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शारदीय नवरात्र : वनदुर्गाओं की कहानी – साहसी हमसाय

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नवरात्रि प्रकृति के साथ एकजुट होने और एक साथ मनाने का उत्सव है. नवरात्रि में ऊर्जा, शक्ति, वीरता, पराक्रम की परंपरा है. नवरात्रि यानि आसुरिक विचारधारा पर विजय. हम भारतीय अपने ‘देश’ को एक मां या देवी के रूप में देखते हैं. (भारत माता)

नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है. अपने आस-पास देखें तो देवी के नौ रूप हमारे घर में, चारों ओर मिल जाएंगे. मां, बहन, सहेली, ननद, सास, दादी, मौसी, बुआ, बेटी और हमारी कामवाली – ऐसे कई रूपों में हमें कात्यायनी, शैलपुत्री, सरस्वती, महादुर्गा मिलते हैं. लेकिन हम शक्ति की पूजा करने वाली उन वनदुर्गाओं के बारे में नहीं जानते हैं, जिनके बारे में हमें जानना चाहिए. महिलाएं कभी-कभी समाज द्वारा अनदेखी के कारण और कभी हीनभावना के कारण आगे नहीं आ पाती. जंगल में बिखरी होती हैं, जिनके पास ज्ञान का भंड़ार होता है, जो अपने पैरों पर खड़ी होती हैं और दूसरों के जीवन में भी मूल्य जोड़ने वाली हैं. नवरात्रि के अवसर पर कुछ ऐसे ही वन दुर्गाओं का परिचय दे रहे हैं. उनकी ऊर्जा, हमारी संस्कृति से जुड़ी कड़ी को समाज के सामने लाने का यह प्रयास…

साहसी हमसाय

घर में शिक्षा की कोई परंपरा नहीं. घर में स्थिति भी दयनीय. फिर भी दूर-दराज के क्षेत्र में रहने वाली एक लड़की चुनौतीपूर्ण काम करते हुए हर जगह शिक्षा का संदेश फैला रही है. उसका नाम हमसाय हाफफ्लांबर.

रायपुर के शबरी कन्या छात्रावास में कक्षा एक से पढ़ने वाली हमसाय स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद नागालैंड लौट आई. हमसाय हाफफ्लांबर नागालैंड के दीमापुर जिले के मंगलुमुउ गांव में रहने वाली दीमासा जनजाति की एक लड़की है. आत्मविश्वास, दृढ़ संकल्प और जीवटता के साथ उसने अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों को मात देते हुए कोन्याक के एक बहुत ही दूरस्थ क्षेत्र में ज्ञान प्रदान करने का चुनौतीपूर्ण कार्य स्वीकार करते हुए कल्याण आश्रम में अपनी शिक्षा की विरासत को आगे बढ़ाया है. हमसाय के घर में हालात अच्छे नहीं थे. पिता हमेशा बीमार रहते थे. घर भी छोटा, घर में सब कुछ उसकी मां, छोटी बहन सुशीला और भाई-भाभी देखते थे. हमसाय नृत्य, संगीत और खाना पकाने में पारंगत है. लड़कियों को छात्रावास में नृत्य सीखना हो, उन्हें गाना सिखाना हो तो हमसाय तुरंत तैयार… उसने संगीत में भी विशारद की उपाधि प्राप्त की.

एक बार उसके घर जाना हुआ. हम उसके परिवार से बात करते समय एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते थे, लेकिन चेहरे के भाव छिपे नहीं थे. माता-पिता के रूप में चिंता करना क्या होता है, इसकी झलक हमसाय की बातचीत से बार-बार दिख रही थी. बेटी इतनी दूर पढ़ती है. जब वह घर आती है तो गांव के लोग जादू टोना करने का प्रयास करते हैं. आपस में बैर है, अंधविश्वास है, इसलिए हम घर पर बहुत कम रहते हैं. हम अपने दादा-दादी के घर रहने जाते हैं.

कल्याण आश्रम के लिए कुछ करने के लिए हमसाय लगातार प्रयास कर रही थी. नागालैंड में हिंदी की काफी मांग है. अगर आप छत्तीसगढ़ से 10वीं या 12वीं पास हो तो भी वहां के किसी सरकारी स्कूल में आपको हिंदी शिक्षक की नौकरी मिल जाती है. हमसाय ने भी वहां के सरकारी स्कूल में विधिवत आवेदन किया, सभी दस्तावेज जमा किए और उसे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया…. इंटरव्यू शुरू हुआ..

“साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कल्याण आश्रम, विद्याभारती, रायपुर, छत्तीसगढ़ जैसे तमाम नामों को रोशन किया. ”क्या आप शिक्षिका बनकर कोन्याक जाएंगी?” यह पूछते ही उन्होंने वह चुनौती सहर्ष स्वीकार की.

कोन्याक बहुत ही पहाड़ी, प्राकृतिक क्षेत्र है और यहाँ बारह महीने बहुत ठंड और बारिश होती है. दीमापुर से उस गांव तक जाने में बारह से चौदह घंटे लगते हैं. सड़क बहुत घुमावदार और पहाड़ की घाटियों से भरी है. कुछ किलोमीटर की सड़क ऐसी है कि दोनों ओर बहुत गहरी खाई है. इस क्षेत्र में  सप्ताह में केवल एक दिन ही बस जाती है. मोनू नामक गांव में सन् 1956 में, वॉकचिंग नामक सरकारी पाठशाला शुरू हुई. पहाड़ी क्षेत्र, एक पिछड़ा गांव, शहर से बहुत दूर होने के कारण गांव में अधिक सुविधाएं भी नहीं. वहां जाने के लिए कोई तैयार नहीं होता, लेकिन वहां हमसाय ने कल्याण आश्रम में प्राप्त शिक्षा की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत की. उस जनजातीय गांव में समाज और बच्चों के लिए कुछ करने का उद्देश्य उसके मन में था. अनुशासन, छात्रावास अध्ययन पद्धति, विभिन्न प्रतियोगिताओं की तैयारी, टीम वर्क जैसी कल्याण आश्रम में प्राप्त शिक्षा का लाभ उसे मिला. स्थिति से डरे बिना हमसाय ने पाठशाला के बच्चों को अपने प्यार से जीत लिया. उन्हें राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और अन्य देशभक्ति के गीत सिखाए. उन छात्रों को हिंदी बिल्कुल नहीं आती थी. हमसाय ने उन्हें लिखना, पढ़ना, बोलना सिखाया और एक साल के अथक प्रयास से बहुत ही सुनियोजित तरीके से स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम संपूर्ण हिंदी में मनाया! उस पाठशाला में पहली बार पूरा वंदे मातरम गाया गया.

देशभक्ति के गीत गाए गए. छात्रावास में सीखी सारी अच्छी चीजें वह उन छात्राओं को दे रही थी, यही उसकी उपलब्धि है. स्थानीय सरकारी अधिकारियों ने भी हमसाय के काम पर गौर किया.

कहां छत्तीसगढ़, कहां महाराष्ट्र, नागालैंड, छोटा मंगलुमुउ गांव और सुदूर मोनू गांव, कोन्याक जैसा पिछड़ा इलाका… अपनी उपलब्धियों के कारण कार्य में निरंतरता के कारण हमसाय बढ़ी होती गई.

इस युवती से वाकई बहुत कुछ सीखने जैसा है… दुःख में भी खुश रहना, लगातार संवाद और भी बहुत कुछ….

वैशाली देशपांडे ️

पश्चिम क्षेत्र महिला कार्य सह-प्रमुख, वनवासी कल्याण आश्रम

(विश्व संवाद केंद्र पुणे)

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