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हिन्दू समाज में आई कुरीतियां इस्लामिक आक्रमण की देन – विनायकराव देशपांडे

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घाटकोपर, मुंबई में अग्रसेन भवन में समरसता संगोष्ठी संपन्न हुई. विश्व हिन्दू परिषद के संगठन महामंत्री विनायकराव देशपांडे जी ने संगोष्ठी में संबोधित किया.

सामाजिक समरसता सप्ताह में आयोजित व्याख्यान की शुरुआत करते हुए विनायक देशपांडे ने कहा कि ‘हम सब प्रबुद्धजन अंतर्मुख होकर जब विचार करते हैं कि आज भी हिन्दू समाज में अस्पृश्यता का प्रचलन शुरू है. मन में प्रश्न आता है कि हिन्दू धर्मग्रंथ तथा तत्वज्ञान में कहीं भी छुआछूत के बारे में उल्लेख नहीं है, तो यह अस्पृश्यता कहां से आई? हम सब देखते हैं कि संत रामानंदाचार्य, संत नरसी मेहता, संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर, संत रविदास इत्यादि महानुभाव ने छुआछूत का प्रखरता से विरोध किया है. तत्वज्ञान में तो हम सर्वश्रेष्ठ हैं, लेकिन आचरण में हम कम पड़ते हैं. हमारी कथनी और करनी में अंतर है. भारत के अतीत में सत्य काम जाबालि, महर्षि वेदव्यास तथा अनेकों ऋषियों ने योगदान दिया है जो उच्च वर्ण या सवर्ण समाज से नहीं थे. “ये छुपाछूत की बिमारी कब आई?”

उन्होंने कहा कि अस्पृश्यता वेदों में नहीं, रामायण-महाभारत आदि ग्रंथों में नहीं. चौथी शती में चीनी प्रवासी के प्रवास वर्णन हमें मिलते हैं, उसमें भी छुआछूत का वर्णन नहीं है.

छठी शताब्दी में संस्कृत लेखक बाणभट्ट के कादंबरी ग्रंथ में राजा शूद्रक चांडाल राजा की राज कन्या से विवाह करता है, ऐसा उल्लेख है. इसका अर्थ यह हुआ कि छठी शताब्दी में भी राजा और चांडाल में विवाह संबंध होते थे. देशपांडे जी ने प्रतिपादित किया कि इस्लाम के आक्रमण के बाद छुआछूत की कुरीतियां हिन्दू समाज में आईं. पृथ्वीराज चौहान के पराजय के बाद संपूर्ण हिन्दू समाज में एक हतप्रभता का भाव आया और इस्लामी आक्रमणकारियों ने अनेकों राजाओं को बल से मुस्लिम धर्म अपनाने को मजबूर किया. जिन्होंने ने इस्लाम कबूल नहीं किया, उनको मैला ढोने के काम में लगा दिया.

गांधीवादी सर्वोदयी नेता प्रोफेसर मलकानी की रिपोर्ट का प्रमाण देकर देशपांडे जी ने कहा कि 80% वाल्मीकि समाज के लोगों का गोत्र क्षत्रियों का है और 20% ब्राह्मणों का. इसका अर्थ यह हुआ कि जिन क्षत्रियों ने इस्लाम धर्म नहीं अपनाकर हिन्दू धर्म में नीचे स्तर का काम किया, वह सभी समाज हमारे विशेष आदर के पात्र होने चाहिए. आज हिन्दू समाज को उनकी धर्म परायणता पर गर्व महसूस करना चाहिए. डॉ. के.एस. लाल लिखित The growth of scheduled cast in India पुस्तक का प्रमाण देते हुए कहा कि इस्लाम आने के बाद विभिन्न जातियां और समाज में भेदभाव बढ़ा. अंग्रेजों ने भी 429 जातियों का विवरण देकर हिन्दू समाज को विभिन्न जातियों में बांटा.

विनायकराव देशपांडे ने कहा कि क्रिकेट में हम कभी बैकफुट पर जाकर खेलते हैं या फ्रंट फुट पर जाकर खेलते हैं. इस्लाम के अनवरत आक्रमणों से परेशान होकर हमारे पूर्वजों ने धर्म की रक्षा के लिए कुछ बंधन खुद पर डाले जैसे पर्दा प्रथा. इसको हम बैकफुट पर जाकर खेलना कह सकते हैं. रामायण में सीता जी का स्वयंवर हुआ, तब उन्होंने घूंघट नहीं डाला था वैसे ही महाभारत में द्रोपदी ने घूंघट नहीं डाला था. इसका अर्थ यह हुआ कि इस्लाम के आक्रमण के बाद हिन्दू परियों का घर से बाहर जाना उचित नहीं समझा गया. जैसे कछुआ उसके ऊपर आक्रमण होने के बाद अपने हाथ और अन्य इंद्रियां अंदर सिकोड़ लेता है वैसे ही हिन्दू समाज ने कुछ बंधन अपने अस्तित्व की लड़ाई जीतने के लिए डाले.

जिन जगह पर इस्लाम का राज्य था, उन स्थानों पर हिन्दुओं में विवाह रात में होता था और जिन स्थानों पर इस्लाम का राज्य नहीं था, वहां दिन में शादियां होती थी. और बाल विवाह की प्रथा भी हमारे यहां इस्लाम के आक्रमण के पहले नहीं थी. इस्लाम ने जहां आक्रमण किया, वहां स्त्रियों के साथ बर्बरता पूर्ण व्यवहार किया है. इसलिए बाल विवाह की प्रथा का प्रचलन हुआ. ताकि बाल्यकाल से ही स्त्री का उसके मायके और ससुराल वाले रक्षण कर सकें.

14वीं सदी में समुद्र उल्लंघन करने के लिए भी प्रतिबंध लगा दिया. इसका एक कारण यह भी था कि समुद्र लंघन करने के बाद धर्मांतरण बढ़ जाएगा और जो कोई बचा हिन्दू समाज है, वह भी परिवर्तित होगा.

डॉ. भीमराव आंबेडकर के सामाजिक समरसता के विचारों पर भाष्य करते हुए उन्होंने कहा कि बाबा साहब आंबेडकर ने बुद्ध धर्म को अपनाया. भारत की परंपरा से ही जन्मे बुद्ध धर्म में प्रवेश करके हिन्दू समाज पर बहुत बड़ा उपकार किया है. यदि डॉ. आंबेडकर ईसाई या मुस्लिम बन जाते तो आज के अनुसूचित वर्ग के लोग भी मुस्लिम बन जाते और हिन्दू और मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात बिगड़ जाता.

हमें अंतरमुख होकर यह विचार करना होगा कि भारत का स्वर्णिम भविष्य बनाना है तो समरसता का भाव हर एक भारतीय के मन में जगाना होगा. इस कार्य में प्रबुद्धजनों का भी जुड़ना बहुत आवश्यक है. बढ़ते धर्मांतरण को रोकने के लिए समग्र हिन्दू समाज को जाति पंथ भूलकर एकत्र आना होगा. संगोष्ठी के समापन के बाद प्रीतिभोज संपन्न हुआ.

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