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नए कृषि-कानून किसान हितैषी या विरोधी….?

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डॉ. धर्मबीर यादव

कृषि क्षेत्र में दीर्घकालीन सुधार लाने के उद्देश्य से विगत दिनों बहुचर्चित फार्म-बिल भारतीय संसद में पारित किए गए हैं. इनका देश में व्यापक स्वागत हुआ है व अधिकांश कृषि विशेषज्ञ व बुद्धिजीवी इसे क्रांतिकारी कदम बता रहे हैं. निवेशकों को कृषि की तरफ आकर्षित करने के लिए इस प्रकार के साहसिक फैसले लेने की नितांत आवश्यकता थी ताकि किसान की आय बढ़ाने का सपना पूरा हो. लेकिन किसानों के कुछ संगठन व विपक्ष विशेषतया पंजाब व हरियाणा के किसान संगठन इन बिलों का विरोध कर रहे हैं. पंजाब व हरियाणा में ये विरोध होने का मूल कारण है समर्थन मूल्य व्यवस्था व सरकारी मंडियों के प्रभावहीन या समाप्त होने की आशंका. चूंकि अन्य राज्यों में समर्थन मूल्य आधारित व्यवस्था अधिक सुदृढ़ नहीं है, अत: इन बिलों का विरोध नहीं हो रहा है. इसे राज्य सरकारें राजनैतिक चश्मे से भी देख रही हैं, जैसे हरियाणा सरकार इन बिलों के पक्ष में है तथा पंजाब सरकार विरोध में. अत: इन बिलों के बारे में गहनता से समझने की आवश्यकता है ताकि सभी आशंकाएं दूर हों. महामहिम राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ये बिल अब कानून बन चुके हैं.

आइये जानते हैं कि ये कृषि कानून क्या हैं.

1). कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) मूल्य आश्वासन एवं सेवा अनुबंध कानून-2020, इस कानून के अंतर्गत किसान या व्यापारी कृषि उपज का मंडी के बाहर भी व्यापार कर सकते हैं. राज्य की सीमा के अंदर या बाहर देश के किसी भी हिस्से में व्यापार कर सकते हैं. मंडियों के अलावा फार्म गेट, वेयर हाउस, कोल्ड स्टोर व प्रसंस्करण इकाइयों पर भी व्यापार करने की स्वतंत्रता होगी. इस प्रकार बिचौलिए रहित सीधी विपणन व्यवस्था स्थापित की जाएगी. भारत में अधिकांश छोटे किसान हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है. अत: वे बिचौलियों पर निर्भर रहते हैं व उचित भाव नहीं मिलने की आशंका बनी रहती है. इस कानून के बाद अब वे आसानी से अपनी उपज की बिक्री उचित भाव पर कर पाएंगे.

2). कृषक (सशक्तिकरण एवं सुरक्षा) मूल्य आश्वासन समझौता एवं सेवा करार कानून-2020, यह कानून किसानों को व्यापारियों, कंपनियों, प्रसंस्करण इकाइयों व निर्यातकों से सीधा जोड़ने का काम करता है. इसके अंतर्गत फसल बुवाई से पूर्व ही उपज के भाव तय करके करार किया जा सकता है. इस प्रकार किसान अपनी इच्छानुसार भाव तय कर सकते हैं. किसान उत्पादक संघ के माध्यम से छोटे किसानों को भी उचित भाव दिलवाने की दिशा में कार्य किया जा सकता है. सरकार व्यापक स्तर पर किसान उत्पादक संघ गठित करने हेतु प्रोत्साहन दे रही है. इस कानून में किसान की सुरक्षा हेतु दंडात्मक प्रावधान भी किए गए हैं ताकि कम्पनियां कोई धोखा न कर सकें.

3). आवश्यक वस्तु कानून (संशोधन)-2020, इस कानून में कृषि उपज के भंडारण की सीमा हटा दी गई है. अत: बाजार भाव कम होने की स्थिति में किसान व व्यापारियों को उपज का भंडारण करने की आजादी मिलने से किसान को अच्छा भाव मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है. क्योंकि इस प्रकार कुछ समय उपरांत बाजार में बढ़े हुए भाव पर बिक्री करके मुनाफा कमाया जा सकता है तथा इसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ किसानों को मिलेगा.

आशंकाएं एवं यथार्थ –

  1. कुछ किसान संगठनों को आशंका है कि मंडियों के बाहर विपणन होने से राज्यों को मंडी-टैक्स की हानि होगी तथा स्थापित सरकारी मंडी व्यवस्था ठप्प हो जाएगी या धीरे-धीरे राज्य सरकारें खरीद से अपने हाथ वापिस खींच लेंगी तथा किसानों को व्यापारियों के हवाले छोड़ दिया जाएगा. हालांकि इस सन्दर्भ में केंद्रीय कृषि मंत्री व प्रधानमंत्री का वक्तव्य महत्वपूर्ण है. जिन्होंने आश्वासन दिया है कि वर्तमान मंडी व्यवस्था एवं खरीद व्यवस्था जारी रहेगी. हरियाणा के मुख्यमंत्री ने भी ऐसा आश्वासन दिया है. अत: इस प्रकार की आशंका निराधार है.
  2. किसान संगठन चाहते हैं कि गारंटी कानून के माध्यम से दी जाए. इसमें यह जानना जरुरी है कि पूर्व व्यवस्था भी संवैधानिक न होकर सरकारी आदेश के माध्यम से बखूबी जारी थी तो अब आशंका का कोई औचित्य नहीं है, तब जबकि शीर्ष कार्यपालिका ने आश्वासन दे दिया है.
  3. उन्हें भय है कि कृषि करार कानून की वजह से किसान बड़े व्यापारिक घरानों के बंधुआ बन जाएंगे. समझौता टूटने की स्थिति में उनकी सुनने वाला कोई नहीं होगा, क्योंकि बड़ी-बड़ी कंपनियों से जीतना कठिन होगा. मगर ये धारणा निर्मूल है क्योंकि इस कानून में किसानों की सुरक्षा के पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं. इसके अतिरिक्त किसी भी कल्याणकारी राज्य के लिए किसान हित ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं.
  4. धारणा है कि भंडारण की छूट मिलने से व्यापारियों द्वारा कालाबाजारी को बढ़ावा मिलेगा व आम आदमी को महंगाई का सामना करना पड़ेगा, जबकि किसान को विशेष लाभ नहीं मिलेगा. लेकिन ऐसा नहीं है; कानून में प्रावधान है कि सरकार जब उचित समझे तब भंडारण पर रोक लगा सकती है.
    इन कानूनों के लागू होने के बाद वर्तमान खरीफ सीजन में फसलों की खरीद पूर्व की भांति सुचारु रूप से हो रही है. इससे प्रतिस्थापित होता है कि सभी प्रकार की आशंकाएं निराधार हैं. इनके सकारात्मक परिणाम निकट भविष्य में नजर आएंगे. किसान की आय में वृद्धि हेतु जो तरीके अपनाए जा सकते हैं, उनमें फसल उपज में वृद्धि, उत्पादन लागत में कटौती व समर्थन मूल्य में वृद्धि शामिल है. उन्नत कृषि तकनीकों द्वारा उपज में एकाएक उछाल की सम्भावना कम है तथा समर्थन मूल्य आधारित खरीद का लाभ सिर्फ कुछ राज्यों के किसान ही उठा पा रहे हैं. सभी किसानों तक पहुंचने में समय लगेगा तथा राज्यों पर भारी राजस्व बोझ भी बढ़ेगा. अत: कृषि विपणन व भंडारण व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की नितांत आवश्यकता थी जो इन कृषि कानूनों से पूर्ण होती दिख रही है. जब तक कृषि में निवेश का वातावरण नहीं बनेगा, तब तक किसान की आय में क्रांतिकारी परिवर्तन की सम्भावना क्षीण है.

जब कभी किसी पूर्व-स्थापित व्यवस्था में कोई बड़ा परिवर्तन लाने की कोशिश की जाती है तो थोड़ा-बहुत विरोध होना एक स्वभाविक प्रतिक्रिया है. देश में व्यापक स्तर पर कम्प्युटरीकरण के समय भी आशंकाएं जाहिर की गई थीं, लेकिन हम जानते हैं कि वो सब आशंकाएं निर्मूल साबित हुई व इसका देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा. पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने किसानों की आय के बारे में गंभीरता से सोचा है. ऐसा पहली बार हुआ है कि किसानों को केंद्र में रखकर क्रांतिकारी कानून बनाए गए हैं.

एक कृषि विशेषज्ञ के नजरिये से सभी पहलुओं के दृष्टिगत मेरा दृढ़ विश्वास है कि ये कृषि कानून खेती की दिशा एवं किसानों की दशा सुधारने में एक मील का पत्थर साबित होंगे. हालांकि सरकार स्थिति पर सतत् नजर रखे व समयानुसार उचित दखल देने की व्यवस्था जारी रखे ताकि किसानों के हितों का हनन होने की स्थिति उत्पन्न न होने पाए. इन कृषि-कानूनों के उचित कार्यान्वयन व लक्षित परिणाम प्राप्ति हेतु सरकार को समय-समय पर मूल्यांकन की प्रक्रिया अपनानी चाहिए व उचित बदलाव करके लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए. हम सभी को पूर्वाग्रहों व आशंकाओं को छोड़कर सुखद भविष्य की ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए. ये कृषि कानून हमारे देश के लिए कल्याणकारी साबित होंगे.

(प्रधान वैज्ञानिक, हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार)

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