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    वे पन्द्रह दिन… / 15 अगस्त, 1947

    आज की रात तो भारत मानो सोया ही नहीं है. दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास, बंगलौर, लखनऊ, इंदौर, पटना, बड़ौदा, नागपुर... कितने नाम लिए जाएं. कल रात से ही देश के कोने-कोने में उत्साह का वातावरण है. इसीलिए इस पृष्ठभूमि को देखते हुए कल के और आज के पाकिस्तान का निरुत्साहित वातावरण और भी स्पष्ट दिखाई देता है. रात भर शहर में घूम-घूमकर, स्वतंत्रता का आनंद लेने के पश्चात् सभी लोग अपने-अपने घरों में पहुंच चुके हैं और उन ...

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    वे पन्द्रह दिन… / 12 अगस्त, 1947

    आज मंगलवार, 12 अगस्त. आज परमा एकादशी है. चूंकि इस वर्ष पुरषोत्तम मास श्रावण महीने में आया है, इसलिए इस पुरषोत्तम मास में आने वाली एकादशी को परमा एकादशी कहते हैं. कलकत्ता के नजदीक स्थित सोडेपुर आश्रम में गांधी जी के साथ ठहरे हुए लोगों में से दो-तीन लोगों का परमा एकादशी का व्रत है. उनके लिए विशेष फलाहार की व्यवस्था की गई. लेकिन गांधी जी के दिमाग में कल रात को सुहरावर्दी के साथ हुई भेंट घूम रही है. शहीद सुहराव ...

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    वे पंद्रह दिन… / 11 अगस्त, 1947

    आज सोमवार होने के बावजूद कलकत्ता शहर से थोड़ा बाहर स्थित सोडेपुर आश्रम में गांधी जी की सुबह वाली प्रार्थना में अच्छी खासी भीड़ है. पिछले दो-तीन दिनों से कलकत्ता शहर में शान्ति बनी हुई है. गांधी जी की प्रार्थना का प्रभाव यहां के हिन्दू नेताओं पर दिखाई दे रहा था. ठीक एक वर्ष पहले,  मुस्लिम लीग ने कलकत्ता शहर में हिंदुओं का जैसा रक्तपात किया था, क्रूरता और नृशंसता का जैसा नंगा नाच दिखाया था, उसका बदला लेने के लि ...

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    वे पंद्रह दिन… / 10 अगस्त, 1947

    दस अगस्त.... रविवार की एक अलसाई हुई सुबह. सरदार वल्लभभाई पटेल के बंगले अर्थात 01, औरंगजेब रोड पर काफी हलचल शुरू हो गयी है. सरदार पटेल वैसे भी सुबह जल्दी सोकर उठते हैं. उनका दिन जल्दी प्रारम्भ होता है. बंगले में रहने वाले सभी लोगों को इसकी आदत हो गयी है. इसलिए जब सुबह सवेरे जोधपुर के महाराज की आलीशान चमकदार गाड़ी पोर्च में आकर खड़ी हुई, तब वहां के कर्मचारियों के लिए यह एक साधारण सी बात थी. जोधपुर नरेश, हनुमंत ...

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    वे पन्द्रह दिन… / 09 अगस्त, 1947

    सोडेपुर आश्रम... कलकत्ता के उत्तर में स्थित यह आश्रम वैसे तो शहर के बाहर ही है. यानी कलकत्ता से लगभग आठ-नौ मील की दूरी पर. अत्यंत रमणीय, वृक्षों, पौधों-लताओं से भरापूरा यह सोडेपुर आश्रम, गांधी जी का अत्यधिक पसंदीदा है. जब पिछली बार वे यहां आए थे, तब उन्होंने कहा भी था कि, “यह आश्रम मेरे अत्यंत पसंदीदा साबरमती आश्रम की बराबरी करता है....” आज सुबह से ही इस आश्रम में बड़ी हलचल है. वैसे तो आश्रम के निवासी सुबह ज ...

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    वे पन्द्रह दिन… / 08 अगस्त, 1947

    शुक्रवार आठ अगस्त.... इस बार सावन का महीना ‘पुरषोत्तम (मल) मास’है. इसकी आज छठी तिथि है, षष्ठी. गांधीजी की ट्रेन पटना के पास पहुंच रही है. सुबह के पौने छः बजने वाले हैं. सूर्योदय बस अभी हुआ ही है. गांधी जी खिड़की के पास बैठे हैं. उस खिड़की से हलके बादलों से आच्छादित आसमान में पसरी हुई गुलाबी छटा बेहद रमणीय दिखाई दे रही है. ट्रेन की खिड़की से प्रसन्न करने वाली ठण्डी हवा आ रही है. हालांकि उस हवा के साथ ही इंजन से ...

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    वे पन्द्रह दिन… / 07 अगस्त, 1947

    गुरुवार, 07 अगस्त. देश भर के अनेक समाचार पत्रों में कल गांधी जी द्वारा भारत के राष्ट्रध्वज के बारे में लाहौर में दिए गए वक्तव्य को अच्छी खासी प्रसिद्धि मिली है. मुम्बई के ‘टाईम्स’ में इस बारे में विशेष समाचार है, जबकि दिल्ली के ‘हिन्दुस्तान’ में भी इसे पहले पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है. कलकत्ता के ‘स्टेट्समैन’ अखबार में भी यह खबर है, साथ ही मद्रास के ‘द हिन्दू’ ने भी इसs प्रकाशित किया है. “भारत के राष्ट्रध ...

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    वे पंद्रह दिन… / 06 अगस्त, 1947

    बुधवार... छः अगस्त. हमेशा की तरह गांधी जी तड़के ही उठ गए थे. बाहर अभी अंधेरा था. ‘वाह’ के शरणार्थी शिविर के निकट ही गांधीजी का पड़ाव भी था. वैसे तो ‘वाह’ कोई बड़ा शहर नहीं था, एक छोटा सा गांव ही था. परन्तु अंग्रेजों ने वहां पर अपना सैनिक ठिकाना तैयार किया हुआ था. इसीलिए ‘वाह’ का अपना महत्व था. प्रशासनिक भाषा में कहें तो यह ‘वाह कैंट’ था. इस ‘कैंट’ में, अर्थात् वाह के उस ‘शरणार्थी कैम्प’ के एक बंगले में, गांधी ...

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    वे पंद्रह दिन… / 05 अगस्त, 1947

    आज अगस्त महीने की पांच तारीख... आकाश में बादल छाये हुये थे, लेकिन फिर भी थोड़ी ठण्ड महसूस हो रही थी. जम्मू से लाहौर जाते समय रावलपिन्डी का रास्ता अच्छा था, इसीलिए गांधी जी का काफिला पिण्डी मार्ग से लाहौर की तरफ जा रहा था. रास्ते में ‘वाह’ नामक एक शरणार्थी शिविर लगता था. गांधी जी के मन में इच्छा थी कि इस शिविर में जाकर देखा जाए. लेकिन उनके साथ जो कार्यकर्ता थे, वे चाहते थे कि गांधी जी वहां न जा सकें. क्योंकि ...

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    वे पन्द्रह दिन… / 04 अगस्त, 1947

    आज चार अगस्त... सोमवार. दिल्ली में वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की दिनचर्या, रोज के मुकाबले जरा जल्दी प्रारम्भ हुई. दिल्ली का वातावरण उमस भरा था, बादल घिरे हुए थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी. कुल मिलाकर पूरा वातावरण निराशाजनक और एक बेचैनी से भरा था. वास्तव में देखा जाए तो सारी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के लिए माउंटबेटन के सामने अभी ग्यारह रातें और बाकी थीं. हालांकि उसके बाद भी वे भारत में ही रहने वाले थे, भारत ...

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