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अमर बलिदानों की अनमोल भूमि

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राघव अभी केवल नौ वर्ष का था. प्रतिदिन अपने ताऊ जी और उनके बेटे माधव के साथ नियमित शाखा जाता. ताऊ जी ने आज बाल स्वयंसेवकों के साहस के सच्चे प्रसंग सुनाए थे, शाखा से लौटते समय बातचीत इसी विषय पर चल रही थी.

तब तक घर आ गया था. वे आँगन में अमरूद के पेड़ नीचे बिछी खाट पर बैठ गए. घर महानगर की कालोनी में था, पर घर के कई ठाठ अब भी बिल्कुल देशी थे. यह खाट और दूध दलिया या ऐसा ही कुछ अल्पाहार सब साथ साथ करते थे.

ताऊ जी कह रहे थे “बच्चे निश्चय कर लें तो बड़ा काम भी सरलता से कर जाते हैं. ‘लवकुश, ध्रुव, प्रह्लाद बनें हम’ प्रतिदिन प्रार्थना में गाते हो न? ये ऐसे ही बच्चे थे, जिन्होंने असंभव से दिखने वाले कठिन काम सरलता से कर दिखाए थे.”

“हाँ, सुनी है मैंने इनकी कहानियाँ, पर ये बहुत पुराने, अलग जमाने की बातें हैं, लव-कुश तो भगवान के बेटे थे और ध्रुव, प्रह्लाद राजाओं के.” राघव ने कहा.

“और वीर अभिमन्यु? खैर तुम कहोगे यह तो भगवान कृष्ण का भानजा था. पर राजकुमारी मैना, पृथ्वीसिंह, हकीकत राय, बिशन सिंह कूका, बाजी राऊत, और भी ऐसे सैकड़ों नाम तो वर्तमान युग के ही हैं. जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए, देश-धर्म के लिए अपने बलिदान से दिखा दिया कि शेर के बच्चे छोटे भी हों तो शेर ही होते हैं.” ताऊ जी कहते-कहते आसमान की ओर देखने लगे, मानो इन सबकी कहानियाँ लिखी हैं वहाँ और वे उन्हें स्पष्ट पढ़ पा रहे हैं. फिर जैसे कुछ याद करते हुए बोले “अच्छा चलो. सब जल्दी नहा-धोकर तैयार हो जाओ, आज सब गुरुद्वारे चलेंगे.”

“गुरुद्वारे क्यों? आज न तो गुरुनानक देव जी की जयंती है, न गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान दिवस, गुरु गोबिंद सिंह जी का प्रकाश पर्व भी अगले माह है.” माधव ने जिज्ञासापूर्वक पूछा.

“हाँ, पर गुरुद्वारे तो कभी भी जा सकते हैं न? वैसे तो आज भी एक विशेष दिन है, इसीलिए सबको ले जाना चाहता हूँ. आज है 26 दिसंबर, वीर बाल दिवस.

दशम गुरु श्री गोबिंद सिंह जी महाराज के दोनों छोटे साहिबजादे बाबा फतेहसिंह और बाबा जोरावरसिंह के महान बलिदान का दिन.” कहते कहते ताऊ जी भावुक हो उठे.

“फतेहसिंह जी बड़े थे या जोरावरसिंह जी?” माधव ने पूछ लिया.

“बड़े तो बाबा जोरावर सिंह जी थे, पर मैंने बाबा फतेहसिंह जी का नाम पहले ले लिया, यही सोच रहे हो न? बताऊँगा, आज सब बताऊँगा, पर पहले गुरुद्वारा चलेंगे.” ताऊ जी से इन वीर बालकों के संबंध में कुछ जानने को मिलेगा, यह जानकर दोनों भाइयों में बिजली जैसी फुर्ती आ गई. बहन रोहिणी और राघव की माँ और ताईजी भी झटपट तैयार हो गईं. गुरुद्वारे जाना हो या जैन मंदिर अथवा बौद्ध विहार वे सपरिवार ही जाते थे. हाँ, आज राघव के पिता किसी काम से नगर के बाहर होने से अवश्य अनुपस्थित थे. घर में राम, कृष्ण, शिव, गणपति, दुर्गा सबकी पूजा होती पर नानक, बुद्ध, महावीर भी अपने ही आराध्य हैं, ऐसा उदार एकात्म हिन्दुत्वभाव संघ के कारण परिवार में सहजता से आ चुका था. वे और कहीं जाते तो प्रायः भोजन घर से बनाकर ले जाते, पर गुरुद्वारे में तो लंगर छकने का विशेष ही आनंद होता. इसी से महिलाएँ भी फटाफट तैयार हो लीं.

गुरुद्वारे के प्रांगण में ताऊ जी  ने सुनाया “श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चार पुत्र थे. नाम थे अजीत सिंह, जुझारसिंह, जोरावर सिंह और सबसे छोटे फतेहसिंह. श्रीगुरु गोबिंद सिंह जी के पिता श्री गुरु तेगबहादुर जी ने तो धर्मरक्षा के लिए बलिदान दिया ही था, उन्होंने अपने चारों बेटों को भी देश धर्म पर सब कुछ न्यौछावर कर देने के संस्कार दिए थे.”

“तो वे भी स्वयंसेवक थे?” छोटी रोहिणी ने पूछा.

“नहीं रे! यह तो सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी की बात है और संघ की स्थापना तो बहुत बाद में 1925 में हुई.” माधव ने समझाया.

“लेकिन संघ हिन्दू संस्कृति के.ऐसे सारे महान व्यक्तियों के जीवन से संस्कार एवं प्रेरणा लेकर ही बना है.” ताऊ जी ने और स्पष्ट किया.

राघव को कहानी का रुकना अच्छा नहीं लग रहा था. उसने बहन से कहा “और कुछ पूछना है? मैं सब समझा दूँगा पर बाद में, पहले कहानी. ठीक है.” राघव की बात पर सब मुस्कुराने लगे. पर ताऊ जी ने संकेत से उन्हें हँसने से रोक दिया. वे जानते थे बच्चों की जिज्ञासा को दबाना नहीं चाहिए. फिर भी राघव की उत्सुकता भी अनुचित न थी, यह भी वे समझ रहे थे.

ताऊ जी ने कहानी आगे बढ़ाई “उस समय देश पर क्रूर शासक औरंगजेब का आतंक छाया हुआ था. वह हिन्दुओं का घोर विरोधी था. सिक्खों की धर्मरक्षक गतिविधियाँ उसे खूब खटकती रहतीं. छत्रपति शिवाजी महाराज ने उधर दक्षिण में उसके नाको चने चबवा रखे थे तो इधर श्रीगुरु गोबिंद सिंह जी धर्म की अभेद्य ढाल बने हुए थे. दिल्ली में आज जहाँ गुरुद्वारा शीशगंज साहिब है, वहीं गुरु तेगबहादुर जी धर्मरक्षा में अपना शीश भेंट चढ़ा चुके थे. लगभग एक वर्ष पहले यानि दिसंबर 1704 में ही चमकोर के युद्ध में गुरुजी के दोनों बड़े पुत्र बाबा अजीत सिंह जी और जूझार सिंह जी बलिदान हो चुके थे.

बात सन् 1705 की है. आनंदपुर साहिब की गढ़ी में गुरुजी सपरिवार अपने साथियों सहित औरंगजेब की सेना से घिरे हुए थे. अन्न भंडार समाप्त हो चुके थे. औरंगजेब ने एक कपटभरा प्रस्ताव दिया कि गुरुजी यदि गढ़ी छोड़ दें तो उनके साथियों सहित सुरक्षित जा सकते हैं. गुरुजी को यहाँ घिरकर भूखे-प्यासे मर जाने की अपेक्षा बाहर निकल कर देश-धर्म की रक्षा हेतु उपाय करना ठीक लगा. वे बाहर निकले पर चालबाज दुष्ट औरंगजेब की सेना ने उन पर आक्रमण कर दिया. इस धोखे से हुए आक्रमण से गुरुजी का दल बिखर गया. दोनों छोटे बालक बाबा जोरावरसिंह जी और बाबा फतेहसिंह जी माता गुजरी जी के साथ भटक गए.”

“माता गुजरी कौन थीं?” इस बार प्रश्न माधव की माता जी ने किया.

“माता गुजरी गुरु गोबिंद सिंह जी की माँ साहेब, इन बच्चों की 80 वर्ष की वृद्धा दादी थीं और तब जोरावरसिंह की आयु थी नौ वर्ष और फतेहसिंह की मात्र छः-सात वर्ष.” ताऊ जी ने बताया तो माँ का हाथ अपने आप राघव के सिर पर घूम गया.

ताऊ जी आगे कहने लगे “दादी पोतों ने एक रसोइये गंगूराम के घर सरहिन्द में शरण ली. वहाँ नवाब वजीर खान शासन करता था. पैसों के लालच में गंगू ने इन दादी पोतों को पकड़वा दिया. सरहिन्द की गढ़ी के बेहद ठंडे बुर्ज पर दिसंबर की हाड़ कँपाती भयानक ठंड में यह वृद्धा महिला और छोटे बच्चे बंदी करके रखे गए.”

‘अगर तुम इस्लाम कबूल कर लो तो तुम्हारी जान बख्श कर तुम्हें ईनाम भी देंगे.’ उस दिन वजीरखान रौबदार आवाज में कह रहा था. उसके दरबार में दोनों बच्चे अपराधियों के रूप में खड़े किए गए थे.

‘हम सिक्खी नहीं छोड़ेंगे, अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे’ सिंह के बच्चों ने निडर उत्तर सुना दिया. विधर्मी औरंगजेब की गुलामी न स्वीकारने के लिए वजीरखान ने सजा सुनाई – ‘इन गुस्ताख़ लड़कों को जिन्दा ही दीवार में चुनवा दिया जाए.’ और यह तत्काल किया जाने लगा.

चुनते-चुनते दीवार छोटे-से फतेहसिंह के गले तक आ गई तो उसने देखा बड़े भाई की आँखें छलक उठीं हैं. वह आश्चर्य से पूछ बैठा ‘भाई! डर लग रहा है क्या?’

‘नहीं रे! हम अपने पिताजी और दादाजी की गौरवशाली परंपरा के बच्चे हैं, हम मौत से नहीं डरते, मौत हम से डरती होगी. मेरी आँखें तो यह सोचकर भर आईं कि तुम छोटे हो पर मुझसे पहले तुम देश धर्म पर बलिदान हो रहे हो, मेरी श्वासें बाद में रुकेंगी.’

ताऊ जी आँखे पोंछते पल भर रुके. भर्राए गले से शब्द नहीं फूट रहे थे. आँखें सबकी भीग रही थीं. ताऊ जी ने धीरे से कहा “अब समझे सुबह मेरे मुँह से फतेहसिंह का पहले क्यों आ गया था. इन्हीं वीर बालकों से प्रेरणा लेने हेतु 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ मनाया जाता है.”

“गुरुपुत्रों की यह पवित्र बलिदान स्थली बाद में हिन्दुओं ने प्राप्त करना चाही तो मुगलों ने साफ मना कर दिया. फिर दीवान टोडरमल जी ने मुँह माँगी कीमत देने का लालच दिया तो ‘जितनी जमीन सोने की मुहरों से ढँक सको उतनी तुम्हारी’ की शर्त पर यह स्वर्ग से भी पवित्र भूमि प्राप्त कर सके. बच्चों! वीर बालकों के पवित्र बलिदान की यह भूमि संसार की सबसे मूल्यवान भूमि है. पंजाब के सरहिन्द नामक स्थान पर गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब आज भी संसारभर का पावन तीर्थ और प्रेरणास्थल बना हुआ है.”

ताऊ जी उठने लगे तो राघव और रोहिणी ने उन्हें उठने न दिया. एक शर्त उनकी भी थी. “आप हमें सरहिन्द अवश्य ले जाएँगे, इन्हीं छुट्टियों में.” ताऊ जी द्वारा मना करने का तो प्रश्न ही न था.

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक)

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