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मराठवाडा मुक्ति संग्राम का पहला बलिदानी – बलिदानी वेद प्रकाश

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हैदराबाद रियासत में मुस्लिम शासक (निजाम) था, लेकिन यह हिन्दू बहुसंख्यक रियासत थी. निजाम के पास रजाकार, इत्तेहादुल मुस्लमीन, खाकसार, सिद्धकी, निजाम सेना, इस प्रकार के शस्त्रधारी संगठन थे. वह इन संगठनों का उपयोग भारत के विरुद्ध अथवा बहुसंख्यक हिन्दू समाज की शक्ति को दबाने के लिए करता था. इन पालतू संगठनों के प्रमुख अत्यंत धर्मांध, हिन्दू द्वेषी और कट्टर लोग होते थे.

निजाम के इन संगठनों का एकमात्र कार्य बहुसंख्यक हिन्दू समाज को प्रताड़ित करना होता था. हजारों मुस्लिम इन संगठनों से जुड़े हुए थे. ऐसे में बीड़ जिले के धारूर और कर्नाटक के बिदर में आर्य समाज लगातार शक्तिशाली हो रहा था. मगर आर्य समाज के अनुयायियों को निजाम के रजाकार जानबूझकर प्रताड़ित कर रहे थे.

ऐसे कठिन समय में एक और जहाँ उदगीर, बसवकल्याण, लातूर, निलंगा और गुंजोटी स्थानों के आर्य समाज के कार्यकर्ता गांव-गांव में आर्य समाज की स्थापना कर रहे थे. वहीं दूसरी ओर भारत के अन्य भागों से भी कम से कम डेढ़ से दो हज़ार युवा आर्य समाजी कार्यकर्ता रियासत के कोने-कोने में घूमकर हिन्दू समाज में जन जागृति का कार्य कर रहे थे. गुंजोटी उस समय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान था.

उस समय, गुंजोटी में कट्टर मुस्लिम संगठन इत्तेहादुल मुस्लमीन के अत्याचार चरम पर थे. परंतु, इस संगठन का सामना करने के लिए आर्य समाजी नवयुवकों का एक पूरा वर्ग सदैव तत्पर खड़ा रहता था. 1927 के आसपास आर्य समाज अपने विभिन्न कार्य जैसे श्री कृष्ण पाठशाला, श्री कृष्ण वाचनालय एवं व्यायामशाला की स्थापना के माध्यम से नई पीढ़ी में सत्संग, व्यायाम, आत्मनिर्भरता और शिक्षा जैसे गुणों को बढ़ाने और विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा था.

वेद प्रकाश नामक युवक जनजागृति अभियान का एक महत्वपूर्ण व सक्रिय आर्य समाजी कार्यकर्ता था. वह युवकों को निडरता एवं व्यायाम के लिए प्रोत्साहित किए जाने वाले सार्थक प्रयासों के कारण गुंजोटी ही नहीं, बल्कि आसपास के अनेक भागों में लोकप्रिय हो था. वेद प्रकाश का वास्तविक नाम दासप्पा शिव हरप्पा हरके था. 1917 में जन्मे तेजस्वी वीर युवक ने मात्र 20 वर्ष की आयु में मराठवाड़ा की मुक्ति के लिए स्वयं को समर्पित कर एक उन्मादी व जातिवादी शक्ति एवं सत्ता के विरुद्ध धर्मयुद्ध में अपने योगदान के स्वरूप स्वयं का अमर बलिदान दिया.

23 फरवरी का वह काला दिन, जब आर्य समाज के पदाधिकारी भाई बंशीलाल जी गुंजोटी आने वाले थे. उनके स्वागत की तैयारियाँ चल रही थीं, आसपास के अनेक गांवों से बड़ी संख्या में आर्य समाजी ‘जो बोले सो अभय, वैदिक धर्म की जय’ के नारों एवं जयकारों के साथ गुंजोटी गांव में आना शुरू हो गए थे.

भाई बंशीलाल जी को लेने के लिए वेद प्रकाश ब्रह्म मुहूर्त में उठकर (सुबह) उमरगा नामक गांव चला गया था. सुबह से शाम तक भूखा प्यासा वेदप्रकाश बंशीलाल जी की प्रतीक्षा करता रहा, दूसरी तरफ काफी प्रतीक्षा करने के बाद बाहर से आए हुए लोग भी निराश होकर धीरे-धीरे गुंजोटी गांव से जाने लगे थे. लगभग 4:00 बजे तक सारे लोग अपने- अपने गांव लौट चुके थे, अब मात्र स्थानीय लोग ही गांव में बचे थे. निजाम के भेड़ियों के संगठन इत्तेहादुल मुस्लमीन को यह खबर लग चुकी थी कि अब सब जा चुके हैं अर्थात् रास्ता साफ है. अतः निजाम के इन संगठित गुंडों ने अपना असली रंग दिखाते हुए हिन्दुओं के साथ बिना किसी आधार के जान बूझकर वाद-विवाद शुरू कर दिया, जिसका समापन एक भयंकर दंगे के रूप में हुआ.

दूसरी ओर जब शाम तक भाई बंशीलाल जी नहीं आए तो निराश होकर वेद प्रकाश गुंजोटी गांव के लिए निकल गया. दिन भर भूखा होने के कारण उसने सीधे घर जाकर खाना खाया. गाँव में हुए विवाद और दंगों से अनभिज्ञ वेद प्रकाश ने अचानक “वेद धर्म की जय” की आवाजें सुनीं. उसने सोचा शायद भाई बंशीलाल जी आ गए हैं, अतः खुश होकर वह तुरंत ही बाहर आया. बाहर आते ही उसे इत्तेहादुल मुस्लमीन के लगभग ढाई सौ गुंडों ने वैसे ही घेर लिया था, जैसे महाभारत में वीर अभिमन्य को कौरवों ने घेरा था. फिर भी अभिमन्यु लड़ा. नि:शस्त्र वेद प्रकाश भी शस्त्रधारी पठानों से लड़ा. लेकिन अचानक किसी ने पीछे से वार कर बहादुर वेदप्रकाश सिर धड़ से अलग कर दिया.

मराठवाडा एवं हैदराबाद के मुक्ति (स्वतंत्रता) संग्राम के हवन में बीस वर्षीय वेदप्रकाश द्वारा दी गई आहुति थी. मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए और निजाम के अत्याचारों के विरुद्ध वेद प्रकाश के रूप में मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम का पहला बलिदान था. जिस दिन वेद प्रकाश का बलिदान हुआ, वह दिन पवित्र नाग पंचमी का दिन था. इस दिन आज भी जब लड़कियां अपने ससुराल से मायके आती हैं तो लोकगीत के माध्यम से बलिदानी वेद प्रकाश के बलिदान का स्मरण करती हैं.

वेद प्रकाश मारीयले. हे गं कळलं कळलं शहारायात ॥

शिर आर्यांच, आर्यांच दारायात. शिर गवंड्च्या गवंडच्या दारायात ॥

भुईवर पडले रक्ताच्या थारोळ्यात. पायलाच वीर निजामी सौस्थानात ॥

नाहीं कळालं कळालं नाहीं देवा. द्रोपदी म्हणिते हाती सुदर्शन घ्यावा ॥

इस लोक गीत के माध्यम से तत्कालीन समाज की व्यथा व भावनाओं का ज्ञान होता है. गीत के माध्यम से वे कहती है कि रात के समय अचानक धर्मांध गुंडों ने वेद प्रकाश की हत्या कर दी. इस घटना के बाद लोगों का दुःख असहनीय हो गया है. अब समय आ गया है कि सुदर्शन चक्र हाथ में ले अर्थात् संगठित होकर सशस्त्र क्रांति करें. लोकगीतों के माध्यम मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम के आद्य बलिदानी वेदप्रकाश को हमारा शत-शत नमन.

 

संदर्भ :-

मुक्तिगाथा – मुक्तिदाता लेखक डाँ.पी.जी.जोशी

मराठवाडा का इतिहास – डाँ. सोमनाय रोड़े

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