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खतरा तालिबान नहीं तालिबानी सोच है

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राजीव सचान

बात बहुत पुरानी है, जब भारतीय शासक अफगानिस्तान में शासन करते थे. ऐसे अंतिम शासक थे महाराजा रणजीत सिंह, लेकिन यह बात ज्यादा पुरानी नहीं, जब अफगानिस्तान एक आम एशियाई देश था, जहां लड़कियां पश्चिमी परिधानों में स्कूल-कालेज जाती थीं और भारतीय फिल्मकार अपनी फिल्मों की शूटिंग करने वहां जाते थे. शायद अफगानिस्तान में शूट होने वाली आखिरी हिंदी फिल्म थी-खुदा गवाह. अब इस सबकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि वे तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में काबिज हो गए हैं, जो सदियों पुरानी कबीलाई मानसिकता में जी रहे हैं और जिन्होंने काबुल में कब्जा जमाते ही शरिया लागू करने के इरादे जाहिर कर दिए हैं. इसके तहत लड़कियों को स्कूल जाने और महिलाओं को अकेले घर से बाहर निकलने की मनाही होगी. अब वे किसी दफ्तर में काम करने की सोच भी नहीं सकतीं. जो कामकाजी महिलाएं थीं, वे घरों में दुबक गई हैं और टीवी चैनलों ने अपनी महिला एंकरों को या तो हटा लिया है या बुर्का पहनकर काम करने को कहा है. फिलहाल काबुल में मौजूद विदेशी टीवी चैनलों की महिला संवाददाताओं ने भी बुर्कानुमा परिधान धारण कर लिया है. सार्वजनिक स्थलों में जिन होर्डिंग में महिलाएं दिख रही थीं, उन्हें या तो हटाया जा रहा है या फिर उन पर कालिख अथवा सफेदी पोती जा रही है. यह सब तब हो रहा है, जब तालिबान कह रहा है कि महिलाओं को सरकार में शामिल किया जाएगा.

तालिबान नेताओं की बातों पर भरोसा नहीं

तालिबान नेताओं की बातों पर भरोसा न होने के कारण ही लोगों में अफगानिस्तान छोड़ने की होड़ लगी है. अफगान नागरिकों को तालिबान के शासन वाले अफगानिस्तान में अपना कोई भविष्य नहीं दिख रहा है. महिलाएं कुछ ज्यादा ही दहशतजदा हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि उनकी आजादी पर कट्टरता का कठोर पहरा बैठने वाला है और उनकी जिंदगी गुलामों जैसी होने वाली है. तालिबानी मध्ययुग की बर्बर सोच वाले लोग हैं. भले ही काबुल हवाईअड्डे के भयावह हालात यह प्रकट करते हों कि हजारों हजार अफगानी देश छोड़ने के लिए तत्पर हैं, लेकिन अफगानिस्तान में तमाम लोग ऐसे भी हैं, जो तालिबान के समर्थक हैं. तालिबान केवल इसलिए आसानी से अफगानिस्तान में काबिज नहीं हो गए, क्योंकि अमेरिका ने अपनी सेनाओं को आनन-फानन वापस बुलाने का फैसला कर लिया और अफगान सेना बहुत पिलपिली निकली. तालिबान की राह इसलिए भी आसान हो गई, क्योंकि अफगान जनता का एक वर्ग ऐसा है, जो तालिबानी सोच वाला है और जिसे शरिया में कोई बुराई नहीं नजर आती. अमेरिकी संस्था प्यू के एक सर्वेक्षण के अनुसार अफगानिस्तान के 90 प्रतिशत से अधिक लोग शरिया के पक्षधर हैं. ऐसी ही सोच वाले लोग पाकिस्तान में भी हैं. पाकिस्तान किस तरह तालिबान के लौट आने से गदगद है, इसका उदाहरण है पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का बयान. तालिबान खान की उपाधि पा चुके इमरान खान का कहना है कि तालिबान ने काबुल में काबिज होकर अफगानिस्तान को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराया है.

अफगानिस्तान का भविष्य

अफगानिस्तान का भविष्य क्या होगा, पता नहीं, लेकिन तालिबान के काबुल में कब्जा कर लेने के बाद पाकिस्तान में जश्न का सा माहौल है. सरकार और सेना के साथ पाकिस्तान के तमाम लोग खुश हैं. उन्हें भी इमरान खान की तरह लगता है कि तालिबान के अफगानिस्तान में काबिज हो जाने में कुछ भी गलत नहीं. उन्हें अपने यहां न सही, अफगानिस्तान में शरिया लागू होती दिख रही है और यह उनके लिए खुशी की बात है. अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे पर खुश होने वाले लोग दुनिया के और देशों में भी हैं. दुर्भाग्य से ऐसे लोग भारत में भी हैं. इंटरनेट मीडिया पर ऐसे कई भारतीय मिल जाएंगे, जो तालिबान की तारीफ कर रहे हैं और उन्हें अफगानिस्तान की सत्ता का वैध दावेदार बता रहे हैं. एक वायरल चैट में जब एक तालिबान प्रेमी उत्साहित होकर यह खुशखबरी सुनाता है कि राष्ट्रपति अशरफ गनी इस्तीफा देकर अफगानिस्तान से चले गए हैं तो अन्य लोग-अलहमदुल्ला-कहकर खुशी जताते हैं. वे अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे को आजादी की जंग की जीत के तौर पर रेखांकित करते हैं. ये सब अनाम-गुमनाम लोग नहीं. इनमें तथाकथित एक्टिविस्ट, पत्रकार और नेता भी हैं. संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बर्क ने अफगानिस्तान पर तालिबानी कब्जे को सही ठहराते हुए कहा कि तालिबान की कार्रवाई वैसी ही है, जैसी हम भारतीयों की आजादी की लड़ाई की थी. यह वही बर्क हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले कहा था कि कोरोना की आफत इसलिए आई, क्योंकि भारत सरकार ने शरिया से छेड़छाड़ की है.

तालिबान काबुल में काबिज

तालिबान के काबुल में काबिज होने के बाद इस्लामिक स्टेट और अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों के सिर उठा लेने के तो प्रबल आसार हैं ही, यह भी अंदेशा है कि पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन लश्कर एवं जैश और अधिक बेलगाम हो जाएंगे. वे इन दिनों तालिबान की मदद के इरादे से अफगानिस्तान में सक्रिय हैं. इसका अंदेशा है कि वे नए सिरे से कश्मीर का रुख कर सकते हैं. आशंका यह भी है कि उन्हें तालिबान की मदद भी मिल सकती है. तालिबान का मददगार केवल पाकिस्तान ही नहीं, चीन भी है. चीन और पाकिस्तान तालिबान को भारत के खिलाफ उकसाने का काम कर सकते हैं. वैसे तो भारत को तालिबान से सीधे तौर पर खतरा नहीं है, लेकिन तालिबानी सोच से खतरा अवश्य है. इसी सोच के कारण एक समय कश्मीर में इस्लामिक स्टेट के झंडे लहराए जाते थे. इस्लामिक स्टेट और तालिबान में यदि फर्क है तो केवल उनके काले-सफेद झंडों का.

साभार – दैनिक जागरण

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