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भारत के ‘स्व’ का मूल आधार भारत की आध्यामिकता है – डॉ. मनमोहन वैद्य

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भोपाल. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि स्वाधीनता के पश्चात भारत के ‘स्व’ को नकारने का फैशन चल पड़ा और हम जो हैं, सदियों से जिसे दुनिया जानती है उस अपने ‘स्व’ को नकारना यानि अपने आप को लिबरल, इंटलैक्चुअल, प्रोग्रेसिव कहलाने का फैशन चल पड़ा और भारत के ‘स्व’ की बात करने वालों को कम्युनल, एंटी प्रोग्रेसिव, बताने का प्रयास होता रहा. इसलिए भारत की जितनी प्रगति होनी चाहिए थी, अब तक उतनी नहीं हुई है. इस ‘स्व’ के प्रकाश में, इस ‘स्व’ के आधार पर हमारी विदेश नीति, रक्षा नीति, शिक्षा नीति, हमारी अर्थ नीति यदि तैयार होती तो हम अब तक बहुत आगे बढ़ सकते थे.

गणतंत्र दिवस के निमित्त इस ‘स्व’ की पहचान को बताना, उसके बारे में प्रबोधन करना भी समाज के लिए आवश्यक है और समाज में इसके बारे में जागरण आवश्यक है. प्रबोधन से इसके बारे में एक जाग्रति, एक स्वाभिमान उत्पन्न होगा और जागरण से यह ‘स्व’ अपने पारिवारिक, व्यवसायिक, सामाजिक जीवन में अभिव्यक्त होगा. वास्तव में तभी भारत का भारतत्व यह ‘स्व’ प्रगट होगा, ऐसा एक संकल्प हम सभी लें, तो गणतंत्र दिवस सफल है.

सह सरकार्यवाह गणतंत्र दिवस के अवसर पर विश्व संवाद केंद्र, भोपाल कार्यालय में ध्वजारोहण के पश्चात संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि आंखे खोलते हैं, मैं को छोटा करते हैं तो हम का दायरा बड़ा होता है. ऐसे में जो हमारे नहीं, वे भी हमको अपने लगने लगते हैं. उनके लिए करने का मन होता ही है, यह करना इसे हमारे लिए ‘धर्म’ कहा जाता है. यही समाज को बांधता है. इसलिए समाज में हमारे यहां “धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मों धारयति प्रजाः”, कहा गया है. यह भारत की विशेषता है, इस विशेष भारत की आध्यात्मिकता के कारण भारत के ‘स्व’ का समाज जीवन के सभी क्षेत्र में प्रकटीकरण हो, उसके बारे में जाग्रति तैयार हो.

उन्होंने कहा कि कोरोना की पहली लहर में साढ़े पांच लाख स्वयंसेवक सेवा कार्य में सक्रिय थे.

स्वयंसेवकों के अलावा समाज का बड़ा वर्ग भी सक्रिय रहा. यह सेवा भाव देखकर भारत के बाहर के लोग बहुत आश्चर्य करते है. यहाँ लोग जान का खतरा जानकार भी क्यों अपनी जान खतरे में डाल रहे हैं, यह देखकर उन्हें आश्चर्य होता है. परंतु, भारत में लोगों को यह सहज लगता है. नहीं किया तो कुछ कम किया ऐसा लगता है. इसका कारण क्या है, इसका विचार करना चाहिए.

कोरोना महामारी का दौर चल रहा है. दुनिया भर में इसका असर है, लेकिन भारत की विशेषता ऐसी है कि दुनिया के सभी देशों में भारत के सिवाय कोरोना के दौरान लोगों की सेवा वहां की मशीनरी ही करती रही है. भारत एकमात्र ऐस देश है, जिसमें सरकारी तंत्र ने तो खूब अच्छा काम किया. साथ ही लोगों ने भी अपनी जान खतरे में डालकर सभी अपरिचित लोगों की सेवा की और कर रहे हैं. इस दिशा में आज समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग सक्रिय हुआ है और भूकंप, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं में सेवा कार्य करता हुआ दिखता है.

उन्होंने कहा वास्तव में यह भारत का स्वभाव है. प्रापर्टी, नुकसान, जान, खतरा इसके बारे में सारी जानकारी होने के बाद भी यहां मिलने वाला कुछ नहीं, ऐसा जानकार सेवा कार्य करना, इसे भारतीय ड्यूटी मानते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह ने भिलाई की एक सामान्य ग्रहणी का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उनके मन में कोरोना की पहली लहर में लोगों की सेवा करने का भाव उत्पन्न हुआ और उन्होंने अपने मोहल्ले की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर कोरोना महामारी में सैकड़ों अपरिचित लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की.

इस प्रकार के अनेक उदाहरण आज हमारे सामने हैं. ये सभी ऐसा क्यों करते होंगे या अभी कर रहे हैं. इसका विचार करता हूं तो ध्यान में आता है, यह भारत का, मतलब राष्ट्र का, समाज का स्वभाव बना है. यह स्वभाव बनने के मूल में भारत का ‘स्व’-भाव है. इसमें ‘स्व’ विशेष है. ये भारत का ‘स्व’ ही महत्व का है. जो स्वाधीनता, ‘स्व’तंत्रता, ‘स्व’राज्य, ‘स्व’देशी से आता है. इस ‘स्व’ का जो मूल आधार है वो भारत की आध्यात्मिकता है. इसके कारण हम सभी सीधे उसके साथ जुड़ते हैं.

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