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हिमाचल में धार्मिक स्वतंत्रता कानून हुआ सख्त

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शिमला. हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के अंतिम दिन 13 अगस्त, 2022 को प्रदेश में धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक सदन में ध्वनिमत से पारित कर दिया. हिमाचल सरकार धार्मिक स्वतंत्रता कानून-2019 को अधिक सख्त कर दिया है.

अब धार्मिक स्वतंत्रता कानून-2019 के तहत अनुसूचित जाति और अन्य आरक्षित वर्ग के लोग अगर धर्म परिवर्तन करते हैं तो उनको किसी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. इसके अलावा अगर वे धर्म परिवर्तन की बात छिपाकर आरक्षण की सुविधाएं लेते हैं तो ऐसे में उन्हें 3 से 5 साल तक की सजा और 50 हजार से एक लाख रुपये तक का जुर्माना होगा.

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने 12 अगस्त, 2022 (शुक्रवार) को धार्मिक स्वतंत्रता संशोधन विधेयक-2022 सदन में प्रस्तुत किया था और शनिवार को विधेयक को पारित कर दिया गया. संशोधित विधेयक के पारित होने पर हिमाचल में जबरन, कपटपूर्ण तरीके और विवाह के समय जाति छिपाने का खुलासा होने पर सजा का प्रावधान किया गया है.

संशोधित कानून के प्रावधानों के अनुसार, सामूहिक धर्म परिवर्तन जिसमें दो या इससे अधिक लोगों का एक साथ कपटपूर्ण अथवा बलपूर्वक धर्म परिवर्तन करवाने की स्थिति में 7 से 10 साल तक कारावास का प्रावधान है. किसी व्यक्ति द्वारा अन्य धर्म में विवाह करने व ऐसे विवाह के समय अपने मूल धर्म को छिपाने की स्थिति में भी 3 से 10 साल तक के कारावास का प्रावधान है, कानून में 2 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रस्ताव है. धर्म की स्वतंत्रता कानून के प्रावधानों के तहत मिली किसी भी शिकायत की जांच पुलिस उप-निरीक्षक से नीचे का अधिकारी नहीं करेगा. सत्र न्यायालय में इसकी सुनवाई होगी.

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने विधेयक पर चर्चा के जवाब में कहा कि धर्म परिवर्तन की आज जो स्थितियां प्रदेश में बनी हैं, उनमें अत्यधिक कड़े कानून की आवश्यकता है. अभी तक धर्म परिवर्तन की घटनाएं किन्नौर, रामपुर और दूरदराज के क्षेत्रों तक सीमित थीं, लेकिन अब कुल्लू के आनी और बंजार में भी गरीबों का बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन के मामले सामने आए हैं. धर्म परिवर्तन पर चिंता जताई और कहा कि अगर इसे समय रहते न रोका गया तो आने वाले समय में सभी के सामने बहुत बड़ा खतरा होगा.

धर्म परिवर्तन से एक माह पहले नोटिस जरूरी

अधिनियम में धर्म परिवर्तन करने से पूर्व एक महीना पहले मजिस्ट्रेट के सामने शपथपत्र देना होगा. विधेयक में प्रावधान किया गया है कि अगर कोई दोबारा से अपने मूल धर्म में आना चाहता है तो उसे कोई पूर्व नोटिस नहीं देना होगा. अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद भी अपने मूल धर्म के तहत सुविधा प्राप्त करता रहता है तो उसे 2 साल की सजा का प्रावधान किया गया है और इस सजा को 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है. इस तरह के मामलों में अब मुकदमा सत्र न्यायालय में ही चल सकेगा.

2006 के कानून को निरस्त करके लाया गया यह नया कानून

कांग्रेस सरकार के पुराने ‘हिमाचल प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता कानून, 2006’ को निरस्त करके यह नया कानून लाया गया है. मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने विधानसभा में विधेयक पेश करते समय कहा था, “हम उस अधिनियम (2006) के बाद धर्मांतरण को रोकने में सक्षम नहीं हैं. धर्मांतरण के कई मामले सामने आने के बाद भी अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया था. पिछले अधिनियम में 10 संशोधनों की आवश्यकता थी, इसलिए हमने नया विधेयक लाने का निर्णय किया.”

जबरन धर्मांतरण पर सात साल तक की सजा का प्रावधान

हिमाचल प्रदेश में अब जबरन धर्मांतरण पर जो नया कानून लाया गया है, उसके तहत जबरन धर्मपरिवर्तन पर सजा का प्रावधान तीन महीने से लेकर सात साल किया गया है. साथ ही इसे संज्ञेय अपराध और गैर-जमानतीय अपराध की कैटेगरी में रखा गया है, जिसके तहत पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और आरोपी को जमानत देना भी न्यायालय के विवेक पर निर्भर करेगा.

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