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समरसता का संदेश देता नगर आराध्य श्री लक्ष्मीनाथ जी का मंदिर

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राजस्थान के पश्चिमी छोर पर पाकिस्तान की सीमा से सटी स्वर्ण नगरी जैसलमेर के नगर आराध्य लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर में छप्पन भोग के दर्शन करने का कल रात अवसर प्राप्त हुआ.

हालांकि, जैसलमेर में रहते हुए बहुत लंबा समय हो गया है. लेकिन इस प्रकार के दिव्य दर्शन में जाना पहली बार हुआ. यह कार्यक्रम अपने आप में अद्वितीय रहता है.

इस छप्पन भोग का जो यजमान आयोजन करता है, वह पूरे नगर में टैक्सी के माध्यम से प्रसाद लेने हेतु आने का निमंत्रण देता है.

सभी नगरवासी निर्धारित समय में बहुत बड़ी संख्या में श्री लक्ष्मीनाथ जी के दर्शन करते हैं. इस समय का दृश्य किसी मेले से कम नहीं होता. और फिर सभी भक्त गण श्रद्धापूर्वक मंदिर की छत तथा परिसर के ओटों पर पंगत बनाकर प्रसादी ग्रहण करते हैं.

ध्यान देने वाली सबसे विशिष्ट बात यह है कि यहां किसी से नहीं पूछा जाता कि वह किस जाति वाला है. बस, लक्ष्मीनाथ जी का जयकारा लगा कर पंगत में बैठ जाइए. आपके पास पत्तल और दोना आएगा, क्रमशः वितरक प्रसाद के विभिन्न घटक आपके पत्तल में परोसते जाएंगे. समरसता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है.

जैसलमेर नगर के आराध्य, राजपरिवार के आराध्य लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर का द्वार सब के लिए हर समय खुला रहता ही है, साथ ही इस प्रकार के छप्पन भोग की प्रसादी जो व्यक्तिगत करवाई जाती है. लेकिन उसे ग्रहण करने वालों से किसी प्रकार की कोई पूछताछ या भेदभाव नहीं किया जाता.

यह उन सब लोगों के लिए उदाहरण है, जो किसी समूह या व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश को लेकर समाज के अंदर विद्वेष उत्पन्न करते हैं.

यह सच है कि अभी भी कुछ ऐसे स्थान हो सकते हैं, जहां इस प्रकार की विषमता दिखाई देती हो. लेकिन, ऐसे उपासना के बड़े केंद्र पर समरसता का एक स्वाभाविक वातावरण समाज के प्रयासों के बिना बन ही नहीं सकता.

अपने कई कार्यकर्ताओं के साथ वहां जाने का अवसर मिला, यह मेरे लिए साक्षात् देव दर्शन जैसा था.

इस स्वरूप को देखकर अभिभूत हो गया.

लिछमों रे नाथ री जय.

(जेठूदान की कलम से)

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