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सकारात्मक – बुंदेलखंड में प्रवासी श्रमिकों ने अस्तित्व खो चुकी घरार नदी को किया पुनर्जीवित

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नई दिल्ली. बुंदेलखंड की कहावत है “पानी दार यहां का पानी, आग यहां के पानी में”. कहावत को सच करके दिखाया प्रवासी श्रमिकों ने, जो कोरोना संकट के चलते शहरों से लौट कर अपने गांव पहुंचे. बांदा जिले के भांवरपुर तहसील नरैनी के प्रवासी श्रमिकों ने विलुप्त हो चुकी घरार नदी को पुनर्जीवित करने का साहसी कार्य किया है. यह नदी पन्ना मध्य प्रदेश के जंगलों से आती है और बागेन नदी में समाहित हो जाती है.

बांदा जिले में लगभग 30 वर्षों से घरार नदी अपना अस्तित्व खो चुकी थी. पूर्व में यह नदी 40 से 50 फुट चौड़ी हुआ करती थी और किसानों के लिए वरदान थी. इस नदी के पानी से खेती कर गांव के किसान अपना जीवन यापन करते थे, लेकिन जैसे-जैसे नदी अपना अस्तित्व खोती गई, गांव से काम की तलाश में पलायन शुरू हो गया. गांव में केवल बुजुर्ग और महिलाएं ही शेष थीं. लेकिन कोरोना संकट के चलते श्रमिकों को शहर से गांव लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा. संकट के समय को अवसर में बदलकर नरैनी गांव के प्रवासी श्रमिकों ने विलुप्त हुई घरार नदी को फिर संवारने का कार्य किया.

प्रवासी श्रमिकों के सामने रोजगार की समस्या को लेकर विद्या धाम समिति के संरक्षक राजा भईया ने गांव के सभी लोगों व प्रवासी श्रमिकों के साथ बैठक करके तय किया कि मनरेगा में काम करने के लिए जब तक जॉब कार्ड नहीं बनते हैं, तब तक उनके परिवार के रोजी-रोटी की व्यवस्था की जाएगी तथा प्रवासी श्रमिक अपने श्रमदान से वर्षों से सूखी पड़ी घरार नदी को पुनर्जीवित करने का काम करें.

नदी में फिर से पानी आने पर जैविक खाद से सब्जियां पैदा करेंगे, जिससे गांव के लोगों की जरूरत पूरी होगी. सब्जियों को बेचकर पैसा भी कमाया जा सकता है. प्रवासी श्रमिकों व गांव के बुजुर्ग लोगों को प्रस्ताव पसन्द आया.

घरार नदी का स्वरूप बदलने में पुरूषों के साथ महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर काम किया. इस नदी में 35 चैकडेम बने हैं, जिसके कारण आखिरी छोर तक पानी आते आते खत्म हो जाता है. श्रमिकों के प्रयास से नदी से झाड़ी घास को साफ करते ही जल स्रोत खुलने लगे और नदी में पानी आ गया. लगभग 1.5 किमी का हिस्सा पुनर्जीवित कर लिया है. इससे लोगों का हौंसला बढ़ने लगा. नदी को पुनर्जीवित होते देख गांव के लोगों ने भी नदी पर किए अतिक्रमण छोड़ दिए. गांवों के लोगों का उत्साह देख आस-पास गांव के लोग भी प्रोत्साहित हुए और तय किया कि अब अपने गांव में ही खेती करके जीवन यापन करेंगे. शहर से लौटे सभी प्रवासी श्रमिकों के जॉब कार्ड व राशन कार्ड भी बनने शुरू हो गए.

 

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