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समाज को भारतीयता और सनातन संस्कृति एवं एकता का संदेश

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यह वास्तव में एक ऐतिहासिक दिन है. श्रीमती द्रौपदी जी मुर्मू भारत की 15वीं राष्ट्रपति चुनी गई हैं. पहली जनजाति महिला भारत की प्रथम नागरिक बनकर राष्ट्रपति भवन में प्रवेश करने के लिए तैयार हैं.

यह दिवस केवल इस देश के 12 करोड़ से अधिक जनजाति समाज के ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखने लायक दिन है. संपूर्ण देशवासियों का सिर आज गर्व के साथ ऊंचा हुआ है. भारत की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव में एक जनजाति महिला का देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचना, देश के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक घटना मानी जाएगी.

एक गौरवशाली परंपरा, संस्कृति के साथ-साथ एक संस्कारी जीवन जीने वाला इस देश का एक बड़ा घटक होने के बावजूद भी जो समाज पिछड़ा, अंधश्रद्धा के आधीन, व्यसनाधीन का ठप्पा लगाकर सालों- साल उपेक्षा का शिकार हुआ, ऐसे समाज की एक व्यक्ति, वह भी एक महिला देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच गई है, यह देश के लिए शुभ संकेत माना जाना चाहिए. 75 साल देरी से ही क्यों ना हो, जनजाति समाज को उसका हिस्सा, उसकी भागीदारी देने वाले एक उचित कदम के रूप में इस घटना को हमें देखना चाहिए.

यह बात सही है कि जनजाति समाज के बारे में आज भी संपूर्ण देश में जो गलत प्रतिमा बनी हुई है, उस प्रतिमा से अपने ही समाज के इस बड़े घटक को बाहर लाने की आवश्यकता थी. दुर्भाग्य से जनजाति समाज के आक्रोश को इस देश ने कभी समझा ही नहीं. ना जनजाति समाज की इतनी बड़ी आवाज थी और ना उनका नेतृत्व था, जो उनकी आवाज सर्व समाज तक पहुंचाएं.

विश्वास रखेंगे या अवसर मिलेगा तो हम अधिक गति से प्रगति की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं, ऐसे कई उदाहरण जनजाति समाज ने देशवासियों के सामने प्रस्तुत किए. चाहे वह राजनीति में हों, सामाजिक क्षेत्र में हों या खेल के क्षेत्र में हों. जनजाति समाज ने हमेशा ही अपनी प्रतिभा को सिद्ध कर देश का गौरव बढ़ाया है.

जिस विकृत मानसिकता से अंग्रेजों ने जनजाति समाज की ओर देखा उसी दृष्टिकोण को स्वतंत्र भारत में भी चलाया गया. जिस समाज से बिरसा मुंडा, टंट्या मामा, रानी गाइदिनल्यू, रानी दुर्गावती, राघोजी भांगरे जैसे सैकड़ों वीर क्रांतिकारियों ने भारत को अंग्रेजों की दास्यता से मुक्त कराने के लिए अपनी जिंदगी न्यौछावर कर दी, ऐसा समाज पिछड़ा कैसे हो सकता है?

दुर्भाग्य से अंग्रेजों की नीतियां ही स्वतंत्र भारत में भी चलाई जाने के कारण जनजाति समाज उसी प्रतिमा के संघर्ष में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है. आखिर यह अंग्रेजी मानसिकता ही थी कि जनजाति समाज के लोगों का विभिन्न राजनीतिक दलों ने स्वतंत्रता के बाद वोट बैंक की तरह उपयोग किया. कांग्रेस की सरकारों ने दशकों तक शासन करने के बाद भी जनजाति समाज के लोगों के विकास के लिए उचित कदम नहीं उठाए और ना ही उन्हें देश के सर्वोच्च पद के काबिल समझा.

आज द्रौपदी जी का राष्ट्रपति पद पर नियुक्त होना जनजाति समाज का अपनी प्रस्थापित प्रतिमा से बाहर आने की दृष्टि से एक अच्छा संकेत माना जाना चाहिए. वर्तमान सरकार ने एक जनजाति महिला को जिस विश्वास के साथ राष्ट्रपति पद पर बिठाया है, वह एक स्वागत योग्य कदम माना जाएगा.

सभी दलों का समर्थन प्राप्त कर द्रौपदी जी अगर निर्विरोध चुनी जाती तो यह अच्छा होता.

सालों साल से इस देश का जो समाज घटक उपेक्षा, अन्याय का शिकार हुआ, ऐसे समाज को अलग-अलग क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व देने के प्रयास वर्तमान सरकार ने प्रारंभ किए हैं. जिससे एक समरसता युक्त वातावरण निर्माण होकर यह देश और तीव्र गति से प्रगति की ओर अग्रसर होगा, ऐसी सब की अपेक्षा है.

द्रौपदी जी जिस जनजाति समाज से आती हैं, वह लगभग 12 करोड़ का जनजाति समाज आज भी विभिन्न समस्याओं से जूझ रहा है. मूलभूत व्यवस्थाओं का भी इस संपूर्ण क्षेत्र में आज भी अभाव दिख रहा है. देश के सर्वोच्च प्रमुख के नाते इस समाज की समस्याओं की तरफ विशेष ध्यान देने की द्रौपदी जी से अपेक्षा है.

विभिन्न अराष्ट्रीय गतिविधियों ने जिस प्रकार से जनजाति समाज का उपयोग कर उनको इस देश के खिलाफ खड़ा करने का प्रयास किया है, उन प्रयासों को भी विफल करना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए. जिस तरह से विदेशी ताकतों के षड्यंत्र के माध्यम से ईसाई मिशनरियों द्वारा किया जा रहा धर्मान्तरण का कार्य हो या कुछ विशेष समूहों द्वारा जनजाति समाज के लिए अलग धर्मकोड की मांग करना हो, यह सब कुछ भारत विरोधी एजेंडे का हिस्सा है जो भारत को अस्थिर करने की योजना से चलाया जा रहा है. जिसमें जनजाति समाज के लोगों को अपने षड्यंत्र का शिकार बनाया जा रहा है. इस दृष्टि से भी देखें तो जनजाति समाज की समस्याओं के मूल कारणों को ढूंढने का प्रयास भी उन्हें करना होगा.

अपने व्यक्तिगत जीवन में सभी प्रकार के संघर्षों का सामना कर द्रौपदी जी ने जिस प्रकार अपने को सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में स्थापित किया, उस अनुभव के आधार पर राष्ट्रपति के नाते इस देश की एकता और अखंडता के लिए भी वह अपना सर्वोच्च योगदान देंगी, ऐसा सभी देशवासियों को विश्वास है.

उनके दृढ़ विश्वास और इच्छा शक्ति को इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने अपने पति एवं बच्चों को खोने के बाद भी समाज की समस्याओं के निवारण के लिए अपने संघर्ष को पीछे नहीं छोड़ा. उन्होंने समाज में जागृति लाने के लिए व्यापक कार्य किए और संवैधानिक पदों में रहते हुए समाज के विषयों को राष्ट्रीय स्तर पर आवाज दी. जिस दिन उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया गया, उस दिन प्रातःकाल में उन्होंने अपनी जन्मभूमि रायरंगपुर में स्थित शिव मंदिर में पूजा-अर्चना की. इस पूजन के साथ उन्होंने पूरे समाज को भारतीयता और सनातन संस्कृति एवं एकता का जो संदेश दिया वह अभूतपूर्व था.

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