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समाज को अपने आसपास के परिवेश के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता – हेमंत जी मुक्तिबोध

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उज्जैन. लोकमान्य तिलक विद्यालय परिसर में चल रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मध्य क्षेत्र के संघ शिक्षा वर्ग द्वितीय वर्ष (सामान्य) का समापन रविवार शाम 6 बजे क्षीर सागर मैदान पर प्रकट कार्यक्रम के साथ हुआ.

मध्य क्षेत्र के सह क्षेत्र कार्यवाह हेमंत जी मुक्तिबोध ने कहा कि आज समाज को अपने आसपास के परिवेश के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता है. समाज में भारत, भारतीयता और हिन्दुत्व के प्रति एक विकृत विमर्श खड़ा करने की कोशिश हो रही है. पाठ्यक्रम, कला, साहित्य, आदि क्षेत्रों को हिन्दुत्व विरोधी विमर्श का केंद्र बनाया जा रहा है. हिन्दू समाज को एक समग्र ईकाई की तरह न देखते हुए उसे जातियों, वर्गों और श्रेणियों में विभाजित समाज के रूप में चित्रित किया जा रहा है.

संघ के वर्गों में शारीरिक तथा बौद्धिक प्रशिक्षण और सामूहिकता तथा सहजीवन के संस्कार प्राप्त कर स्वयंसेवक समाज में अपनी सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करते हैं. समाज की सहभागिता से स्वयंसेवकों के सेवा कार्यों ने सामाजिक परिवर्तन और उत्थान के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं.

इस दौरान मुख्य अतिथि दीपक जी जाटव, वरिष्ठ समाजसेवी, उज्जैन ने भी प्रशिक्षार्थी स्वयंसेवकों को संबोधित किया. इस अवसर पर वर्ग के सर्वाधिकारी चरणजीत सिंह कालरा और उज्जैन महानगर सह संघचालक योगेश जी भार्गव उपस्थित रहे.

“कबीर जयंती पर वर्ग का समापन, महापुरुषों का किया स्मरण”

मध्यक्षेत्र सह कार्यवाह हेमंत जी ने महापुरुषों का स्मरण कर कहा कि आज कबीर जयंती के दिन इस वर्ग का समारोप हो रहा है. कबीरदास जी एक कर्मशील संत थे. उन्होंने समाज को कुरीति और रूढ़ियों से मुक्त रहने की शिक्षा दी. यह वर्ष भगवान महावीर का 2250वां निर्वाण वर्ष है. जिनके 5 सूत्र सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रम्हचर्य, हमारे लिए सामाजिक जीवन की आचार संहिता के समान हैं. जीयो और जीने दो का उनका संदेश वर्तमान को वर्धमान की आवश्यकता को रेखांकित करता है. इसी वर्ष छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के 350 वर्ष पूर्ण हुए हैं. शिवाजी महाराज ने समाज को दासता की मानसिकता से मुक्त किया, आत्मविश्वास और आत्म गौरव जगा कर हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए स्व आधारित राज्य स्थापित करने वाले वे एक युगपुरुष थे. इसी वर्ष स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन के 200 वर्ष पूर्ण हुए. महर्षि दयानंद ने कुरीति निवारण और सामाजिक चेतना के जागरण में महत्वपूर्ण काम किया. अपने सांस्कृतिक आधार के प्रति समाज में मौजूद भ्रम का निवारण करते हुए उन्होंने पुनः वेदों की ओर लौटने का आग्रह किया. महर्षि दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में स्वराज की परिभाषा देते हुए यह स्पष्ट किया की स्वदेशी स्वभाषा और स्वबोध के बिना स्वराज संभव नहीं है. वे भारत के स्वाधीनता संग्राम में एक प्रेरणा पुंज के रूप में सदैव उपस्थित रहे.

प्रशिक्षण हेतु मध्य क्षेत्र के अलग-अलग प्रांतों से 326 शिक्षार्थी स्वयंसेवक 21 दिवसीय संघ शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षण के लिए पहुंचे थे. इस दौरान शिक्षार्थी स्वयंसेवकों को 46 शिक्षकों द्वारा शारीरिक प्रशिक्षण के साथ ही बौद्धिक प्रशिक्षण दिया गया. समापन के अवसर पर क्षीरसागर मैदान पर आयोजित प्रकट कार्यक्रम में स्वयंसेवकों ने नियुद्ध, दंड युद्ध, दंड संचलन, पिरामिड, दंड समता, योग और आसन का प्रदर्शन किया. इस दौरान उज्जैन शहर के गणमान्य नागरिक भी उपस्थित रहे.

“12600 परिवारों से राम रोटी का सहयोग प्राप्त हुआ”

संघ शिक्षा वर्ग में आए 326 शिक्षार्थी स्वयंसेवकों और 46 शिक्षकों के लिए उज्जैन के 600 परिवारों से लगातार 21 दिन तक 10 रोटी प्रति पैकेट अर्थात 12600 परिवारों से राम रोटी का सहयोग प्राप्त हुआ.

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