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अयोध्या में तैनात सुरक्षा बल भी थे राममय, कर्फ्यू में आया था 80 हजार का चढ़ावा

फाइल फोटो – ढांचे का विध्वंस करने के पश्चात कारसेवकों ने टेंट का यह अस्थायी मंदिर बनाया था

अवध (विसंकें). सन् 1989 में श्रीराम मंदिर शिलान्यास से लेकर 1992 में जन्मस्थान पर स्थित ढांचे के विध्वंस के साक्षी रहे अयोध्या के तत्कालीन एडीएम सिटी उमेश चंद्र तिवारी का कहना है कि यदि तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने गोलियां चलाने का आदेश दे भी दिया होता तब भी 06 दिसंबर, 1992 को ढांचे को बचाना असंभव था. हां, ढांचे को बचाने के लिए गोलियां चलतीं तो लाशें जरूर बिछतीं, लेकिन ढांचा ध्वस्त होता ही. आप यूं समझिये की उस वक्त अयोध्या में तैनात फोर्स की भावनाएं भी कारसेवकों जैसी ही थीं. तभी तो सब कुछ बिना खून खराबे के हुआ.

वर्ष 2010 में सेवानिवृत्त हुए 70 वर्षीय उमेश चंद्र तिवारी 1989 में एडीएम सिटी फैजाबाद के रूप में तैनात हुए थे. हाईकोर्ट ने उन्हें रामलला विराजमान का रिसीवर नियुक्त किया था. उन्होंने रामलला की इतने मनोयोग से सेवा की कि लोग उन्हें एडीएम रामलला, रामलला तिवारी जैसे नाम से बुलाने लगे थे. वह बताते हैं कि रिसीवर होने के कारण ज्यादा समय अयोध्या में ही गुजरता था. वे तीन वर्ष से अधिक समय तक वहां रहे. घर के बजाय सरयू में स्नान कर दिन भर वायरलेस हाथ में ले कर अयोध्या में नंगे पैर घूमते रहते थे.

उन्होंने बताया कि 09 नवंबर 1989 को शिलान्यास को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तथा गृहमंत्री बूटा सिंह से उनकी बात हुई थी. स्व. अशोक सिंघल व विश्व हिन्दू परिषद के अन्य कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में शिलान्यास कार्यक्रम संपन्न हुआ था. मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के साथ उन्हें भी कोर्ट और जांच एजेंसी, आयोग का सामना करना पड़ा. मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का निर्देश था कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलानी है. वहां तैनात फोर्स कारसेवकों को रोक नहीं पा रही थी. फैजाबाद से अतिरिक्त केन्द्रीय बल को आने के लिए कहा गया, लेकिन महिलाएं, बच्चे बीच सड़क पर लेट गए, जिस कारण फोर्स समय पर अयोध्या नहीं पहुंच सकी.

क्या गोलियां चलतीं तो ढांचा बच जाता? उन्होंने असहमति जताते हुए कहा कि लाखों कारसेवकों की तुलना में फोर्स कम थी. गोलियां चलतीं तो बड़े पैमाने पर खून खराबा होता. लेकिन ढांचे को नहीं बचाया जा सकता था. कारसेवक गुंबद पर चढ़ गए और ढांचे को ढहा दिया. जन्म स्थान पर अस्थायी मंदिर बनाकर रामलला को स्थापित भी कर दिया.

इसके पश्चात तत्कालीन डीएम को निलंबित कर दिया गया था, देर रात नए कमिश्नर ने चार्ज संभालते ही मुझे बुलाया और पूछा कि मंदिर को क्या नए दूसरे स्थान पर रखा जा सकता है. मैंने कहा कि इस समय किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ से खून खराबा हो सकता है.

उमेश तिवारी ने बताया कि ढांचा गिरने के पश्चात कर्फ्यू लगा दिया गया था, और अस्थायी मंदिर में रामलला विराजमान की स्थापना के पश्चात मंदिर में ८०,००० का चढ़ावा आया. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां तैनात फोर्स की भावना क्या रही होगी.

 

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