलित ब्यूरो सदस्य के रूप में, उन पर 2008 में विशाखापत्तनम के गुनुरकयी गांव में माओवादी विरोधी कमांडो यूनिट ग्रेहाउंड्स की एक टीम पर हमले सहित आतंकवादी हमले करने का आरोप लगाया गया था, जिसके आधार पर न्यायालय ने उन्हें दोषी भी ठहराया था.

कोबाड ने अपनी सजा का बड़ा हिस्सा विशाखापत्तनम सेंट्रल जेल में बिताया था. जहां जेल में रहते हुए उन्होंने ‘फ्रैक्चर्ड फ्रीडम’ शीर्षक से अपने संस्मरण लिखे. यह पुस्तक 2021 में प्रकाशित हुई थी, जिसके प्रकाशित होने के बाद भाकपा-माओवादी संगठन ने उन्हें देशद्रोही ठहराया था.

इस संदर्भ में प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) ने अपने पोलित ब्यूरो सदस्य और केंद्रीय समिति के पूर्व सदस्य कोबाड गांधी को संगठन से निष्कासित करते हुए 27 नवंबर, 2021 को सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता अभय के हवाले से एक बयान जारी किया था. जिसमें गांधी पर अध्यात्मवाद के मार्ग का समर्थन करने, मार्क्सवाद को अच्छे मूल्यों के रूप में नकारने और माओवादी विचारधारा को छोड़ने का आरोप लगाया गया था. भाकपा (माओवादी) ने उन पर ‘फ्रैक्चर्ड फ्रीडम- ए प्रिज़न मेमॉयर’ पुस्तक में पूरे आंदोलन को खराब रोशनी में पेश करने का आरोप लगाते हुए उन्हें संगठन से निष्कासित किया था.

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