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विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान भारतीय संस्कृति में विद्यमान – डॉ. मोहन भागवत जी

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जल संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा यह सुमंगलम कार्यक्रम – जस्टिस आदर्श गोयल

भारतीय परंपरा को आत्मसात किया तो जल के लिए कभी युद्ध नहीं होगा – गजेंद्र सिंह शेखावत

उज्जैन. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि जल के विषय में अक्सर वही बातें कही जाती हैं जो अनिवार्य हैं. हमें समस्या और समाधान पर कार्य करना होगा. विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान हमारी संस्कृति में उपुलब्ध है. हम सबको इन समस्याओं को एकात्मक दृष्टि से देखना होगा, तभी निवारण मिलेगा.

सरसंघचालक जी दीनदयाल शोध संस्थान और मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय जल संगोष्ठी के दूसरे दिन मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे. इस अवसर पर एनजीटी के चेयरमैन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल, कोल्‍हापुरा कनेरी मठ के मठाधीश काडसिद्धेश्वर जी महाराज, भारत के जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, वरिष्ठ पर्यावरणविद एवं मणिपुर विश्वविद्यालय के कुलपति अनुपम मिश्र, दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन, डीआरआई के महासचिव अतुल जैन, सहित अन्य उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संचालन अमित गोस्‍वामी ने किया, जबकि आभार दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन ने व्यक्त किया.

मालगुडी डेज परिसर में आयोजित व्याख्यान माला के द्वितीय दिन के मुख्य सत्र का शुभारंभ अतिथियों ने वेद मंत्रोच्‍चार के साथ आम के वृक्ष पर जलार्पण कर किया. तीन दिवसीय आयोजन की समग्र रुपरेखा रखते हुए दीनदयाल शोधसंस्थान के महासचिव अतुल जैन ने कहा कि एक दिन पूर्व इस कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा मंच के माध्यम से रखी जा चुकी है. चूंकि पंच महाभूत विषयों पर कार्य करने के लिए डीआरआई नोडल एजेंसी है और समाज के प्रति हमारा यह दायित्व भी बनता है कि हम समाज को समाज के लोगों के माध्यम से ही एक दिशा प्रदान करें. आने वाले दिनों में भारत पर्यावरण के क्षेत्र में एक अंतरराष्ट्रीय एजेंडा के साथ दुनिया के समक्ष अपनी बात रखेगा. इस कार्यशाला में सभी लोग वैज्ञानिक नहीं हैं. लेकिन वह लोग भी हैं, जिनके पास वैज्ञानिक दृष्टि है. जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम करके स्वयं को सिद्ध किया है. हमें अपनी परंपरागत बातों को नए तरीके से अपनाकर प्रस्तुत करना होगा, जिससे आगे आने वाली पीढ़ी को सही दिशा मिल सके. यही सुमंगलम की कल्पना भी है. कार्यक्रम की रूपरेखा के बाद 83 वर्षीय रामसिंह भीखा ने एक जल गीत की प्रस्तुति दी. सरसंघसंचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उन्हें सम्मानित किया. जगतगुरु जग्गी वासुदेव जी के संदेश का प्रसारण भी किया गया. केन्‍द्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र शेखावत ने कहा कि सारा विश्व ताप को लेकर चिंतित है. वैज्ञानिक भी इस प्रकृति के कहर से परेशान हैं. ऐसे में भारतीय चिंतन एक मार्ग दिखाता है. हमें उसी चिंतन और परंपरा पर चलकर समाधान खोजना होगा. कार्यशाला में पिछले 2 दिनों में भारतीय मनीषा और वांग्मयी के आधार पर जो प्रस्तुति देखने को मिली है, वह समस्याओं के समाधान का बेहतर रास्ता हो तभी हो सकती है, बशर्ते हम इसे अंतिम स्थिति तक ले जाने में सफल हो जाएं. उन्होंने कहा कि समाज को प्रेरित करने वाले आठ से 10 घटक ही होते हैं. परिवार, शिक्षक, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सेलिब्रिटी, ज्यूडिशरी और धर्मगुरु इनसे समाज सीखता है. पिछले कई वर्षों में इनमें से कई ने समाज संबंधित विषयों पर चर्चा कम की है. इस वजह से समस्याओं पर लोगों ने अधिक ध्यान नहीं दिया है. लेकिन पिछले दो दिनों से यह सभी लोग एकत्रित होकर यहां चर्चा कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर यह सिद्ध है कि आने वाले दिनों में हम जल की उपलब्धता और शुद्धि में बाधक नहीं बनेंगे. भारत को विकसित करेंगे, इस संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं. यदि भारतीय परंपरा को आत्मसात किया तो जल के लिए कभी युद्ध नहीं होगा. भारतीय परंपरा और भारतीय मनीषा से यह संभव होगा.

एनजीटी के चेयरमैन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने कहा कि कानून पर लोग तब आते हैं, जब हर जगह से मामला फेल हो चुका होता है. तो फिर कानून के पास केवल डंडा ही बचता है. जिसके आधार पर कोर्ट अपना काम करता है. जबकि कानून के पास इस प्रकार के विषय नहीं आने चाहिए. यह समाज के विषय हैं. समाज को ही रास्ता निकालना चाहिए. हमारा जल के प्रति जो दृष्टिकोण है, वह पश्चिम से भिन्न है. हम इसे जब तक जमीन तक नहीं ले जाएंगे, तब तक सफलता नहीं मिलेगी. हम नदियों की पूजा करते हैं. लेकिन उन्हीं नदियों की स्थिति सही नहीं है. यह भी हमने ही किया है. सन् 1985 में गंगा को मॉनिटर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति बनाई. 25 साल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने वह केस एनजीटी को दे दिया. कहने का आशय यह है कि जब तक हम जमीन पर उतर कर कार्य नहीं करेंगे, तब तक किसी भी नदी को साफ करना मुश्किल है. आज देश में 351 नदियां प्रदूषित हैं, जिनकी वजह से कैंसर जैसे घातक रोग भी हो रहे हैं. नदियों का जल स्तर निरंतर कम हो रहा है और उनकी गति प्रभावित हो रही है. हमें इन पर भी विचार करना होगा. एक पक्ष यह भी है कि 72 हजार मिलीयन लीटर सीवेज प्रतिदिन नदियों में जा रहा है. जबकि 50 फ़ीसदी ही हमारे पास सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं. शेष सीवेज सीधा नदियों में जा रहा है, यह चिंतनीय है. विश्वस्तर पर आज तापमान बढ़ रहा है और यदि यह तापमान 5 डिग्री बढ़ गया तो समस्या बहुत गंभीर हो जाएगी. अतः हमें इन सारे विषयों को समाहित करते हुए चिंतन करना होगा. ऐसी बात नहीं है कि अच्छे प्रयास नहीं हुए हैं. अच्छे प्रयास भी हुए हैं, जिनकी वजह से आज नदियां अविरल भी हैं. जल संवर्धन और संरक्षण में यह सुमंगलम कार्यक्रम निश्चित तौर पर मील का पत्थर साबित होगा. हम इस तरह के प्रयोग नीचे तक ले जाएं, जिससे नदियों की स्वच्छता के लिए काम हो सके. आज की स्थिति में देखें तो हम 351 प्रदूषित नदियों को सही कर सकते हैं. प्रत्येक राज्य के पास 5 या 10 प्रदूषित नदियां आती हैं, जिन पर कार्य करने की आवश्यकता है. ऐसे ग्रुप बनाए जा सकते हैं जो इन विषयों पर प्रैक्टिकली कार्य कर सकें.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि मैं इस संगोष्ठी के बीच में आया हूं. निश्चित बात है कि पिछले सत्रों में जल को लेकर विस्तृत चर्चा हो चुकी होगी. आमतौर पर जल के विषय में वही बातें आती हैं जो अनिवार्य हैं. हमें समस्या और समाधान पर कार्य करने की आवश्यकता है. यदि हम प्रमाणिकता के साथ करेंगे तो हमें सफलता मिलेगी. हमें जमीन पर उतर कर कार्य करना होगा. भारत विभिन्न जातियों-संप्रदाय और अपने आप में विभिन्नता वाला देश है. यहां संपूर्ण देश के लिए एक ही तरीका लागू हो, यह संभव नहीं है. इसलिए देश, काल और परिस्थिति के आधार पर हमें प्रयास करने होंगे. विश्व पटल पर उभरते हुए देश के नाते हमें हल देना होगा, एक विचार देना होगा. एक परंपरा पर चलकर कार्य करना होगा. यह पर्यावरण संबंधी समस्याएं आधुनिक हैं. 250 वर्षों से मानव जाति ने आधुनिकता की दिशा पकड़ी है. तब से यह समस्याएं भी उपजी हैं. हमें मूल को सुधारना होगा. पिछले कई वर्षों से हमने प्रकृति का मालिक बनने का प्रयास किया है. इसीलिए हल नहीं निकल रहा है. जबकि हम प्रकृति के मालिक नहीं सेवक हैं. इसलिए हमें पहले अपना शुद्धिकरण करना होगा. उन्होंने विदर्भ के नारायण पांडे नामक व्यक्ति की जैविक खाद पद्धति का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह समाज में बदलाव लाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि पाश्चात्य पद्धति से खेती करने का परिणाम यह हुआ कि 400 वर्षों के अंदर ही जमीन बंजर हो गई. जबकि पहले ऐसा नहीं था. हमने पंचमहाभूतों को त्याग दिया. इसलिए हमें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. जबकि पंचमहाभूतों का जनक जल है और सारे विश्व की औषधियां जल में ही हैं. हम नदियों को माता मानते हैं. शुभ कार्य में जल छिड़कते हैं. पवित्रीकरण में जल का ही उपयोग करते हैं. परंतु आधुनिकता के चलते हमारे विचारों में अशुद्धि आ गई. इसलिए सबसे पहले स्वयं का प्रबोधन आवश्यक है. हमें यह सिखाया गया है कि सभी संपत्ति राजा की है. रूल ऑफ लॉ जिसे कहते हैं, वह लागू किया गया. जबकि नदी सबकी है, ना कि किसी विशेष व्यक्ति की. हम यदि समझदारी से कार्य करेंगे तो समस्या का समाधान निकलेगा. सभी समस्याएं अधिकार के कारण हैं. सबका है, सबके लिए है… यह भाव यदि बन जाएगा तो किसी भी तरह की परेशानी नहीं होगी. हमारी सोच में जो विकृति आ गई है, पहले उसका सुधार करना आवश्यक है. तभी सर्वत्र सुधार आएगा. परिवर्तन स्वयं से प्रारंभ होता है. इसलिए हम परंपरागत तरीके अपनाएं. नए तरीके उपयोगी हों, उनको लें. पानी का अपव्यय कम करें. ज्यादा जल खर्च करने वाले तरीकों से बचने पर भी हमें विचार करना होगा. पानी को पानी की तरह ना बहाएं. यह आचरण में लाना होगा. अपनी आदतों को बदलने के लिए निरंतर प्रबोधन करना होगा. तभी इन समस्याओं से हम निजात पा सकते हैं. हम प्रकृति का, पर्यावरण का शोषण न करके दोहन करें. उन्होंने आह्वान करते हुए कहा कि हम छोटे-छोटे कार्यों से प्रारंभ करें, जल संरक्षण को दैनिक उपयोग में ले आएं. संपूर्ण विश्व को एक संदेश दें, तभी समाधान निकलेगा.

मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद की पत्रिका का विमोचन किया गया और अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए. अन्य सत्रों में भारतीय प्रज्ञा में जल तत्‍व की महिमा, भारतीय विज्ञान व लोक संस्‍कृति में जल की महिमा, जल संबंधी अधिष्‍ठान व रीति रिवाज, जल संबंधी तीज त्‍यौहार का संकलन और उनका वैज्ञानिक विश्‍लेषण विषयों पर सत्रों का आयोजन किया गया.

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