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रेखा – संघ के बगीचे में विकसित हुआ पौधा

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रमेश पतंगे

यमगर वाड़ी २८ जून को रेखा और बालाजी का विवाह संपन्न हुआ. एक कन्या का विवाह होना, इसमें क्या विशेषता है? लाखों विवाह हर साल होते हैं, उनमें से ही ये एक विवाह था. ऐसे प्रत्येक विवाह की कोई सार्वजनिक सराहना नहीं होती, वो तो बस एक पारिवारिक कार्यक्रम होता है. रेखा का विवाह दिखने में भले सामान्य विवाह लगता हो. परंतु वह ऐसा नहीं है.

कोरोना महामारी के संकट काल में यह विवाह यमगर वाड़ी में संपन्न हुआ. इस विवाह के लिए मुंबई, पुणे, लातूर, धाराशिव जिले से अनेक लोग आए थे. भाजपा के संगठन मंत्री विजयराव पुराणिक, भिवंडी से सुवर्णा रावल आए. डॉ. शहापूरकर, महादेवराव सरडे, लातूर से लातुरे, ऐसे बहुत लोग विवाह समारंभ में सहभागी हुए. रेखा ना तो कोई सेलिब्रिटी है, ना ही कोई राजकन्या, ना ही किसी धनवान व्यक्ति की या बड़े घराने की बेटी. रेखा बड़े घराने की बेटी नहीं, ऐसे भी कैसे कह सकते हैं? वह संघ के घराने से है. संघ के कार्यकर्ताओं ने यमगर वाड़ी में घुमंतू बच्चों के विकास के लिए प्रकल्प शुरू किया. रेखा इस प्रकल्प की कन्या है. संघ का अर्थ है समाज. इस अर्थ से वह समाज घराने की कन्या है.

यमगर वाड़ी में रेखा अपने तीन भाई बहनों को लेकर आई. उस के आने की एक कथा है. संघ प्रचारक गिरीश कुबेर जी ने भाई बहनों के साथ रेखा को भीख मांगते हुए देखा. उससे पूछताछ करने पर रेखा की वेदनादायी वास्तविकता उनके ध्यान में आई. किनवट के एसटी स्थानक पर कई लोगों ने उसे भीख मांगते देखा होगा, किसी ने भिक्षा दी होगी तो किसी ने गाली गलोच. गिरीश जी ने उसे आत्मीयता दी और रेखा अपने भाई बहन के साथ यमगर वाड़ी प्रकल्प में आई.

रेखा की एक बहन, दो भाई है. उस समय छोटा तो बस दो महीने का था, माँ बाप गुजर चुके थे. रिश्तेदार अपनाने को तैयार नहीं थे. क्या हो जाता इन बच्चों का? यमगर वाड़ी में आ गए और आज फोर्टिस जैसे अस्पताल में नर्सिंग का कम करने वाली रेखा का विकास हुआ. बहन शीतल पुलिस और भाई अर्जुन वैद्यकीय शिक्षा ले रहा है. छोटे भाई रामू ने दसवीं की परीक्षा दी है. इन चारों बच्चों की परवरिश एक परिवार द्वारा करना असंभव था. प्रकल्प का अर्थ है – संगठित शक्ति. संगठन में शक्ति है, यह शाखा में खेला जाने वाला एक खेल है. इस शक्ति का प्रत्यंतर है राठोड़ बंधुओं का विकास.

इन बच्चों की परवरिश प्रकल्प के सभी लोगों ने की. सुजाता, सरस्वती माने, उमाकांत और उनकी पत्नी, सभी शिक्षक गण, कार्यकर्ता गण इन सभी का अगर उल्लेख करें तो मालगाड़ी का डिब्बा तैयार हो जाएगा. परवरिश की जम्मेदारी हम पर क्यों? ऐसा प्रश्न किसी के मन में नहीं आया? क्यों नहीं आया?

हमारा समाज जातियों में बटा हुआ है. प्रकल्प में आए हुए ना उनके जाति के थे, ना ही सगे. नाम से जाति ढूँढने की पुरोगामी नीति संघ में नहीं सिखाई जाती. यहाँ एक ही संस्कार होता है, यह मेरा आत्मीय समाज है. ये सब मेरे सगे भाई बहन हैं. मैं उनका हूँ, वे मेरे हैं. यह आत्मीय भावना ही यमगर वाड़ी का आधार है. रेखा कौन सी जाति से है, दलित है या और कोई, इस विचार को कोई महत्व नहीं.

कुछ दिनों से Black Lives Matter यह विषय चर्चा में है. भारत के वामपंथी कहते हैं कि एससी, एसटी ये अलग वंश के लोग है. कृष्ण वर्ण के लोग है. श्वेत वर्णीय आर्य उन पर अत्याचार करते हैं. यह पढ़कर हमें हंसी आती है, उनकी बुद्धिमत्ता पर दया आती है. यमगर वाड़ी में आने वाले सभी बच्चे अलग वंश के कैसे हो सकते हैं, रेखा का वंश अलग कैसे हो सकता है?

हम सब की माता एक ही है, वह है भारतमाता. हम सब इस भारत माता की संतान हैं. हम बच्चों में जन्मसिद्ध भ्रातृभाव, भगिनी भाव है. यहां पर कोई अनाथ नहीं, सब सनाथ हैं. इस भावना के कारण ही रेखा और यमगर वाड़ी की अन्य कन्याएं दिवाली के दिनों में अनेक परिवारों में जाकर रहती हैं. एकात्मता का अनुभव लेती हैं. हम सब एक हैं, हम सब के सुख-दुख एक समान हैं, उसे बांटना चाहिए यह संस्कार अत्यंत सहज रूप से होता है.

रेखा विवाह आयु की हो गयी. उसका विवाह करवाना यह प्रकल्प का कर्तव्य था. अपने भावी पति को रेखा ने स्वयं चुन लिया था. बालाजी के साथ शादी करने का उसका निश्चय हो चुका था. अनेक अड़चनें आईं. परंतु प्रेम के मार्ग में कांटे तो होते ही हैं. इन कठिनाइयों से मार्ग निकालने का काम सुवर्णा रावल और विजय पुराणिक ने किया. बाला जी के माता-पिता को विवाह के लिए राजी किया.

विवाह है तो खर्च भी होगा. सादगी से किया जाए तो भी लाख-दो लाख रुपये लगते है. २५ हजार रुपये बेटी ने दिए. उस का नाम में नहीं लिखूंगा. अन्यथा लेख पढ़ने के बाद तुरंत उसका फोन आएगा और मुझे सुनना पड़ेगा. अन्य भाई बहनों ने भी खर्च किया. ये अपने ही परिवार का विवाह है, यही भावना इसके पीछे है.

ये सब लिखते-लिखते न जाने मन कब भूतकाल में चला गया. यह एक देश है, एक राष्ट्र है, इसकी एक प्राचीन संस्कृति है. किसने बनाई यह संस्कृति. महर्षि व्यास एक मछुआरे के पुत्र थे, महर्षि वाल्मीकि भी कनिष्ठ जाति के थे, सत्यकाम जाबाल दासीपुत्र थे, ऐतेरेय ऋषि भी दासीपुत्र थे, भगवन श्रीकृष्ण एक ग्वाले के घर में बड़े हुए, रोहिदास चर्मकार, गाडगे बाबा धोबी थे, संविधान देने वाले डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर भी सवर्ण नहीं थे. ये सब और अन्य अनेकों ने इस देश की संस्कृति की रचना की है. रेखा जिस पारधी समाज से है, उस समाज के सम्मान में यहाँ महाशिवरात्रि मनाई जाती है. बीच के कालखंड में रचना बिगड़ गई और यही हमारे समाज बांधव आज की परिभाषा में दलित हो गए. वे वास्तव में देश निर्माता और संस्कृति निर्माता हैं. उन्हें अवसर मिलना चाहिए. सक्षम करना चाहिए. उनके अंगीभूत गुणों के साथ उन्हें बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए. इन्हीं लोगों में भविष्य के व्यास, वाल्मीकि, आम्बेडकर हैं.

रेखा और उसके भाई बहन गुणवान हैं, क्षमतावान हैं, बुद्धिमान हैं. यमगर वाड़ी ने उनके गुणों का विकास किया. जो पहले से था, उसे बढ़ने दिया. अलग-अलग क्रीड़ा प्रकारों में यशस्विता प्राप्त की है. प्रतियोगिता में यश प्राप्त किया है. ये सब हमने नहीं किया. बस जो था उसके विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया. ऐसे देशव्यापी संघ बगीचे का रेखा एक पौधा है. उस की प्रगति देखकर हम सब कृतार्थ होते हैं.

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