करंट टॉपिक्स

संघ विचार से परिचित कराती पुस्तक ‘संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति’

Spread the love

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

लेखक लोकेन्‍द्र सिंह की पुस्‍तक ‘संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति’ को आप राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ को समझने का एक आवश्‍यक और सरल दस्तावेज़ समझ सकते हैं. वैसे तो संघ के कार्य और उसे समझने के लिए आपको अनेक पुस्‍तकें बाजार में मिल जाएंगी, किंतु लोकेन्‍द्र सिंह के लेखन की जो विशेषता विषय के सरलीकरण की है, वह हर उस पाठक के मन को संतुष्टि प्रदान करने का कार्य करती है, जिसे किसी भी विषय को सरल और सीधे-सीधे समझने की आदत है. लोकेन्‍द्र सिंह की पुस्‍तक पढ़ते समय आपको हिन्‍दी साहित्य के बड़े विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी यह बात अवश्‍य याद आएगी – “लेखक अपने मन की प्रवृत्ति के अनुसार स्वच्छंद गति से इधर-उधर फूटी हुई सूत्र शाखाओं पर विचरता चलता है. यही उसकी अर्थ सम्बन्धी व्यक्तिगत विशेषता है. अर्थ-संबंध-सूत्रों की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ ही भिन्न-भिन्न लेखकों के दृष्टि-पथ को निर्दिष्ट करती हैं. एक ही बात को लेकर किसी का मन किसी सम्बन्ध-सूत्र पर दौड़ता है, किसी का किसी पर. इसी का नाम है, एक ही बात को भिन्न दृष्टियों से देखना. व्यक्तिगत विशेषता का मूल आधार यही है”. इसी तरह से ‘हिन्दी साहित्य कोश’ कहता है कि “लेखक बिना किसी संकोच के अपने पाठकों को अपने जीवन-अनुभव सुनाता है और उन्हें आत्मीयता के साथ उनमें भाग लेने के लिए आमंत्रित करता है. उसकी यह घनिष्ठता जितनी सच्ची और सघन होगी, उसका लेखन पाठकों पर उतना ही सीधा और तीव्र असर करेगा”. वस्‍तुत: इन दो अर्थों की कसौटी पर बात की जाए तो यह पुस्‍तक पूरी तरह से अपने साथ न्‍याय करती हुई देखाई देती है. संघ पर लिखी अब तक की अनेक पुस्तकों के बीच यह पुस्‍तक आपको अनेक भाव-विचारों के बीच गोते लगाते हुए इस तरह से संघ समझा देती है कि आप पूरी पुस्‍तक पढ़ जाते हैं और लगता है कि अभी तो बहुत थोड़ा ही हमने पढ़ा है.

संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नन्दकुमार ने पुस्तक की समीक्षा लिखी है. प्रस्तावना के अंत में जब वे लिखते हैं कि मेरा विश्वास है कि यह पुस्तक संघ के दृष्टिकोण, विचारों और संघ दर्शन समझने में सभी सुधीजन पाठकों के लिए सहायक सिद्ध होगी, तो उनके यह लिखे शब्‍द अक्षरशः सत्‍य ही हैं. ‘संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति’, वस्तुत: सभी राष्ट्रीय विचार रखने वालों के मन की अनुभूति है. लेखक लोकेन्द्र सिंह ने ‘राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ’ को इतनी सरलता से समझाया है कि आप अनेक प्रकार के भ्रमों के बीच भी संघ की वास्तविक प्रतिमा के दर्शन कर सकते हैं. लोगों के मन में अनेक प्रश्‍न उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं कि संघ आखिर है क्‍या? ऐसा क्‍या है इसमें कि अनेक लोग अपना जीवन समर्पित करके ‘मन मस्त फकीरी धारी है, अब एक ही धुन जय जय भारत’ के गान में लगे हैं अथवा ‘संघ किरण घर-घर देने को अगणित नंदादीप जले, मौन तपस्वी साधक बन कर हिमगिरि सा चुपचाप गले’, का भाव धर अनेक कार्यकर्ता अपने जीवन का उत्‍सर्ग करने में दिन-रात लगे हुए हैं. इस तरह के अनेक प्रश्‍नों के उत्तर आपको इस पुस्तक में मिलते हैं. संघ को लेकर उठते अनेक प्रकार के अन्य प्रश्नों के उत्तर भी इस पुस्तक में हैं.

संघ स्थापना को आज से दो वर्ष बाद 100 वर्ष पूरे हो जाएंगे. संघकार्य के लिए जीवन अर्पण करने वाले ऋषितुल्य प्रचारक हों या गृहस्थ जीवन की साधना के साथ संघमार्ग पर बने रहने की तपस्या करने वाले स्वयंसेवक, वास्‍वत में यह उनकी सतत तपश्‍चर्या का ही परिणाम है जो आज समाज जीवन में, प्रत्‍येक दिशा में संघ विचार और प्रेरणा से भरे कार्यकर्ता, प्रकल्प और संस्थाएं दिखाई देती  हैं. वस्‍तुत: लेखक लोकेन्‍द्र सिंह की पुस्‍तक उन तमाम सेवा के संघनिष्‍ठ संगठनों और प्रकल्‍पों से परिचित कराती है, जो आज राष्‍ट्र जीवन को एक नई और श्रेष्‍ठ दिशा देने का कार्य तो कर ही रहे हैं साथ ही भविष्‍य के उस भारत के प्रति आश्‍वस्‍ती देते हैं जोकि विश्‍व का सिरमौर होगा.

पुस्‍तक यह भी स्‍पष्‍ट करती जाती है कि ऐसा कोई भी सकारात्मक कार्य नहीं है, जिसे स्वयंसेवक पूर्णता प्रदान नहीं कर सकते या नहीं कर रहे हैं. इसके साथ ही यह पुस्‍तक बतलाती है कि कैसे हम ‘स्वत्व’ से दूर रहे और ‘स्व’ पर ‘तंत्र’ हावी होता चला गया. स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती से लेकर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक ने स्वत्व के जागरण के लिए काम किया. जब-जब, जहां पर भी सत्व के जागरण के लिए कार्य होगा, इसके अंतर्गत आप कोई भी परिवर्तन कीजिए वह समाज का भला ही करेगा. कुल निष्‍कर्ष रूप में भारत का उत्‍थान ‘स्‍व’ के जागरण में ही निहित है.

प्रमाण सहित यह भी बताया गया है कि संघ की महत्ता दर्शन और विचार को केवल राष्ट्रप्रेमी ही नहीं अपितु कांग्रेस जैसे विरोधी और विपक्षी भी स्वीकारते दिखते हैं. जिसका बड़ा उदाहरण स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री का युद्ध के समय संघ से सहायता मांगना है. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जैसे अनेक श्रेष्‍ठजन हैं, जिन्‍होंने संघ के महत्व को समझा और यह प्रक्रिया सतत प्रवाहमान है. देश की स्वतंत्रता से लेकर वर्तमान समय तक के अनेक प्रश्‍नों के समाधान यह छोटी सी दिखने वाली पुस्‍तक करने में सक्षम है. जो लोग भूलवश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनीति से जोड़ देते हैं, पुस्‍तक उनकी जिज्ञासाओं का भी समाधान कर देती है.

संघ मानता है कि भारत उन सभी का है, जिनका यहां जन्म हुआ और यहां रहते हैं, फिर चाहे वे किसी भी मत-पंथ या संप्रदाय के हों. भारत के राजनीतिक भविष्य के संदर्भ में संघ अनुभव करता है कि यहां बहुत से राजनीतिक दल होंगे, किंतु वे सब प्राचीन भारतीय परंपरा एवं श्रद्धालुओं का सम्मान करेंगे. आधारभूत मूल्य तथा हिन्दू सांस्कृतिक परंपराओं के संबंध में एकमत होंगे, मतभेद तो होंगे लेकिन ये केवल देश के विकास के प्रारूपों के संदर्भ में ही होंगे. संघ को समझने और संघ की दृष्टि में हिन्दुत्व की संकल्पना को सरल और अल्प शब्दों में समझाने का उदार प्रयास इस पुस्‍तक के माध्‍यम से हुआ है.

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह पुस्तक, जो संघ से परिचित हैं उनकी समझ को और अच्छा बनाने का सामर्थ्‍य रखती है. जो अपरिचित हैं, उन्हें संघ से परिचित कराती है. जो संघ विरोधी हैं, उनके विरोध के कारणों का समाधान एवं उनके लिए स्‍पष्‍ट उत्‍तर प्रस्‍तुत करती है. यह ठीक ढंग से समझा देती है कि अपनी मिथ्या धारणाओं से मुक्त होकर इस राष्ट्रीय विचार के संगठन को समझने का प्रयास करें. पुस्‍तक अर्चना प्रकाशन, भोपाल से प्रकाशित है. कुल कीमत 160 रुपए रखी गई है.

पुस्तक – संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति

लेखक : लोकेन्द्र सिंह

मूल्य : 160 रुपये (पेपरबैक) और 250 रुपये (साजिल्द)

पृष्ठ : 156

प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन, भोपाल

(समीक्षक – फिल्‍म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्‍य एवं न्‍यूज एजेंसी हिन्‍दुस्‍थान समाचार के मप्र राज्‍य प्रमुख हैं.)

Leave a Reply

Your email address will not be published.