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दिशाहीन हो चुका राजनीतिक किसान आन्दोलन

सूर्यप्रकाश

पिछले कुछ वर्षों में सत्ता से बाहर होकर केवल विरोध के लिए विरोध का जो संगठित और सुनियोजित विमर्श गढ़ा जा रहा है, उसके स्क्रिप्ट राइट और अराजक किरदार देश विरोधी मानसिकता को ही बढ़ाते रहे हैं. नागरिकता कानून के विरोध में खड़े होने के बाद किसान आंदोलन के पैरोकार देश के अंदर ही नहीं सात समंदर पार से भी समर्थन पाने के लिए भारत विरोधी कुचक्र रचने में पीछे नहीं रहे. भारत के वामपंथी अर्बन नक्सल और अराजक सोच वाले कुछ सेलेब्रिटीज की तरह चंद टुकड़ों और प्रसिद्धि की चाह में ग्लोबल सेलेब्रिटी रेहाना, ग्रेटा और मिया खलीफा ने किसान आंदोलन के पक्ष में ट्वीट, टूल किट और भारत की नकारात्मक छवि बनाने के लिए ऑनलाइन अभियान चलाए.

किसानों के लिए शोर मचाने के बहाने अपनी जमींदोज होती राजनीति में प्राण फूंकने के लिए ही  कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने और पंजाब में उनके वजीर कैप्टन अमरिंदर ने अकाली दल और आप पार्टी के साथ किसान आन्दोलन में एक बड़ा अवसर ढूंढा. नशामुक्त पंजाब और सबको रोजगार के नाम पर सत्ता में आए अमरिंदर ने वादों को अपनी स्वार्थ की राजनीति में होम कर दिया. कुल मिलाकर कृषि कानूनों के विरोध के बहाने किसानों तो क्या जाटों और सिक्खों को ही भेदना लक्ष्य था.

पंजाब और हरियाणा के कुछ किसान जब दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्रित हुए तो सुनहरा मौका पाकर आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी पंजाब में कांग्रेस, अकाली विरोध को भूलकर पहले ही दिन व्यवस्था के लिए अपनी सारी कैबिनेट लगा दी. फिर कम्युनिस्ट, कांग्रेस, आप, लोकदल, लोकदल, स्वराज और अन्य विपक्षी पार्टियों से जुड़े नेता किसान नेता बनकर इसमें  कूद पड़े. संसद से सड़क तक और जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक से नेता इसमें कूद पड़े. शिवसेना के संजय राऊत ने भी पहले जमकर बयानों से आग लगाई, फिर राकेश टिकैत के घड़ियाली आँसू पोंछने पहुंच गए.

किसान हित के नाम पर भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय उत्सव गणतंत्र दिवस पर अराजक तत्वों ने ट्रैक्टर परेड के नाम पर देश की राजधानी को जिस प्रकार बंधक बनाने की कोशिश की और दुनियाभर में देश के स्वाभिमान को धक्का पहुंचाया,वह देशद्रोह है और अक्षम्य अपराध है. किसानों को ढाल बनाकर ट्रैक्टर से कानून को कुचलने की कोशिश की गयी, पुलिस के जवानों पर जानलेवा हमले किये गए और सरकारी संपत्ति नष्ट कर उत्पात मचाया गया, उसकी जिम्मेदारी राजनीति की रोटी सेंकने वाले धरातल विहीन भड़काऊ बयानबीर नेताओं की क्यों नहीं थी?

बैरिकेड्स तोड़ने की शुरुआत तो राहुल-प्रियंका ने ही बवाल काटकर करवा ली थी, नरेश टिकैत, योगेंद्र यादव और गुरनाम चडूनी ने किसानों को गुमराह किया तो संयुक्त किसान मोर्चा के नेता बलबीर राजेवाल हों या किसान मजदूर संघर्ष कमेटी (पंजाब) के अध्यक्ष सतनाम सिंह पन्नू और महासचिव सरवन सिंह पंधेर ने किसान आंदोलन के बहाने हर बैठक और खाप पंचायत में हरियाणा सरकार को अस्थिर करने के मंसूबे बयां कर दिए. अमरिंदर ने जिस चालाकी के साथ किसान आंदोलन को अपने राजनीतिक फायदे का हथियार बनाया और बाद में हरियाणा में 40 खाप पंचायतों की एक महापंचायत में हरियाणा की भाजपा सरकार को गिराने की मुहिम तक शुरू की गई, इसका परिणाम यह निकला कि राज्य में भाजपा और दुष्‍यंत चौटाला के विधायक खाप पंचायतों के निशाने पर आ गए. पराली-पराली करके प्रदूषण का रोना-रोने वाले केजरीवाल सब कुछ भूलकर किसानों के हितैषी यूं ही तो नहीं बने होंगे.

आज स्थिति यह है कि किसान आंदोलन के दिल्ली की सीमाओं पर स्थित सिंघु बॉर्डर हो या टीकरी अथवा गाजीपुर अब किसानों के नाम पर दुनियाभर से संसाधन और सुविधा जुटाने वाले इन राजनीतिक किसान नेताओं के पास लोग ही नहीं हैं. 26 जनवरी के लालकिला हिंसा के बाद हरियाणा या दिल्ली के लोग इनके साथ नहीं हैं. वास्तविक किसान अपनी खेतीबाड़ी के काम में लगे हैं, पिकनिक और टूरिस्ट आंदोलनकारी अब मिल नहीं रहे हैं और जो राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए अथवा राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा पाले किसान नेता हैं, वो पश्चिम बंगाल, असम और केरल जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव में भाग लेने को आतुर दिख रहे हैं. राजनीतिक विरोध को चुनाव में सिरे चढ़ाना चाहते हैं.

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