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कारसेवकों का बलिदान – 02 नवम्बर, 1990

श्रीराम जन्मस्थान पर बने मन्दिर को बाबर के आदेश से उसके सेनापति मीरबांकी ने 1528 ई. में गिराकर वहां एक मस्जिदनुमा ढांचा बना दिया था. इसके पश्चात् से हिन्दू समाज एक दिन भी शान्त नहीं बैठा. वह लगातार इस स्थान को पाने के लिए संघर्ष करता रहा.

23 दिसम्बर, 1949 को हिन्दुओं ने वहां रामलला की मूर्ति स्थापित कर पूजन एवं अखण्ड कीर्तन प्रारम्भ कर दिया. विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा विषय को अपने हाथ में लेने से पूर्व 76 बार राम जन्मभूमि मुक्त कराने के प्रयास किये. जिसमें देश के हर भाग से हज़ारों नर-नारियों का बलिदान हुआ.

02 नवम्बर, 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार में कारसेवकों पर पुलिस ने बर्बरतापूर्वक गोलियां चलाईं थीं. इसमें अयोध्या के वासुदेव गुप्त, राजेन्द्र धरिकार, रमेश पाण्डेय और कोलकाता के दोनों कोठारी बन्धुओं सहित अनेक कारसेवक बलिदान हो गए थे.

लोगों में तत्कालीन केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश देखा जा रहा था. यह आक्रोश उस बाबरी ढांचे के ख़िलाफ़ था, जो गुलामी का प्रतीक था. रामभक्त उसे किसी भी हालत में देखना नहीं चाहते थे. ढांचा 6 दिसम्बर, 1992 को रामभक्त कारसेवकों द्वारा ढहा दिया गया.

30 अक्तूबर, व 2 नवंबर के दिन अयोध्या पहुंचे बड़ी संख्या में कारसेवकों ने भगवान श्रीराम के मंदिर को मुक्त कराने के लिए विवादित ढांचे पर चढ़कर भगवा ध्वज फहराया था. जिसके बाद वर्तमान की मुलायम सिंह यादव की सरकार ने अयोध्या में गोली चलाने का आदेश दिया. जिसमें न जाने कितनी संख्या में कारसेवकों को गोली मारी गई. आज भी अयोध्या की वह गलियां बलिदानी कारसेवकों की याद दिलाती हैं.

रामजन्मभूमि से लगभग 500 मीटर दूर हनुमानगढ़ी चौराहे से लालकोठी जाने वाले मार्ग को 1990 की घटना के बाद कारसेवकों की याद में शहीद मार्ग कहा जाने लगा. वहीं, दिगंबर अखाड़ा में बलिदानियों के स्मारक चिन्ह भी स्थापित किया गया, जिस पर प्रत्येक वर्ष रामभक्त कारसेवकों को 2 नवंबर के दिन श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

देश में हिन्दू ने ही हमेशा अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए बलिदान देने का काम किया है. 1990 में हिन्दू और संस्कृति की रक्षा को लेकर देश भर से बड़ी संख्या में रामभक्त उस कलंकित ढांचे पर भगवा ध्वज फहराने अयोध्या पहुंचे थे और विवादित ढांचे पर भगवा फहरा कर भगवान श्रीराम की भव्य मंदिर की आजादी की कथा लिखी थी.

4 नवंबर, 1990 को शरद और रामकुमार कोठारी का सरयू के घाट पर अंतिम संस्कार किया गया. उनके अंतिम संस्कार में हजारों लोग उमड़ पड़े थे. दोनों भाइयों के लिए अमर रहे के नारे गूंज रहे थे.

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