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भाग दो – अपने शौर्य से मोहम्मद गौरी को हर बार धूल चटाने वाले सम्राट पृथ्वीराज चौहान

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पद्मश्री महाराव रघुवीर सिंह

महाराज सोमेश्वर के ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज चौहान का राज्याभिषेक होते ही गजनी के सुल्तान मोहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण कर दिया. जिसका उन्होंने वीरतापूर्वक सामना किया और गौरी को पराजित कर बंदी बना लिया. जब मोहम्मद गौरी को सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समक्ष लाया गया, तब गौरी उनसे अपने प्राणों की भीख मांगने लगा. 8000 घोड़े दण्ड स्वरूप देने पर उसे छोड़ा गया. इसके बाद वह अपने प्राण बचाकर गजनी लौट गया. थोड़े दिन बीतने पर उसने पुनः आक्रमण किया और हार गया. इस बार भी हज़ारों घोड़ों का जुर्माना भर इस आश्वासन के साथ कि वह दोबारा नहीं आएगा, गजनी वापस चला गया.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अपने चौदह वर्ष के शासन काल में सात लड़ाइयां मोहम्मद गौरी से लड़ीं. 1191 ई. की लड़ाई में सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने ऐसा भयंकर प्रहार किया कि मोहम्मद गौरी की आधी सेना और सात सेनापति रणक्षेत्र छोड़ कर भाग गए. मोहम्मद गौरी को इस बार भी बंदी बना लिया गया. लेकिन पृथ्वीराज चौहान ने उदार हिन्दू गुणों के कारण उसे इस बार भी मुक्त कर दिया.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान में दो अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषताएँ थीं. एक तो वे “शब्दभेदी बाण” के ज्ञाता थे, ध्वनि की दिशा में उनका तीर रात्रि के अँधेरे में भी सटीक निशाने पर लगता था. दूसरा उनकी “प्रत्यक्ष प्राह चण्डिका” जिसका अर्थ होता है कि जब वे स्तुति करते, तब देवी स्वयं उनके समक्ष प्रकट होकर उन्हें मनचाहा वरदान देती थीं.

पृथ्वीराज चौहान एक महान सम्राट थे. उनका साम्राज्य दूर दूर तक फैला था. साम्राज्य विस्तार के कारण भारत के अनेक राजाओं से उनके रिश्ते कटु थे. अपने ही ससुर काशी नरेश जयचंद राष्ट्रकूट, जिनकी राजधानी कन्नौज थी; पिता के ननिहाल गुजरात के महान सोलंकी सम्राट, अपने ही जंवाई चंदेल वंश के राजा, बुन्देल नरेश व जम्मू नरेश से भी उनके रिश्ते अच्छे नहीं थे.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान की बढ़ती शक्ति और बल के कारण विरोधी राज्यों के हिन्दू राजाओं में खलबली मची थी. ऐसे में भारत के कुछ राजाओं ने गजनी जाकर मोहम्मद गौरी को फिर से भारत पर आक्रमण करने के लिए उकसाया और यह आश्वासन दिया कि वे सब उसका सहयोग करेंगे.

विरोधी राजाओं की रणनीति थी कि जब मोहम्मद गौरी आक्रमण करेगा तो वे सब अपनी सम्पूर्ण सेना पृथ्वीराज चौहान के साम्राज्य की सीमा पर खड़ी कर देंगे. फलस्वरूप, पृथ्वीराज को एक ओर अपने राज्य की सीमा की सुरक्षा के लिए तो दूसरी ओर मोहम्मद गौरी से लड़ना पड़ेगा, इससे उनकी शक्ति बंट जाएगी. राजाओं के उकसाने पर जब मोहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किया तो भारत के कई नरेश अपने पूर्ण सैन्य बल के साथ मोहम्मद गौरी की सहायता के लिए रणक्षेत्र में मौजूद थे.

पृथ्वीराज चौहान ने आक्रमण के मंडराते बादलों को देखते हुए अपनी पूरी तैयारी की. राज कवि चन्द्रवरदाई ने तरायण रणक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया, जो दिल्ली से 162 किमी उत्तर में है. पृथ्वीराज चौहान को यह देवीय संकेत मिलने लगे थे कि इस बार उनकी पराजय होगी. इस बात को समझते हुए भी अपने दायित्व को निभाने के लिए पृथ्वीराज की सेना ने कुरुक्षेत्र पार किया.

क्रमश:

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