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स्वाधीनता की चिंगारी, वीरांगना रानी अवंतीबाई

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हेमेन्द्र क्षीरसागर

अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति, वीरांगना रानी अवन्तीबाई ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे. अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. सन् 1857 की क्रान्ति में रानी अवन्तीबाई का वही योगदान है जो रानी लक्ष्मीबाई का है. इसी कारण रानी अवन्तीबाई की तुलना रानी लक्ष्मीबाई से की जाती है. इतिहास इन दोनों महान वीरांगनाओं का हमेशा ऋणी रहेगा. रानी अवन्तीबाई का अवतरण 16 अगस्त, 1831 को ग्राम मनकेहणी जिला सिवनी, मध्यप्रदेश के जमींदार राव जुझार सिंह के यहां हुआ था. इनकी शिक्षा दीक्षा ग्राम मनकेहणी में हुई. जुझार सिंह ने अपनी कन्या अवंतीबाई का विवाह रामगढ़ रियासत के राजा लक्ष्मण सिंह लोधी के पुत्र राजकुमार विक्रमादित्य सिंह लोधी के सांथ तय किया. सन् 1850 में राजा लक्ष्मण सिंह के निधन के बाद राजकुमार विक्रमादित्य ने राजगद्दी संभाली. विक्रमादित्य बचपन से ही वीतरागी प्रवृत्ति के थे. पूजा पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में लगे रहते थे. इनके दो पुत्र थे अमान सिंह और शेर सिंह. इनके दोनों पुत्र छोटे ही थे कि राजा विक्षिप्त हो गए और राज्य की सारी जिम्मेदारी रानी अवन्तीबाई के कन्धों पर आ गई.

यह समाचार सुनकर अंग्रेजों ने रामगढ़ राज्य पर ”कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स” की कार्यवाही की एवं राज्य के प्रशासन के लिए सरबराहकार नियुक्त कर शेख मोहम्मद और मोहम्मद अब्दुल्ला को रामगढ़ भेजा. जिससे रामगढ़ राज्य ”कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स” के अधीन चला गया. अंग्रेजों की इस हड़प नीति को रानी जानती थी और दोनों सरबराहकारों को रामगढ़ से बाहर निकाल दिया. लार्ड डलहोजी की राजे रजवाड़ों को हड़पने की नीति के कारण सतारा, जैतपुर, संभलपुर, बघाट, उदयपुर, नागपुर, झाँसी सहित कई देशी रियासतों का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर दिया गया. अन्य रियासतों को हड़पने का अंग्रेजी कुचक्र जोर-शोर से चल रहा था. अंग्रेजों के इस कुचक्र का रानी अवन्तीबाई ने भी विरोध किया. पुरवा में आस-पास के राजाओं और जमीदारों का विशाल सम्मलेन बुलाया. जिसकी अध्यक्षता 70 वर्षीय गोंड राजा शंकर शाह ने की. राजा शंकर शाह को मध्य भारत में क्रांति का नेता चुना गया. इस सम्मलेन में प्रचार प्रसार का कार्य रानी अवंतीबाई को सौंपा गया. प्रचार के लिए एक पत्र और दो काली चूड़ियों की एक पुड़िया बनाकर प्रसाद के रूप में वितरित की गईं. पत्र में लिखा गया -”अंगेजों से संघर्ष के लिए तैयार रहो या चूड़ियाँ पहनकर घर बैठो. तुम्हें धर्म, ईमान की सौगंध है, जो इस कागज का सही पता बैरी को दो”. जो राजा, जमींदार और मालगुजार पुड़िया ले तो इसका अर्थ क्रांति में अंग्रेजों के विरुद्ध अपना समर्थन देना था.

इस समय तक मंडला नगर को छोड़कर पूरा जिला अंग्रेजों से मुक्त हो चुका था. 23 नवम्बर, 1857 को मंडला के पास अंग्रेजों और रानी अवन्तीबाई के बीच भीषण युद्ध हुआ. इस युद्ध में मंडला का अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर पूरी शक्ति लगाने के बाद भी कुछ ना कर सका और मंडला छोड़ सिवनी भाग गया. इस प्रकार पूरा मंडला और रामगढ़ स्वतंत्र हो गया. अंग्रेज अपनी हार से बौखलाए हुए थे और अपनी हार का बदला लेना चाहते थे. अंग्रेज लगातार अपनी शक्ति सहेजते रहे अंग्रेजों ने 15 जनवरी, 1858 को घुघरी पर नियंत्रण कर लिया. मार्च 1858 के दूसरे सप्ताह में रीवा नरेश की सहायता से रामगढ़ को घेरकर हमला बोल दिया. वीरांगना रानी अवन्तीबाई की सेना अंग्रेजों की तुलना में बहुत छोटी होने के बावजूद साहसपूर्वक अंग्रेजों का सामना किया. रानी ने परिस्थितियों को भांपते हुये अपने किले से निकलकर डिंडोरी के पास देवहारगढ़ की पहाड़ियों की ओर प्रस्थान किया. अंगेजों की सेना रानी अवन्तीबाई का पता लगाते हुए देवहारगढ़ की पहाड़ियों तक पहुँच गई. यहां वीरांगना रानी अवन्तीबाई पहले से ही मोर्चा लगाए बैठी थी.

20 मार्च, 1858 को रानी अवन्तीबाई ने शाहपुर के पास स्थित तालाब के पास बने मंदिर में पूजा अर्चना की और युद्ध मैदान में उतर गई. यहां अंग्रेजों और रानी के बीच घमासान युद्ध हुआ. रानी अवन्तीबाई ने अपने आप को अंग्रेजों से घिरता देख वीरांगना रानी दुर्गावती का अनुकरण करते हुए अपनी तलवार निकाली और कहा “ हमारी दुर्गावती ने जीते जी वैरी के हाथ अंग ना छुए जाने का प्रण लिया था. इसे ना भूलना’’. इतना कहकर रानी ने तलवार अपने सीने में मारकर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया.

वीरांगना जब मृत्यु शैय्या पर थीं, तब उन्होंने अंगेजों को अपना बयान दिया कि ”ग्रामीण क्षेत्र लोगों को मैंने ही विद्रोह के लिए भड़काया, उकसाया था, प्रजा बिलकुल निर्दोष है”. क्रांति युक्त आंदोलन की सूत्रधार, स्वाधीनता की चिंगारी, वीरांगना रानी अवन्तीबाई को बलिदान दिवस पर शत-शत नमन…!

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