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तियानमेन चौक नरसंहार – संपूर्ण घटनाक्रम

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1981 – आर्थिक सुधारवादी हु याओबंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने

1986 – इसी वर्ष आंदोलन की नींव पड़ी. सामाजिक एवं राजनीतिक सुधार के लिए पहली बार हजारों की संख्या में चीनी विद्यार्थियों ने विरोध मार्च निकाला.

1987 – हु याओबंग ने खुलकर 1986 के छात्र आंदोलन की निंदा नहीं की. इस कारण चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अन्य नेताओं ने उनकी आलोचना की. अंततः याओबंग को जबरन इस्तीफा देने को मजबूर किया गया.

याओबंग के बाद झाओ ज़ियांग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नए महासचिव बने और हार्ड-लाइनर ली पेंग को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाईना का प्रीमियर बनाया गया. यहीं से सरकार ने आंदोलन को खत्म करने की योजना बनानी शुरू की.

15 अप्रैल, 1989 – अचानक ही हु याओबंग की संदेहास्पद मृत्यु हो गई, जिसकी सूचना पूरे चीन में फैलने लगी. विद्यार्थी जगह-जगह इकट्ठा होकर उन्हें श्रद्धांजलि देने लगे.

17 अप्रैल, 1989 – मेमोरियल में भीड़ बड़ी संख्या में जुटने लगी और छात्र भावनात्मक होकर बीजिंग के तियानमेन चौक पर इकट्ठा होने लगे.

18 अप्रैल, 1989 – बीजिंग विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने एक अभूतपूर्व पैदल मार्च निकाला जो शहर से तियानमेन चौक तक था. यहीं पर उन्होंने सरकार से सात मांगों की घोषणा की. ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल के सामने सैकड़ों विद्यार्थियों ने बैठ कर विरोध प्रदर्शन किया.

19 अप्रैल, 1989 – चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय सेंटर जोंगनहाई के शिन्हुआ के सामने भी विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन किया.

20 अप्रैल, 1989 – इसी दिन चीनी कम्युनिस्ट सरकार द्वारा पहली बार विद्यार्थियों पर पुलिस के माध्यम से हमला करवाया गया. पुलिस द्वारा किए गए हमले में कुछ विद्यार्थी चोटिल हुए और उन्होंने वापस विश्वविद्यालय के कैंपस में आकर अपने साथियों को इसकी जानकारी दी. इस पूरी घटना को शिन्हुआ द्वारा खूनी घटना कहा गया. इस घटना के बाद विद्यार्थियों ने अपनी कक्षाओं का बहिष्कार करना शुरू किया.

21 अप्रैल, 1989 – लगभग 50,000 से अधिक बीजिंग के विद्यार्थियों ने तियानमेन चौक में आकर प्रदर्शन में हिस्सा लिया.

22 अप्रैल, 1989 – हु याओबंग के अंतिम संस्कार किया गया. उसी दौरान छात्र नेताओं ने घुटनों पर बैठकर उन्हें श्रद्धांजलि दी. यहीं पर उन्होंने ली पेंग से अपनी मांगों को मानने पर बल दिया. लेकिन ली पेंग ने उनसे मिलने से भी इंकार कर दिया. इस कृत्य के बाद पूरे बीजिंग के नागरिकों में विद्यार्थियों के प्रति भावनात्मक पक्ष और मजबूत होता चला गया.

23 अप्रैल, 1989 – कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव झाओ ज़ियांग अपनी विदेश यात्रा में उत्तर कोरिया चले गए और इस दौरान ली पेंग ने सरकार के भीतर चल रहे आंदोलन को लेकर सभी वार्ताओं में नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया.

26 अप्रैल, 1989 – चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व कर्ताओं ने अपने आधिकारिक मुखपत्र पीपुल्स डेली में एक संपादकीय प्रकाशित किया. जिसमें आंदोलन कर रहे विद्यार्थियों को देश विरोधी करार दिया गया.

27 अप्रैल, 1989 – इस संपादकीय से आक्रोशित होकर 50,000 से अधिक विद्यार्थियों ने तियानमेन चौक पर रैली निकाली.

28 अप्रैल, 1989 – ली पेंग ने एक और संपादकीय प्रकाशित किया. जिसमें इस आंदोलन के पीछे किसी छोटे समूह के काले हाथ होने और कुछ सरकार विरोधी तत्व द्वारा इसका नेतृत्व किए जाने की बातें कही गई. इस संपादकीय में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के अधिकारियों को कम्युनिस्ट समर्थित विचार सिखाने पर जोर दिया.

30 अप्रैल, 1989 – झाओ ज़ियांग उत्तर कोरिया से वापस चीन लौटे और उन्हें जानकारी मिली कि बीजिंग यूनिवर्सिटी के 70% से अधिक छात्र कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मीडिया समूहों में भी इस आंदोलन का कवरेज लगातार बढ़ता जा रहा है.

1 मई, 1989 – झाओ और ली पेंग के बीच नोकझोंक हुई और झाओ ने विद्यार्थियों के प्रदर्शन को सही ठहराया.

2 मई, 1989 – लगभग 40 कॉलेजों के विद्यार्थियों ने बीजिंग विश्वविद्यालय में एकजुट होकर बीजिंग स्टूडेंट डायलॉग डेलिगेशन का गठन किया.

4 मई, 1989 – तियानमेन चौक पर मार्च निकालकर विद्यार्थियों ने वर्ष 1919 के छात्र आंदोलन की वर्षगांठ को बड़े उत्साह से मनाया.

11 मई, 1989 – कुछ छात्र नेताओं ने इस बात पर चर्चा की और सरकार की नीयत पर संदेह जताया. जिसके बाद उन्होंने भूख हड़ताल करने की बात की.

12 मई, 1989 – चीनी छात्र नेता चाई लिंग द्वारा बीजिंग विश्वविद्यालय में बेहद ही भावनात्मक भाषण दिया गया. जिसके बाद सैकड़ों की संख्या में विद्यार्थियों ने भूख हड़ताल में शामिल होने की घोषणा की.

13 मई, 1989 – सरकार को विद्यार्थियों द्वारा की जा रही भूख हड़ताल की जानकारी प्राप्त हुई. झाओ ज़ियांग के करीबी यान मिंगफु ने विद्यार्थियों से मुलाकात की और उन्होंने चीन का दौरा करने वाले सोवियत के नेता मिखाइल गोर्बाचेव के सामने शर्मिंदा ना कर देशभक्ति दिखाने की बात कही. आंदोलन कर रहे विद्यार्थियों ने गोर्बाचेव के आने से पहले तियानमेन चौक खाली करने की बात कही.

14 मई, 1989 – भूख हड़ताल का समर्थन कर रहे विद्यार्थी तियानमेन चौक पर डटे रहे. ली पेंग ने झाओ पर पार्टी में दरार डालने का आरोप लगाया.

15 मई, 1989 – गोर्बाचेव चीन पहुंचे. इस यात्रा को कवर करने के लिए पहुंची अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान भूख हड़ताल कर रहे विद्यार्थियों ने बड़ी तेजी से आकर्षित किया.

17 मई, 1989 – चीन के इतिहास का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन किया गया, जिसमें 20 लाख से अधिक लोग शामिल हुए. बीजिंग के साथ-साथ चीन के 20 से अधिक शहरों में इस प्रदर्शन को अंजाम दिया गया. प्रदर्शनकारियों ने डेंग और ली पेंग को अपना पद छोड़ने की बात कही.

ली पेंग ने पोलित ब्यूरो की बैठक में डेंग के सामने झाओ ज़ियांग पर आरोप लगाते हुए कहा कि इनकी वजह से ही छात्र आंदोलन को बढ़ावा मिला है और अब यह एक जन सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है. इसी बैठक में पहली बार मार्शल लॉ लगाने की बात की गई.

19 मई, 1989 – पीपुल्स लिबरेशन आर्मी अर्थात चीन की कम्युनिस्ट सेना को मार्शल लॉ के लिए तैयार किया गया. मार्शल लॉ की तैयारी को देखते हुए बीजिंग के तमाम कारखानों के कर्मचारियों ने विद्यार्थियों का साथ देने के लिए हड़ताल में जाने की घोषणा की. दूसरे शहरों से निकलकर विद्यार्थी बीजिंग पहुंचने लगे.

20 मई, 1989 – चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने मार्शल लॉ की घोषणा की.

21 मई, 1989 – बीजिंग के बाहर के विद्यार्थियों ने अपना पूरा समर्थन जताया. भूख हड़ताल को जारी रखने के लिए बड़े स्तर पर विद्यार्थी सामने आए. बीजिंग के नागरिकों ने विद्यार्थियों पर कहर ढाने के लिए आगे बढ़ रहे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के कम्युनिस्ट सैनिकों को रोकने का प्रयास किया.

23 मई, 1989 – पूरे शहर में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवान सादे कपड़ों में विभिन्न समूह में शामिल हो गए. अंतरराष्ट्रीय नेताओं ने चीन को शांतिपूर्ण तरीके से समस्या का समाधान निकालने की बात कही.

तियानमेन चौक पर 3 प्रदर्शनकारियों ने चीनी तानाशाह माओ ज़ेडोंग की तस्वीर को खराब किया.

27 मई, 1989 – झाओ ज़ियांग को हटाकर ज़ियांग जेमिन को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का नया महासचिव नियुक्त किया गया. हांगकांग में चीन में लोकतंत्र लाने के लिए एक कंसर्ट आयोजित किया गया और लाखों की संख्या में हॉन्ग कोंग डॉलर विद्यार्थी आंदोलन के लिए इकट्ठा किए गए.

29 मई, 1989 – बीजिंग पुलिस ने ऑटोनॉमस फेडरेशन के कर्मचारियों को गिरफ्तार किया. जिसके बाद विद्यार्थियों ने लोकतंत्र की देवी की प्रतिमा को तियानमेन चौक पर स्थापित किया.

02 जून, 1989 – लेखक लियू शियाओबो सहित तीन अन्य लोगों ने भूख हड़ताल की शुरुआत की और उनके भावनात्मक भाषण में बड़ी संख्या में लोगों को तियानमेन चौक की ओर आकर्षित किया.

सरकार ने मार्शल लॉ के लिए बुलाए गए जवानों को निर्देश दिया और उन्हें तियानमेन चौक को तत्काल खाली कराने की बात कही.

03 जून, 1989 – पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के कम्युनिस्ट सैनिकों का सामना विरोध कर रहे स्थानीय निवासियों से हुआ और इसके बाद बीजिंग के सभी अस्पतालों में घायलों की संख्या बढ़ती गई.

जैसे-जैसे हथियारबंद चीनी कम्युनिस्ट सैनिक बीजिंग में आगे बढ़ रहे थे, वैसे ही उन्होंने स्थानीय नागरिकों की भीड़ पर गोली चलाना शुरु कर दिया. इस गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गए.

इसके बाद स्थानीय निवासियों ने अपने घरों के बर्तनों को अपने छत से उन पर फेंकना शुरू किया. जिसके बाद कम्युनिस्ट सैनिकों ने पूरी बिल्डिंग और पूरे घरों में भी गोलीबारी शुरू कर दी. सैकड़ों लोग अपने घरों के भीतर ही उस रात मारे गए.

एक कनाडाई पत्रकार ने बताया था कि इसी रात चीनी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के भतीजे की भी उसके घर के किचन में कम्युनिस्ट सैनिकों द्वारा हत्या कर दी गई थी.

सिर्फ इतना ही नहीं चीनी कम्युनिस्ट सैनिकों ने उन होटल और रुकने के स्थानों में भी हमला किया, जहां अंतरराष्ट्रीय मीडिया समूहों के विदेशी पत्रकार मौजूद थे.

04 जून, 1989 – सेना के जवान तियानमेन चौक पहुंच गए. मिलिट्री की गाड़ियां चौक को चारों ओर से घेर चुकी थीं. मिलिट्री टैंक ने विद्यार्थियों पर हमला शुरू किया.

जवानों ने आंसू गैस के गोले छोड़े, जिसकी वजह से कई विद्यार्थी घायल हुए. झोंगनहाई के सामने खड़े विद्यार्थियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया.

चश्मदीदों की रिपोर्ट और विदेशी एंबेसी से मिली जानकारियों के अनुसार तब तक शहर के सभी अस्पताल घायलों से भर चुके थे. रेडियो और टेलीविजन स्टेशन से लगातार आपातकाल का निर्देश दिया जा रहा था और लोगों को अपने घर लौटने का आदेश दिया जा रहा था.

टीवी और रेडियो के माध्यम से यह भी कहा जा रहा था कि सेना मार्शल लॉ के दौरान किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतेगी. टैंक के माध्यम से लोकतंत्र की देवी की प्रतिमा को पूरी तरह कुचल दिया गया.

तियानमेन चौक से निकलने के सभी रास्तों को बंद कर दिया गया और विद्यार्थी अंदर ही फंस गए. सुबह से लेकर रात तक चीनी कम्युनिस्ट सैनिकों द्वारा विद्यार्थियों की हत्या की गई.

एक विदेशी पत्रकार ने एक अकेले आंदोलनकारी की उस आईकॉनिक तस्वीर को खींचा जो चीनी कम्युनिस्ट सेना के टैंक के सामने अकेला खड़ा था. टैंक मैन की इस तस्वीर ने वैश्विक मीडिया में अपनी जगह बनाई.

05 जून, 1989 – वैश्विक नेताओं ने चीन की इस दमनकारी नीतियों की निंदा करनी शुरू की. छात्र नेता और अन्य एक्टिविस्ट चीन छोड़कर भागने की तैयारी करने लगे. कई पालक अपने बच्चों की खोज में तियानमेन चौक पहुँचे, जहाँ उन्हें अपने बच्चों की लाशें मिली.

06 जून, 1989 – चीन में स्थित विदेशी दूतावासों से अपने नागरिकों को चीन छोड़ने के निर्देश दिए गए.

08 जून, 1989 – ली पेंग ने टेलीविजन में अपना एक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने चीनी कम्युनिस्ट सेना को धन्यवाद दिया.

12 जून, 1989 – चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने पूरे देश में सभी तरह के छात्र एवं कर्मचारी यूनियन पर प्रतिबंध लगा दिया.

16 जून, 1989 – प्रदर्शन कर रहे छात्र नेताओं की गिरफ्तारी शुरू की गई और 1000 से अधिक छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया गया.

17 जून, 1989 – बीजिंग के 8 नागरिकों को मौत की सजा दी गई.

20 जून, 1989 – चीन ने सभी ट्रैवल वीजा पर रोक लगा दी ताकि आंदोलनकारी चीन से भाग ना सकें.

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