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रामकथा जड़ता को समाप्त कर मनुष्यता प्रदान करती है – मोरारी बापू

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चित्रकूट में आयोजित नौ दिवसीय रामकथा का समापन

चित्रकूट.

साधु अवज्ञा तुरत भवानी, करि कल्याण अखिल के हानी..

लिंग थापि विधिवत कर पूजा, शिव समान प्रिय मोहिं न दूजा..

रामकथा के विश्राम दिवस, नवम दिन की कथा कहते हुए मानस मर्मज्ञ मोरारी बापू ने परम पावन मां मन्दाकिनी तट पर स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के आरोग्यधाम में कहा कि शरीर के सभी अंगों की अपनी-अपनी महत्ता है. उनमें नेत्र सबसे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि परम पिता परमेश्वर के दर्शन के लिए सूर जी जैसी आँखे होनी चाहिए. तुलसी दास जी स्वयं कहते हैं कि रामचरितमानस स्वयं आँखें हैं. जिसमें सीताराम जी उसकी दो पलकें है. लक्ष्मण जी अंदर के गोलक, शत्रुघ्न जी जनम जनम की प्यास और भरत जी द्रगविन्दु हैं. भजन में जो निरन्तर रत रहता है, उसका नाम भरत है. जो सदैव प्यासा है, वह शत्रुघ्न जी हैं. हरि और हर में कोई विभेद नहीं है.

एक गुरू को, एक सद्गुरू को योग्य शिष्य की प्राप्ति महानिधि मानी जाती है. उसी तरह एक माता-पिता को अच्छा पुत्र मिलना निधि नहीं महानिधि है और वो महानिधि राजा दशरथ को भगवान के रूप में मिली.

चित्रकूट में चल रही रामकथा के अंतिम दिन कथा का समापन करते हुए मोरारी बापू ने राजा दशरथ और महर्षि विश्वामित्र के एक संवाद पर कहा कि लाख सत्कर्म करो, फिर भी पाप आसानी से नहीं मिटता. पाप को मिटने की भी एक समय सारिणी होती है, जैसे किसी रोग से स्वस्थ होने में समय लगता है. लेकिन एक तत्व ऐसा है, जिससे एक ही झटके में पाप का अन्त हो जाता है – वो है साधु का दर्शन.

बापू ने कहा कि अयोध्या को कर्म भूमि कहा गया है और चित्रकूट को प्रेम भूमि कहा है. जहां प्रेम है, वहां रस है. हरि अनन्त, हरि कथा अनन्त! हरि यानि व्यापकता, हरि माने व्यास, हरि माने संकीर्णता जिसका स्वभाव नहीं है, उसको कहते हैं – हरि!

प्रभु ने सेतुबन्ध की रचना सभी को संगठित करने के लिए की थी. सेतुबन्ध का अर्थ ही है जोड़ना. शिव का अर्थ है कल्याण, इसलिए प्रभु ने सेतुबन्ध करके शिव की स्थापना की ताकि सभी एकसाथ जुड़ जाएं और अखिल विश्व का कल्याण हो जाए. रामकथा महारास है, रामचरित मानस में यह भी बताया है कि समस्या होने पर सभी एकजुट होकर उसका समाधान कर सकते हैं. क्योंकि राम स्वयं करुणानिधि और करुणा के सागर हैं जो उनका सहारा ले लेता है, वह भवसागर से पार हो जाता है. रामकथा हमें पशुता अर्थात जड़ता से निकाल कर मनुष्यता प्रदान करती है. नन्दी धर्म का स्वरूप है. सत्य कभी सत्ता के पास नहीं जाता है. हरि कथा ऐसा अमृत है, जिससे कभी कोई तृप्त नहीं होता. सदैव वह अतृप्त ही रहता है अर्थात प्यासा ही रहता है. रामचरित मानस के श्रवण से हमारे पाँचों क्लेशों दुःख, दाह, दारिद्र, दम्भ, दूषन का शमन हो जाता है.

मोरारी बापू ने कथा के अन्तिम दिन भगवान राम के जन्म से लेकर लंका विजय और राजतिलक तक का वर्णन संगीतमय दोहा, चौपाईयां के माध्यम से पूरी रामकथा का सारगर्भित समापन किया.

चित्रकूट नाम की औषधि सारे विश्व के परिताप का समन करने में सक्षम है. क्योंकि इसके कण-कण, पत्ते-पत्ते में क्षण-क्षण प्रभु का वास है. उन्होंने पर्यावरण दिवस पर आरोग्यधाम परिसर में रोपे गए 5 वृक्षों का संदर्भ देते हुए कहा कि जम्बू का वृक्ष भरत का विवेक है, आम भरत चरित्र का रस है, पाकरी भरत का जप और यज्ञ है, तमाल प्रभु की छवि अर्थात उनका रूप है और वट वृक्ष भरत का विश्वास है.

अंतिम दिन की कथा को विराम देते हुए मोरारी बापू ने कहा कि “सितारों को आंखों में महफूज रखना, बहुत देर तक रात ही रात होगी. मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी. कथा के घाट पर फिर से मुलाकात होगी.”

जो हमने 9 दिन चमक पाई है. चित्रकूट की कृपा से उसे आंखों में सुरक्षित रखना. नौ दिन की इस कथा को प्रसन्नता के साथ विदा देता हूं. इस दीनदयाल शोध संस्थान के मुखिया भारत रत्न नानाजी देशमुख उनसे तो कई बार सहयोग मिला है, वर्तमान में भी जो कर्ताधर्ता हैं, वह और उनकी टीम ने पूरी तरह कथा के लिए द्वार खोल दिए, बोले बापू सब आपका है. सभी को बहुत-बहुत साधुवाद.

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