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वेलेंटाइन और ईसाइयत का प्रसार

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सेंट वेलेंटाइन की मनगढ़ंत कहानियों की आड़ में वास्तव में ईसाइयत धर्म प्रसार किया जाता है. वेलेंटाइन डे के उपलक्ष्य में धर्म प्रसार की बदलती पद्धतियों का एक अवलोकन –

ईसा पूर्व काल में रोमन्स को पेगन्स कहा जाता था. ईसा के बाद लगभग तीन शताब्दियों तक उनका भी क्रिश्चियनिटी में प्रवेश नहीं हुआ था. उन दिनों ल्युपरकलिआ (Lupercalia) नाम से एक वाहियात त्यौहार पेगन्स मनाते थे. ईसाई मिशनरियों ने उस त्यौहार में अपना सेंट वेलेंटाइन नाम का पात्र घुसेड़ दिया और उसी त्यौहार को वेलेंटाइन के नाम से मनाने लगे.

वेलेंटाइन्स-डे के इतिहास में झांकने पर कई विरोधाभासी दावों का सामना होता है. कुछ विशेषज्ञों के अनुसार वेलेंटाइन नाम का कोई व्यक्ति था ही नहीं. वह केवल एक सेंटाक्लॉज जैसा मनगढ़ंत पात्र मात्र है. पर, कुछ अन्य लोग उसे प्रेम का पुजारी तथा मुक्त लैंगिक संबंधों का पक्षकार मानते हैं. उसका काल तीसरे चौथे शतक का माना जाता है, किन्तु आधिकारिक क्रिश्चियन इतिहास में ऐसे किसी सन्त का कोई उल्लेख ही लगभग पंद्रहवी शताब्दी तक नहीं मिलता. स्वाभाविकतः जहां किसी सन्त का ही उल्लेख नहीं, तब उसके नाम से किसी त्यौहार का जिक्र कहां से आएगा.

आधुनिक इतिहास में मार्केट इकॉनॉमी के कारण यह त्यौहार मनाना शुरू हो गया, किन्तु कई क्रिश्चियन देशों में ऐसा कोई दिवस आज भी मनाया नहीं जाता.

भारत में पिछले दो दशकों से यह उत्सव मनाने की प्रथा शुरू हो गयी है और उसकी असलियत जाने बिना अधिकांश हिन्दू युवा इस उत्सव को मनाने में लगे हैं. पहले तो सबको यह जान लेना चाहिये कि, प्रेम का उत्सव मनाने वालों में बर्बरता किस हद तक भरी हुई है.

लगभग एक माह पहले पास्टर प्रवीण चक्रवर्ती को आंध्र प्रदेश में पुलिस ने हिरासत में लिया. उसके कई वीडियो वायरल हुए हैं, जिसमें वह क्राइस्ट विलेज का जिक्र करता है. उसने कई गांव के गांव ईसाई बना दिए हैं और वहां के मंदिर गिरा दिए गए. ऐसे गावों को वह क्राइस्ट विलेज कहता है. पिछले दो दशकों में आंध्रप्रदेश में कन्वर्जन अपनी चरमसीमा पर है. पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी, उनका बेटा जगन रेड्डी और दामाद अनिल कुमार की करतूतों का ही यह परिणाम है.

ईसाई मिशनरियों ने अब अपनी पद्धति में बदलाव किया है. अब कन्वर्टेड क्रिश्चियंस के नाम नहीं बदले जाते. क्रिश्चियन पहचान छिपाकर ये अब हिन्दू नाम लेकर अन्य भोले-भाले हिन्दुओं को क्रिश्चियन बनाने का प्रयास करते रहते है. उन्हें क्रिप्टो क्रिश्चियन कहा जाता है. रेड्डी पिता-पुत्र के शासनकाल में तिरुपती बालाजी मंदिर जैसे देवस्थानों के व्यवस्थापन में भी ईसाई व्यक्तियों को लाया गया है. जनसांख्यिकी अंसतुलन पैदा करने के लिए ऐसे कई हथखंडे अपनाए जा रहे है, सेंटाक्लॉज और वेलेंटाइन भी उसके उदाहरण हैं.

ईसाई मिशनरियों की विशिष्ट कार्यपद्धति अब उजागर हो रही है.

पहला प्रकार है, जातिवाद फैलाना और लोगों को गुमराह करना. उदा. महाराष्ट्र में संभाजी ब्रिगेड और मराठा सेवा संघ शुरू करने वाला पुरुषोत्तम खेडेकर कन्वर्टेड क्रिश्चियन है. मराठा समाज में क्रिश्चियन कन्वर्जन करना उसका काम है. पुस्तकों में वह लिखता है कि वह गणपति, तथा तुळजाभवानी को नहीं मानता, उनकी प्रतिमाओं को पैरों तले लेके बैठता है. किताबें वह जिजाऊ प्रकाशन के नाम से प्रकाशित करता है.

दूसरा प्रकार, राइस बैग कवर्जन कहलाता जाता है. इसमें गरीब हिन्दुओं के एक बोरी चावल के बदले में क्रिश्चियन बनाया जाता है.

तीसरा प्रकार, सुशिक्षित हिन्दुओं को गुमराह करने का है. इसके लिए सेंटाक्लॉज, वेलेन्टाइन-डे जैसे कथित उदात्त प्रकारों का सहारा लिया जाता है.

चौथा प्रकार है, जहां ईसा मसीह को श्रीकृष्ण या अन्य हिन्दू देवताओं के रूप में दिखाकर श्रद्धावान हिन्दुओं को गुमराह किया जाता है.

पांचवा प्रकार है, अनाथाश्रम, अस्पताल जैसे सेवाकार्य. यहां मरणासन्न व्यक्तियों को भी सेवा से पहले कन्वर्ट किया जाता है.

छटा प्रकार है, दहशत का, जोर जबरदस्ती का. दारासिंह और फादर ग्रैहम स्टेन्स के बारे में मीडिया लिखता है, किन्तु उसके पहले 84 वर्ष के स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बारे में कुछ कहा, लिखा नहीं जाता. लक्ष्मणानंद का अपराध केवल यही था कि, उन्होंने आदिवासियों के बलात् कन्वर्जन का विरोध किया था और उन्हें फिर से हिन्दू बनाया था.

पालघर के दो साधुओं की हत्या में भी चर्च का हाथ मान जाता है. फादर दिब्रेटो की वसई में भी आदिवासियों का बलात कन्वर्जन किया जाता रहा है.

भारत में प्रेम के कई प्रतीक हैं. रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को भेजा पत्र, नल-दमयंती अख्यान या फिर कवि कालिदास का मेघदूत जैसा महाकाव्य प्रेम का प्रतीक क्यों नहीं बनता? प्रेम की महत्ता जानने के लिए हमें चॉकलेट, प्रॉमिस, हग, किस और पिंक चड्डी जैसे प्रतीक ही क्यों भाते हैं?

हिन्दुओं में विवाह के भी छह प्रकार पाये जाते हैं. उनमें से एक है गांधर्व विवाह. वसंतोत्सव भी हमारा अपना प्रेमोत्सव है. हम इनकी जानकारी लें और इसाई छद्मवाद से बचें, क्योंकि इतिहास गवाह है – जब जब हिंदू घटा, तब तब देश बंटा.

सुप्रीम कोर्ट ने नौ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने के लिए केंद्र को चार हफ्तों का समय दिया. इन नौ में से पांच राज्यों में ईसाइयों की संख्या ९०% है. आज जो चमकदमक दिखाई देती है, वह कल भयावह रूप में उभर आने के आसार इससे स्पष्ट होते हैं. इस सांस्कृतिक आक्रमण को हम पहचानें और उसका विरोध करें.

एक बात हम जान लें कि क्रिश्चियनिटी की घिनौनी हरकतें छिपाने के लिए सेंटाक्लॉज तथा वेलेंटाइन का सहारा लिया जाता है. यह बात बिल्कुल उसी तरह है, जिसे सॉफ्टवेयर डिजाइनिंग में फसाड पैटर्न कहा जाता है. जो बिल्कुल बाहरी, सतही चीजें होती है, जो असली, अवांछनीय चिजें छिपाती है. ऐसे अन्य भी प्रकार हैं, जैसे मंदिरों की भूमि पर कब्जा कर उस पर क्रॉस लगाना, चर्च का शिखर गोपुर जैसे बनाना. यदि यूरोप, अमरिका से लेकर जापान, चीन, कोरिया या अफ्रीका और अरेबिया में क्रिश्चियनिटी का रूप देखा जाए तो वह स्थानीय बहुसंख्य लोगों जैसा दिखाई देता है. यह इसी फसाड पैटर्न का परिचायक है.

 

संदर्भ –

  1. https://indusscrolls.com/francis-xavier-and-goa-inquisition/
  2. https://www.youtube.com/watch?v=bnV36P6MuhQ&feature=youtu.be
  3. https://www.youtube.com/watch?v=6nEseljBZ-c&feature=youtu.be
  4. https://m.facebook.com/SouthAsiaSolidarityUK/videos/413811136404274/
  5. https://www.youtube.com/watch?v=NNdgGttyvyA&feature=youtu.be
  6. https://www.indiatoday.in/magazine/the-big-story/story/20101213-andhra-pradesh-the-priest-of-power-745025-2010-12-04
  7. https://swarajyamag.com/culture/how-northeast-india-was-christianised-in-the-last-100-years
  8. https://www.hindustantimes.com/india-news/christian-population-on-the-rise-in-arunachal-pradesh-manipur/story-8Go2uITu2BLFJ547MPwohM.html
  9. https://english.lokmat.com/national/sc-gives-4-weeks-to-center-to-grant-minority-status-to-hindus-in-9-states/

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