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सांस्कृतिक अस्मिता को राजनीति के केंद्र में स्थापित करने वाले जननेता ‘कल्याण सिंह’

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प्रणय कुमार

कल्याण सिंह का देहावसान राजनीति के एक युग का अवसान है. वे राजनीति के शिखर-पुरुष के रूप में सदैव याद रहेंगे. एक शिक्षक से जननेता तक की उनकी राजनीतिक यात्रा अविस्मरणीय है. वे जनसंघ के दिनों से भारतीय राजनीति की सनातन सांस्कृतिक धारा का प्रतिनिधित्व करते रहे. उन्होंने सत्ता के लिए कभी समझौता नहीं किया. न उनमें सत्ता का कोई मोह ही था. बल्कि उन्होंने ध्येयनिष्ठा के लिए सत्ता को सहर्ष ठोकर मार दी. उनके ये शब्द सदियों तक जनमानस के मन-मस्तिष्क में गूँजते रहेंगे कि ”सत्ता रहे या जाए, मैं मुख्यमंत्री रहूँ या न रहूँ, पर निर्दोष कारसेवकों पर गोली नहीं चलाऊंगा, नहीं चलाऊंगा, नहीं चलाऊंगा!”

छह दिसंबर, 1992 को उत्तरप्रदेश के तत्कालीन डीजीपी एस.एम. त्रिपाठी भागे-भागे आए और उनसे कहा कि ”कारसेवक विवादित ढाँचे को तोड़ रहे हैं, फायरिंग की परमिशन चाहिए.” मुख्यमंत्री ने पूछा कि ”गोली चलाने पर कितने लोग मारे जाएंगे? डीजीपी बोले- ”बहुत लोग मारे जाएंगे.” कल्याण सिंह ने कहा ”आँसू गैस चलाइए या लाठीचार्ज करिए, लेकिन फायरिंग की परमिशन नहीं दे सकता. आप चाहें तो मैं कागज़ पर लिखकर दे सकता हूँ कि मैंने अनुमति नहीं दी.” उस दिन जिस समय विवादित ढाँचा ढ़हाया जा रहा था, वे टीवी देख रहे थे, कुछ विचलित भी थे. लेकिन जैसे ही आख़िरी ईंट गिरी, उन्होंने अपना मुख्यमंत्री वाला राइटिंग पैड मंगाया और त्यागपत्र लिख दिया. उन्होंने बाहर आकर यह अति संक्षिप्त किंतु ऐतिहासिक वक्तव्य दिया – ”यह सरकार श्रीराम के मंदिर के ही नाम पर बनाई गई थी, श्रीराम के मंदिर के लिए मैं ऐसी कई कुर्सियाँ त्याग सकता हूँ.” और सचमुच उन्होंने उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने में रंचमात्र संकोच नहीं दिखाया. राजनीति में सामूहिक ध्येय एवं महान संकल्प के लिए सत्ता का ऐसा परित्याग दुर्लभ है. ऐसे दृष्टांत स्वतंत्र भारत में खोजने पर भी अन्य नहीं मिलते. जनसाधारण के स्वाभाविक ज्वार की भी नैतिक जिम्मेदारी लेने का ऐसा दृष्टांत, ऐसा साहस – संघर्षों में तपे, ज़मीन से उठे उनके जैसे जननेता में ही देखने को मिल सकता है. त्याग, साहस, संघर्ष, संकल्प एवं संगठन-कौशल के पर्याय थे – कल्याण सिंह. ढाँचा-ध्वंस के पश्चात सीबीआई द्वारा दायर याचिका में इस बात का उल्लेख किया गया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद कल्याण सिंह अयोध्या दौरे पर गए थे और वहाँ जाकर रामलला के दर्शन करते हुए मंदिर-निर्माण की शपथ ली थी. सदियों के संघर्ष व आस्था का पुनीत परिणाम तथा देश-दुनिया में फैले कोटि-कोटि भारतवासियों का चिर-प्रतीक्षित स्वप्न यदि आज श्रीराम के भव्य मंदिर के रूप में सजीव-साकार होने जा रहा है तो उसकी नींव में कल्याण सिंह जैसे नायकों का त्याग एवं संघर्ष भी है. श्रीराम केवल किसी समुदाय-विशेष के आस्था के केंद्र बिंदु नहीं, वे विश्व-मानवता के आदर्श व पथ-प्रदर्शक हैं. उनके दर्शनार्थ अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं को उनके जीवन-चरित से तो प्रेरणा मिलेगी ही मिलेगी. पर आस्था और श्रद्धा के इस सबसे बड़े केंद्र को बचाने के लिए किए जाने वाले सुदीर्घ संघर्ष, त्याग और बलिदान भी कम प्रेणादायी नहीं हैं. भला किस आस्थावान भारतीय के स्मृति-पटल से कारसेवा के दौरान मारे गए रामभक्त कोठारी बंधु की, पुलिस की लाठी से चोटिल एवं लहूलुहान अशोक सिंहल जैसे महानायक की छवि ओझल हो सकती है! महती उद्देश्यों एवं ऊँचे ध्येय को समर्पित जीवन भुलाए नहीं भूलते!

कल्याण सिंह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े जनांदोलन श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के अगुआ और नायक मात्र ही नहीं थे. उन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा तय की, राजनीति में सफलता के प्रचलित मानक एवं प्रतिमान बदले. उन्होंने दशकों से उपेक्षित एवं तिरस्कृत हिन्दू अस्मिता, हिन्दू चेतना को मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा माना और बनाया. हिन्दू होना और हिन्दू होने के गौरवबोध को मन में धारण करना – इस देश में पिछड़ेपन का द्योतक मान लिया गया था. स्वातंत्र्योत्तर भारत में क्षद्म धर्मनिरपेक्षता एवं कथित बौद्धिकता की ऐसी हवा चला दी गई, जिसमें हिन्दू होना और स्वयं को हिन्दू मानना राष्ट्रीय शर्म का विषय बना दिया गया. परंतु कल्याण सिंह समाज के पिछड़े एवं वंचित वर्ग से आए पहले ऐसे व्यापक जनाधार वाले राजनेता थे, जिन्होंने कभी ऐसे विरोधी वायुमंडल की चिंता नहीं की. उन्होंने कभी जातिवादी या पिछड़े-अगड़े की राजनीति नहीं की. राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए छोटी-छोटी अस्मिताओं में बंटी-कटी संकीर्ण-संकुचित उत्तर भारतीय राजनीति को उन्होंने बड़ी अस्मिता, बड़ी चेतना से जोड़ा. जातियों में बंटे समाज और राजनीति को वे श्रीराम जन्मभूमि जनांदोलन के माध्यम से महत एवं बृहत्तर ध्येय से जोड़ पाने में असाधारण रूप से सफल रहे. उन्होंने हिन्दू अस्मिता को ही भारत की सांस्कृतिक अस्मिता माना. हिन्दू संस्कृति का मतलब उनके लिए निश्चित विश्वास एवं विशेष उपासना-पद्धत्ति से कभी नहीं रहा. वे जानते और मानते थे कि मज़हब बदलने से पुरखे व संस्कृति नहीं बदलती. मज़हब चाहे भिन्न हो, उपासना पद्धत्ति चाहे भिन्न हो, पर भारत भूमि पर रहने वाले भारतवासियों की संस्कृति एक है. वह सर्वसमावेशी, सर्वस्पर्शी है. कोई उसे हिन्दू कहता है, कोई भारतीय, कोई सनातन. परंतु भारत की जिस सनातन एवं गौरवशाली परंपरा के कारण पूरी दुनिया उसे विश्वगुरु मानती आई है, वह हिन्दू संस्कृति और परंपरा ही है. इसे स्वयं मानना एक बात है, पर जनमानस के हृदय में उतार पाना दूसरी बात. वे इस भाव को समाज के शोषित-वंचित-पिछड़े वर्गों के हृदय में उतार पाने में क़ामयाब रहे.

नब्बे के दशक का कदाचित ही कोई ऐसा युवा हो, जो कल्याण सिंह की शैली, निर्भीकता एवं स्पष्टवादिता से प्रभावित न रहा हो. जिसकी चेतना कल्याण सिंह के तुकबंदीयुक्त राजनीतिक भाषणों-उद्बोधनों से प्रेरित-उद्वेलित न हुई हो. वे बिना लाग-लपेट के स्पष्ट एवं खरा बोलते थे. यही उनकी ताक़त थी. उनकी छवि एक सख़्त, स्वच्छ, सुयोग्य एवं ईमानदार मुख्यमंत्री की थी. उन्होंने शासन-प्रशासन एवं उत्तरप्रदेश की व्यवस्था को लालफीताशाही के चंगुल से मुक्त किया. वे कठोर निर्णयों के लिए जाने जाते थे. चाहे नकल अध्यादेश हो, एक-एक करके चार विधायकों को जेल भेजने का साहसिक निर्णय हो या अपराधियों पर नकेल कसना हो – उन्होंने लोकप्रियता, वोट-बैंक, जातिवादी जोड़-तोड़ के गणित की परबाह किए बिना निर्णय लिए. वे दो बार उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री और हिमाचल प्रदेश एवं राजस्थान के राज्यपाल रहे. वे भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. उन्होंने साइकिल और पोस्टकार्ड युग में दल को खड़ा किया था. उनके सुंदर, सुडौल, सुगढ़ अक्षरों में लिखे पोस्टकार्ड उस दौर के कार्यकर्त्ताओं ने आज भी सहेजकर रखे हैं. उन्हें ढाँचा गिरने के कारण एक दिन के जेल की सजा भी भोगनी पड़ी थी. यह उनके लिए कोई नई बात नहीं थी. आपातकाल के दौरान वे 21 माह तक जेल की काल-कोठरी में कैद रहे थे. वे ज़मीन से उठे और संघर्षों में तपे और पले-बढ़े थे. उनकी इच्छाशक्ति अदम्य थी. उनका अंतिम स्वप्न अपने जीवन काल में श्रीराम-मंदिर का भव्य निर्माण देखना था. वे उन सौभाग्यशालियों में से एक थे, जिसके जीवन-काल में श्रीराम के भव्य मंदिर का शिलान्यास हो चुका था. उपचार के दौरान चिकित्सालय में मिलने आने वाले परिचितों-राजनीतिज्ञों का अभिवादन वे जय श्रीराम बोलकर करते थे.

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