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यह राष्ट्रद्रोह की पराकाष्ठा…?

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नरेंद्र सहगल

भारत की सेना का डंका आज भारत ही नहीं पूरे विश्व में बज रहा है. देश की सीमाओं की रक्षा के लिए हमारे जवान जिस तरह दुश्मन देशों के नापाक इरादों को धूल में मिलाते हुए उनके सैनिकों की हड्डियां तोड़ रहे हैं, इस शौर्य का लोहा सारा संसार मान रहा है. परंतु भारत में ही कुछ राजनीतिक दल और उनके नेता शत्रु देशों की भाषा बोल कर अपने ही देश के वीर सैनिकों का मनोबल तोड़ कर उनका घोर अपमान भी कर रहे हैं. यह राष्ट्रद्रोह नहीं तो फिर क्या है?

“भारत की सेना पिट रही है”, “प्रधानमंत्री झूठ बोल रहे हैं”, “सैनिकों को जवाबी कार्रवाई करने से रोका जा रहा है”, “मोदी चीन की गोद में जा बैठा है”, “भाजपा की सरकार देश और सैनिकों के साथ खिलवाड़ कर रही है”, “यह सरकार चीन की ताकत बढ़ा रही है” — इत्यादि भाषा का इस्तेमाल करके यह नेता शत्रु देश की सेना का मनोबल नहीं बढ़ा रहे क्या? इस तरह के वक्तव्यों पर जहां एक ओर भारत में थू-थू हो रही है, वहीं चीन और पाकिस्तान में घी के दिए जलाए जा रहे हैं.

इन विपक्षी नेताओं को देश के प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, सेना के अधिकारियों और समाचार पत्रों पर विश्वास नहीं जो यह स्पष्ट बता रहे हैं कि भारतीय सैनिकों ने चीन के फौजियों की जमकर धुलाई की है.

इन लोगों को उन तस्वीरों पर भी भरोसा नहीं है जो चीन के सैनिकों को मार मार कर भागते हुए दिखा रही हैं. शर्मसार करने की बात तो यह है कि यह नेता चीन और पाकिस्तान की सरकारों पर विश्वास करके अपने देश की सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर रहे हैं.

देश की सुरक्षा और सम्मान के साथ खिलवाड़ करने वाले यह नेता अगर किसी और देश में होते तो अब तक सीखचों के पीछे बंद होकर अपने दुर्भाग्य पर रो रहे होते और अगर कहीं पाकिस्तान या चीन में होते तो सूली पर लटका दिए होते. यह वही लोग हैं जो “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह” की चाहत रखने वाली देश विरोधी गैंग के साथ खड़े होते हैं. जो भारत के सैनिकों को गुंडे और बलात्कारी कहते हैं. जो बालाकोट जैसे विजयी सैन्य अभियानों पर भारत के सेनाधिकारियों से सबूत मांगते हैं. जो लोग आतंकवादियों की मौत पर आँसू बहाते हों और ये कहते हों कि कश्मीर में कोई तिरंगा उठाने वाला भी नजर नहीं आएगा, उन लोगों को गद्दार न कहें तो क्या उनका अभिनंदन करें?

दरअसल, सच्चाई तो यह है कि अपनी धूल जमी राजनीतिक औकात को चमकाने के लिए यह नेता देश की अखंडता को भी दांव पर लगाने से परहेज नहीं कर रहे. भारत के भावी प्रधानमंत्री की चाहत पाले नेता का यह कहना कि “भारत की सेना पिट रही है”, चीन के सैनिकों की पीठ पर हाथ रखने के समान है. यह वही नेता हैं जो विदेशों में जाकर भारत के मूल बहुसंख्यक हिन्दू समाज को आतंकवादी बताते हैं और जिनके बयानों पर पाकिस्तान के समाचार पत्र सुर्खियां बनाते हैं. यह वही हैं जो भारत स्थित चीन के दूतावास से गुप्त बैठकें करते हैं और चीन में जाकर वहां की साम्यवादी पार्टी से ‘समझौता’ करते हैं.

सर्वविदित है कि भारत, भारतीयता, भारत की सेना पर इस तथाकथित परिवार का कभी भरोसा रहा ही नहीं. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के मनोनीत प्रधानमंत्री ने कहा था कि “अब सेना की क्या जरूरत है, हम पुलिस से ही काम चला लेंगे.” आजादी के तुरंत बाद जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया तो आगे बढ़ कर शत्रुओं का संहार कर रही भारतीय सेना के विजयी कदमों में युद्धविराम की बेड़ियां डालने वाला कौन था? वो कौन सी सरकार थी, जिसने कश्मीर का एक तिहाई भाग पाकिस्तान को सौंप दिया था?

1962 में जब चीन की सेना भारत में घुसी तो कौन सी सरकार ने भारतीय सैनिकों को निहत्था करके मरवाया था? भारत की वायुसेना को कार्रवाई नहीं करने दी गई. लद्दाख के चालीस हजार वर्गमील के क्षेत्र को चीन को सौंपने वालों के वंशज आज भारत के सैनिकों को डरपोक और कायर सिद्ध कर रहे हैं. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे. परंतु बाद में तत्कालीन सरकार ने शत्रु देश के साथ ‘ताशकंद समझौता’ करके भारत की सेना के शौर्य और बलिदानों पर पानी फेर दिया था.

इसी तरह 1971 के युद्ध में जब भारत की सेना ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को बंदी बनाकर अपने कब्जे में किया तो तत्कालीन कांग्रेस प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के साथ ‘शिमला समझौता’ करके उसके सेनापति और सैनिकों को न केवल बिना शर्त छोड़ दिया, बल्कि भारतीय सैनिकों द्वारा आजाद करवाई गई भूमि को भी वापस कर दिया. राहुल गांधी जी, वास्तव में यह होती है “सैनिकों के खून की दलाली.” संसद में आंख मारने वाले भारत के ‘भावी प्रधानमंत्री’ और उसके पुरखों द्वारा किए गए भारतीय सैनिकों के अपमान की कथा बहुत लंबी है.

डोकलाम, गलवान और अब तवांग में भारतीय सैनिकों की वीरता और उनके विजयी अभियानों पर शंका करके भारत को विश्व में बदनाम करने वालों का एक ही उद्देश्य है – अपनी राजनीति चमकाना और भारत के प्रधानमंत्री को सत्ता से हटाना. यह विपक्षी नेता अपने उखड़ रहे राजनीतिक पांवों पर एक के बाद एक कुल्हाड़ी मार रहे हैं.

देश के रक्षामंत्री, विदेशमंत्री और सेनाधिकारियों के स्पष्टीकरण के बाद इस मुद्दे को उठाना ठीक नहीं. सीमा पर सैनिक चौकियों, हथियारों की तैनाती और सरकार की रक्षानीति से संबंधित विषयों पर सार्वजनिक चर्चा राष्ट्रहित में नहीं होती.

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