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    राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष : अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण – 14

    नरेंद्र सहगल राष्ट्र की अस्मिता : ‘शौर्य दिवस’ 06 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर बने एक जर्जर ढांचे को भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान पर एक विदेशी आक्रांता द्वारा लगाया गया कलंक का टीका मानकर लाखों कारसेवकों की भीड़ ने इस कलंक को मिटा दिया था. यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त करवाने का यह 78वां प्रयास था. इस दिन को कुछ लोगों ने शौर्य दिवस कहा तो कुछ लोगों ने शर्म का दिन करा ...

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    संघ सेवा कार्य – कोरोना प्रभावित मृत व्यक्ति को सम्मानजनक अंतिम विदाई..!!

    सोनाली दाबक मैं एक महिला स्वयंसेवक "बाबू मोशाय जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है. उसे ना तो आप बदल सकते हैं ना मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिनकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों में बंधी है." आनंद फिल्म का यह कालातीत संवाद एक बार फिर याद करने का कारण है, एक समाजोपयोगी कार्य में अल्प योगदान. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नासिक शहर शाखा द्वारा 21 मई से नासिक शहर में कोरोना प्रभावित मृतकों का दाह संस्कार क ...

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    योगी जी का जाना….

    प्रशांत पोळ योगी जी की मृत्यु का समाचार मन को विषण्ण करने वाला है. उनके जैसा, ऊंचा पूरा, हट्टा-कट्टा, ज़िंदादिल व्यक्ति कोरोना का ग्रास बनता हैं, इस पर विश्वास ही नहीं होता. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महाकौशल प्रांत के सेवा प्रमुख, योगेंद्र सिंह जी को हम सब ‘योगी जी’ नाम से ही जानते थे. उनका पूरा नाम शायद ही किसी को पता होगा. अत्यंत मिलनसार व्यक्तित्व. उनके संपर्क में जो भी आता था, उन्हीं का हो जाता था. २०१४ ...

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    यह चिर-पुरातन पहचान लेकर स्वाभिमान और शक्ति के साथ खड़ा ‘अपना’ भारत है

    डॉ. मनमोहन वैद्य कोरोना महामारी से भारत की लड़ाई के बीच चीन द्वारा लद्दाख में किये अतिक्रमण और गलवान में हुए संघर्ष में सीमा की रक्षा करते 20 भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हुए. इस क्षति की मीडिया में काफी चर्चा हो रही है और साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि 1962 के बाद चीन के साथ ऐसा खूनी संघर्ष पहली बार हुआ है. भारतीय सेना के शौर्य और पराक्रम पर और भारत के नेतृत्व की दृढ़ता-सजगता पर कुछ लोग प्रश्नचिन्ह खड़े कर र ...

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    स्वदेशी समाज की सुख-समृद्धि, सुरक्षा व शांति सहित समग्र व्यवस्थाओं का आधार है – वी. भगैय्या

    नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह वी भगैय्या ने कहा कि स्वदेशी कोई नारा नहीं है या अभियान मात्र नहीं है, बल्कि यह समाज की सुख समृद्धि, सुरक्षा और शांति सहित समग्र व्यवस्थाओं का आधार है. वर्तमान आर्थिक विकास के मॉडल का अनुसरण करते हुए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करके मनुष्य के उपयोग के लिए व्यवस्थाएं खड़ी की गई हैं, जिसके कारण विश्व में अशांति, अविश्वास, अराजकता और असंतोष बढ़ता जा रहा है. इसके ...

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    डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति व सेवा भारती द्वारा रक्तदान शिविर का आयोजन

    इंदौर (विसंकें). डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति एवं सेवा भारती जगन्नाथ के तत्वाधान में आदर्श शिशु विहार बंगाली चौराहा पर सुरक्षित रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया. इंदौर के चिकित्सालयों मे रक्त की कमी महसूस की जा रही थी, इसी विषय को ध्यान में रखते हुए समिति द्वारा यह द्वितीय सुरक्षित रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया. समाज के सभी वर्ग विशेषकर मातृशक्ति, युवाओं एवं समस्त समाज ने बढ़ चढ़कर रक्तदान किया. रक्तदान शिविर ...

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    बातों से नहीं मानते लातों के भूत – अंतिम भाग

           -  नरेन्द्र सहगल • चीन के समर्थन में कांग्रेस और कम्युनिस्ट • सारा देश सरकार एवं सेना के साथ • सेना का मनोबल मत तोड़ो सीमावर्ती गलवान घाटी में चीन के आक्रांता सैनिकों के शर्मनाक दुस्साहस का वीरोचित उत्तर देते हुए भारत के सैनिकों ने चीन की सरकार और फौज को समझा दिया है कि यह 2020 का नया भारत है, 1962 वाला भारत नहीं है और ना ही उस समय जैसी घुटने टेक सरकार ही है. भारत की सरकार, सेना और भारतवासी एकजु ...

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    आपातकाल 1975 – सत्ता के नशे में लोकतंत्र की हत्या : तीन

    भाग एक यहाँ पढ़ें – आपातकाल 1975 – सत्ता के नशे में लोकतंत्र की हत्या : एक भाग दो – आपातकाल 1975 – सत्ता के नशे में लोकतंत्र की हत्या : दो     - नरेन्द्र सहगल प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा 25 जून 1975 को समूचे देश में थोपा गया आपातकाल एक तरफा सरकारी अत्याचारों का पर्याय बन गया. इस सत्ता प्रायोजित आतंकवाद को समाप्त करने के लिए संघ द्वारा संचालित किया गया सफल भूमिगत आन्दोलन इतिहास का एक महत्वपूर्ण पृष्ठ बन ...

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    आपातकाल 1975 – सत्ता के नशे में लोकतंत्र की हत्या : चार

        -  नरेन्द्र सहगल      भाग एक यहाँ पढ़ें – आपातकाल 1975 – सत्ता के नशे में लोकतंत्र की हत्या : एक भाग दो – आपातकाल 1975 – सत्ता के नशे में लोकतंत्र की हत्या : दो भाग तीन – आपातकाल 1975 – सत्ता के नशे में लोकतंत्र की हत्या : तीन संविधान, संसद, न्यायालय, प्रेस, लोकमत और राजनीतिक शिष्टाचार इत्यादि की धज्जियां उड़ा कर देश में आपातकाल की घोषणा का सीधा अर्थ था निरंकुश सत्ता की स्थापना अर्थात् वकील, दलील और अपील ...

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    आपातकाल 1975 – सत्ता के नशे में लोकतंत्र की हत्या : दो

      नरेन्द्र सहगल     भाग एक यहाँ पढ़ें - आपातकाल 1975 – सत्ता के नशे में लोकतंत्र की हत्या : एक इलाहबाद हाईकोर्ट द्वारा सजा मिलने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अपने राजनीतिक अस्तित्व और सत्ता को बचाने के उद्देश्य से जब 25 जून 1975 को रात के 12 बजे आपातकाल की घोषणा की तो देखते देखते पूरा देश पुलिस स्टेट में परिवर्तित हो गया. सरकारी आदेशों के प्रति वफ़ादारी दिखाने की होड़ में पुलिस वालों ने बेकसू ...

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