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स्वदेशी दीपावली – महिलाएं गाय के गोबर से बना रहीं दीये व गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति

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प्रतीकात्मक फोटो

लखनऊ. दीपावली में रिद्धि सिद्धि के स्वामी गणेश जी व लक्ष्मी जी की पूजा होती है. प्राकृतिक व स्वदेशी दीपावली के लक्ष्य को ध्यान में रखकर बाराबंकी में ग्रामीण महिलाएं गाय के गोबर से गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां और सुंदर दीये तैयार कर रही है. इन दीयों और मूर्तियों की मांग अयोध्या, इलाहाबाद और वाराणसी से लगातार आ रही है.

उत्तरप्रदेश के बाराबंकी में बनीकोडर ग्राम पंचायत के गजपतिपुर में प्रेरणा ग्राम संगठन की महिलाओं द्वारा एक महीने से गाय के गोबर से दीपक, लक्ष्मी-गणेश, शुभ-लाभ, गोवर्धन पूजा की थाली आदि बनाए जा रहे हैं. संस्था में कार्यरत पूनम, कांति, नीतू, फूलमती, राजरानी सहित दो दर्जन महिलाएं गोबर से सामग्री बना रही हैं.

गाय के गोबर में कपूर मिलाकर मूर्ति, दीया, थाली के साचे में गोबर डालकर धूप में सुखा दिया जाता है. सूखने के बाद उसे एल्यूमीनियम पेंट से कलर किया जाता है. इसके बाद रंग चढ़ाया जाता है. जिससे जलाते वक्त दीपक न जले. दरअसल, एल्यूमीनियम पेंट से गोबर सुरक्षित हो जाता है और दीपक जलने के बाद कपूर की खुशबू महकने लगती है, जिससे वातावरण शुद्ध होता है.

राष्ट्रीय आजीविका मिशन के डिप्टी कमिश्नर सुनील तिवारी ने बताया कि छह इंच की मूर्ति 75 से 85 रुपये में बिकती है. नौ इंच की मूर्ति व थाली दो सौ से ढाई रुपये की और दीया एक रुपये में बिकता है. इसमें लगभग 40 फीसद ही लागत आती है. प्रतिदिन डेढ़ सौ से दो सौ साचों में मूर्ति और दीया बनाए जा रहे हैं. दीपावली में लगभग 30 से 40 हजार मूर्तियां और दीये बनाने का लक्ष्य है. साथ ही 20 हजार मूर्तियां और दीपक अन्य जिलों के लिए बनाए जा रहे हैं.

इसके साथ ही देवरिया में भी लक्ष्मी-गणेश और दीये बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है. देसही देवरिया के बरवां मीरछापर गांव में सेवा भारती द्वारा स्थानीय महिलाओं को गाय के गोबर को उपयोग के बारे में जानकारी दी गई और दीये व लक्ष्मी- गणेश की मूर्ति बनाने का प्रशिक्षण दिया गया.

गौ माता को मानव जीवन के लिए अमूल्य माना गया है. गाय के गोबर का हमारे जीवन में बहुत महत्व है. इसके प्रयोग से अपने घरों सहित पर्यावरण को स्वच्छ और स्वस्थ बनाया जा सकता है.

 

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