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भारतीय सभ्यता-संस्कृति के अनुकूल स्व-तंत्र स्थापित करना होगा – स्वांत रंजन जी

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जयपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक शिक्षण प्रमुख स्वांत रंजन ने कहा कि भारत की जो पहचान है, संपूर्ण विश्व में उसको बढ़ाने के लिए स्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर जाना होगा. स्व-तंत्र स्थापित करना होगा जो हमारी सभ्यता और संस्कृति अनुकूल हो.

वे रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्याधर भाग की ओर से “स्वराज-75 स्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर” विषय पर आयोजित प्रबुद्धजन संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि अपने देश में फ्रेंच, डच, पुर्तगाली और अंग्रेज आए. इन्होंने अपनी ताकत के आधार पर भारत का आर्थिक शोषण किया. केवल आर्थिक शोषण ही नहीं, जो ईसाई देश थे, वहां की ईसाई मिशनरियों ने इन ताकतों का सहयोग लेकर बड़े पैमाने पर हिन्दू समाज का मतांतरण किया.

उन्होंने कहा कि तुर्क, पठान व मुगलों ने भी भारत को लूटने के लिए अनेक आक्रमण किए और तलवार के जोर पर धार्मिक स्थानों को लूटा, महिलाओं का शीलभंग किया और बड़े पैमाने पर मतांतरण किया.

मैकाले शिक्षा नीति के माध्यम से ऐसे लोगों को तैयार करना चाहते थे जो रक्त मांस से भारतीय हो, लेकिन विचार व्यवहार से पश्चिमी हो. अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारतीय समाज शत-प्रतिशत शिक्षित था. भारत में 5 लाख स्वायत्त विद्यालय थे, जिनमें बिना जातिभेद व लिंगभेद के अध्ययन, अध्यापन का कार्य होता था. लेकिन अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा तंत्र को नष्ट कर अपनी शिक्षा पद्धति हम पर थोपी. स्वाधीनता के बाद वामपंथियों व कम्युनिस्टों ने उस शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर बनाए रखा एवं भारतीय इतिहास में गौरव को विघटित किया एवं गौरवशाली इतिहास के प्रसंगों को इतिहास में कोई स्थान नहीं दिया गया.

कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रशांत कुमार अग्रवाल ने की.

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