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आत्मनिर्भरता की कहानी – प्रमोद ने शुरू की एलईडी बल्ब बनाने की ईकाई, संतोष ने चटाई बनाने का पुश्तैनी काम शुरू किया

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नई दिल्ली. कोरोना संकट ने अनेक लोगों का जीवन प्रभावित किया. कुछ मजबूर होकर बैठ गए, कुछ ने समाज को आत्मनिर्भरता की राह दिखाई. कोरोना संकट के कारण रोजगार छिन जाने पर न केवल स्वरोजगार प्रारंभ किया, बल्कि अन्य को भी रोजगार उपलब्ध करवाया. प्रधानमंत्री भी मन की बात मासिक कार्यक्रम में ऐसे लोगों के संबंध में चर्चा करते हैं.

बिहार के बेतिया के मझौलिया प्रखंड के रतनमाला पंचायत के रहने वाले प्रमोद भी उनमें से एक हैं. प्रमोद दिल्ली में एल.ई.डी. बल्ब बनाने वाले एक कारखाने में तकनीशियन थे, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से उन्हें घर वापस लौटना पड़ा. प्रमोद ने अपने घर में एल.ई.डी बल्ब  बनाने की छोटी-सी ईकाई लगाई और कुछ ही महीनों में फैक्ट्री मालिक बनकर कई नौजवानों को रोजगार देने लगे. प्रमोद और उनकी पत्नी संजू देवी ने आत्मनिर्भरता का उदाहरण पेश किया. पति-पत्नी दोनों लॉकडाउन से पहले दिल्ली में मजदूरी का काम करते थे और आज अपने प्रदेश में उद्यमी बन गए हैं.

प्रमोद बैठा ने दर्जनों युवाओं को रोजगार भी दिया है. प्रतिदिन इस छोटे से कारखाने में 1000 एलईडी बल्ब बनकर तैयार होते है. प्रमोद बैठा पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण की दुकानों में एलईडी बल्ब की आपूर्ति करते हैं.

प्रमोद बैठा और उनकी पत्नी संजू देवी के अनुसार दिल्ली से घर आकर इस काम के शुरुआती दौर में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. धीरे-धीरे सफलता मिली. जब कारखाना लगाने में पैसे की कमी आई तो उसकी पत्नी ने उसका साथ दिया. स्वयं सहायता समूह से 25,000 लोन लिया. साथ में कुछ सगे संबंधी मित्रों ने भी खुले हाथ से उसे उधार दिया. जिसकी बदौलत पूंजी तैयार कर उसने 3 लाख 50 हजार रुपये की लागत से बल्ब फैक्ट्री लगा ली.

प्रमोद के कारखाने में काम कर रहे मजदूरों का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान हम लोग अपने घर लौटे थे. अब गांव में ही हमें रोजगार मिल गया. हम अपना घर छोड़कर दूसरे प्रदेश में काम करने नहीं जाएंगे. हमें जो मजदूरी दूसरे प्रदेश में मिलती थी, आज वही हमें यहां मिल रही है.

ऐसी ही कहानी गढ़मुक्तेश्वर के संतोष की भी है. कोरोना काल के दौरान विषम परिस्थिति में संतोष ने अपने पुश्तैनी चटाई बनाने के कार्य को परिवार के साथ दोबारा शुरू किया. उससे न सिर्फ उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई, बल्कि दूसरों के लिए भी उदाहरण प्रस्तुत किया.

संतोष के पुरखे शानदार कारीगर थे. चटाई बनाने का काम करते थे. कोरोना के समय जब बाकी काम रुक गए तो इन लोगों ने ऊर्जा और उत्साह के साथ चटाई बनाना शुरू किया. जल्द ही न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि अन्य राज्यों से भी चटाई के ऑर्डर मिलने शुरू हो गए. संतोष ने बताया कि इससे क्षेत्र की सैकड़ों साल पुरानी खूबसूरत कला को भी एक नई ताकत मिली है.

हापुड़ जिले में गढ़मुक्तेश्वर के चटाई मोहल्ले में करीब 100 से भी अधिक परिवार अपने पुस्तैनी काम को बढ़ावा दे रहे हैं. लंबे समय से चटाई बनाने का काम चलता आ रहा है. छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग तक सभी चटाई बनाने के काम को कर रहे हैं. एक चटाई की कीमत 400 से 500 रुपये होती है. दूर-दूर के राज्यों के व्यापारी तीर्थनगरी से आकर चटाइयां बनवाकर ले जाते हैं और ऑर्डरों पर चटाइयां भी बनवाते हैं.

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