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स्वाधीनता का अमृत महोत्सव – विंध्य के अमर बलिदानी ‘मथानी लोहार’..!

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सन् अठारह सौ सत्तावन की क्रांति में आधिकारिक (गजेटियर व अन्य सरकारी दस्तावेजों के अनुसार) तौर पर विंध्य क्षेत्र से रणमत सिंह, श्यामशाह के बाद एक नाम जो प्रमुखता के साथ सामने आता है, वह है ..मथानी लोहार का. क्या कोई अमर बलिदानी मथानी लोहार के गाँव व उनके वंशजों के बारे में कुछ जानता है..?

यह ध्यान आया विंध्य प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष रहे शिवानंद जी के सुपुत्र व मेरे अग्रजतुल्य डॉ. पीएन श्रीवास्तव की एक पोस्ट से. डॉ. साहब ने 1955 में तत्कालीन सरकार द्वारा विंध्यप्रदेश के क्रांतिकारियों की जारी की गई सूची की प्रतिलिपि पोस्ट की है.

सन् सत्तावन की क्रांति में आरा (बिहार) से कुँवर सिंह ने कूच किया. क्रांतिकारियों के अगुआ नाना साहब ने रीमा राजा रघुराज सिंह को अँग्रेजों के खिलाफ मदद देने के लिए मार्मिक पत्र लिखा था. (रीवा स्टेट गजेटियर में नानासाहेब का पत्र व रघुराज सिंह का जवाब दोनों ही विस्तृत रूप में उल्लिखित है).

तब अंग्रेजों के पक्के गुलाम बन चुके और अपनी ‘कामलीला’ के लिए सरनाम रघुराज सिंह ने नाना साहब को जवाबी पत्र लिखा कि यदि कोई बागी (क्रांतिकारी) राज्य की सीमा में घुसेगा तो उसके साथ दुश्मनों जैसा सलूक किया जाएगा (यह धमकी भी रीवा स्टेट गजेटियर में उल्लिखित है).

सूबेदारों व कारिंदों को क्रांतिकारियों से निपटने का हुक्म दे कर रघुराज सिंह अपनी सोलह रानियों व रनिवास की तमाम सेविकाओं को लेकर बाँधवगढ़ भाग गए. (ठीक वैसे ही जैसे- अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी).

उस समय बागी रणमत सिंह अजयगढ, पन्ना, बंरौधा, चित्रकूट को अपना इलाका बनाए हुए थे..और अंग्रेजों को मुँहतोड़ सबक सिखा रहे थे. रणमत सिंह के विश्वस्त साथी मथानी लौहार ने कुँवर सिंह व उनके क्रांतिकारी साथियों को कटरा- सोहागी के पहाड़ की तराई से होते हुए डभौरा पहुंचाया.

यहाँ रणजीत राय दीक्षित ने क्रांतिकारियों को अपनी गढ़ी में पनाह दी… कुछेक दिन ठहरने के बाद क्रांतिकारी वहां से बाँदा की ओर निकल गए. इसके बाद अंग्रेजों ने रीमा राजा के सैनिकों को लेकर रणजीत राय की गढ़ी को घेरा.

कुँवर सिंह व क्रांतिकारियों की डभौरा से रवानगी के बाद वीर योद्धा मथानी लोहार.. अपने दर्जन भर साथियों सहित डभौरा में रुके रहे. देसी मुखबिरों ने अँग्रेजों को यह खबर दे दी थी.

फिर यहां– यानि कि डभौरा में अँग्रेजों (सिपाही सभी रीमा राजा के थे, सिर्फ कमांडर अंग्रेज था) और क्रांतिकारियों के बीच भीषण युद्ध हुआ. अंग्रेज वीर योद्घा मथानी लोहार को पकड़कर कुँवर सिंह व उनके क्रांतिकारी दस्ते को दी गई मदद के आरोप में दंड देना चाहते थे.

रणजीत राय दीक्षित व उनके बेटे ने यहां अंग्रेजों की सेना का डटकर मोर्चा लिया…वीर योद्धा मथानी लोहार भी अपने दर्जन भर साथियों के साथ अंग्रेजों से लड़े. रणजीत राय का एक हाथ कटकर अलग हो गया, फिर भी वे वीरतापूर्वक लड़ते रहे. संभवतः मथानी लोहार यहीं बलिदानी हुए… अंग्रेज इन्हें जिंदा नहीं पकड़ पाए.

ठाकुर रणमत सिंह को दीवान दीनबंधु ने छलपूर्वक रीमा बुलाया और अंग्रेजों से हुई संधि के अनुरूप रघुराज सिंह ने इन्हें अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट के हाथों सौंप दिया. बाद में अंग्रेजों ने रणमत सिंह को फाँसी में टाँग दिया (बाँदा ले जाकर). बाबा श्यामशाह को बुडवा (शहडोल) के ठाकुरों ने बुलाया और फिर उनके लौटते वक्त धोखा देकर एक खेत की मेंड़ पर पत्थरों से पीट-पीटकर मार डाला.

अंग्रेजों ने श्यामशाह की जिंदा या मुर्दा गिरफ्तारी पर आकर्षक इनाम रखा था. बाद में यह इनाम बुडवा के ठाकुरों को मिला, रीमा राजा की ओर से, और अंग्रेजों की ओर से भी. रीमा राज्य और अंग्रेजों के बीच समझौता अजीत सिंह के कार्यकाल में हुआ, लेकिन सबसे ज्यादा निभाया रघुराज सिंह और वेंटकरमन सिंह ने.

अंग्रेज जिस भी किसी राजा को गुलाम बनाते थे, उसे इंग्लैड की महारानी विक्टोरिया के क्राउन का रिप्लिका (हुबहू सोने का बना) देते थे. राजा की गद्दी पर यही क्राउन रखा जाता था. रीवा किला में यह क्राउन अभी भी रखा है (जाकर दर्शन कर सकते हैं).

मजेदार बात यह कि किसी स्थानीय पत्रकार ने इस खूबसूरत मुकुट के बारे में जानना चाहा तो किला के म्युजियम प्रबंधक ने बता दिया कि महाराजा को उनके पराक्रम के लिए यह विक्टोरिया क्रॉस (ब्रिटेन का सर्वोच्च सम्मान) दिया गया था.

बहरहाल, मेरी चिंता और जिज्ञासा अमर बलिदानी ‘मथानी लोहार’ को लेकर है. रणमत सिंह, श्यामशाह को उनके बलिदान के लिए सभी जानते हैं. दो महाविद्यालयों के नाम इन्हीं पर हैं. इनसे कुछ कम ही सही, लेकिन रणजीत राय दीक्षित के बारे में भी जानते हैं…

अमर बलिदानी मथानी लोहार के बारे में सिर्फ स्टेट गजेटियर, सन् सत्तावन के अमर बलिदानियों की सरकारी सूची में सिर्फ नाम और उनके पराक्रम भर का जिक्र है… किस गाँव के थे..अब उनके वंशज कहाँ हैं, इसके बारे में कुछ भी पता नहीं… संभव है अप्रसिं. विश्वविद्यालय या ठाकुर रणमत सिंह के इतिहास विभाग के विद्वानों ने कुछ पता लगाया हो..शोध, सर्वे आदि कराए हों.. लेकिन यह कभी प्रकाश में नहीं आया…

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