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‘लोक अन्नों’ की ओर लौटने का समय….!

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“यदि हम लोक की धरोहरों को नहीं बचा पाए तो विकास के मामले में भले ही अमेरिका बन जाएं पर जिंदगी दरिद्र की दरिद्र ही रह जाएगी. हमारी असली अमीरी लोकसंपदा से ही है”.

जयराम शुक्ल

भूख ने आदमी को कर्मठ बनाया और स्वाद ने सभ्य. अदलते-बदलते हुए समाज को समझना है तो खानपान की खट्टी-मीठी परंपरा का लुत्फ उठाते रहिए. पिछले दिनों एक निमंत्रण में गया. भोजन का पंडाल और उसमें सजे और आंखों के सामने बन रहे व्यंजनों ने चकित कर दिया. उन व्यंजनों के स्टॉल्स ज्यादा भीड़ खींच रहे थे जो किसी जमाने में गरीबों की पहचान के साथ जुड़े थे.

ज्वार-बाजरे की रोटी, भुने हुए भंटे, आलू, टमाटर का भुर्ता और लहसुन की चटनी. ऐसे ही देशी व्यंजनों का एक कोना था जहां खबक्कड़ों की भीड़ टूटी पड़ रही थी. सरसों की साग और मक्के की रोटी तो दशकों से अभिजात्ययी थाली का हिस्सा बनी हुई थी.

चिल्ला, चौंसेला, अमावट की चटनी के साथ दलभरी पूरी तो थी ही, हमारी इंदरहर कब नवाबी शहर भोपाल पहुंच गई पता ही नहीं चला. वैसे इंदरहर पिछले दस साल से सीएम हाउस के आयोजनों के मीनू में है. बस उत्साही कैटरर इंदरहर को इंद्राहार बता कर सजा देते हैं. हां, एक स्टाल में कोडो राइस सजा दिख गया. मैं तत्काल ही समझ गया कि हो न हो ये अपनी कोदइ ही होगी. इससे अपने विन्ध्य में एक चर्चित किस्सा याद आ गया.

कुछ लोग इसे विंध्य के धुरंधर समाजवादी नेता स्वर्गीय चंद्रप्रताप तिवारी से जुड़ा बताते हैं तो कई लोग सतना से तीन बार भाजपा सांसद रहे रामानंद सिंह जी से. दोनों अपने यहां के समाजवादी दिग्गज रहे हैं. ये दोनों दबंग मंत्री के तौर पर भी याद किए जाते ह़ैं. ये किस्सा गप्प भी हो सकता है, पर कहीं न कहीं सुनने को जरूर मिलता है.

किस्सा कुछ यूं है कि एक बार ये मंत्री रहते हुए मुंबई गए. फाइव स्टार होटल में व्यवस्था थी. भोजन के मीनू में राइस के ऊपर कैडोराइस लिखा मिल गया. सो ये कैसा राइस है जानने की जिज्ञासा के चलते ऑर्डर दे दिया. जब वेटर ने सजे डोंगे में इसे परोसा तो मंत्री जी उछल पड़े – ससुरी इया कोदइ इंहौ पीछा नहीं छोड़िस.. तो ये था कैडोराइस का किस्सा जो सत्तर के दशक का था.

मुझे याद है कि साठ-सत्तर के दशक तक गांव में सामान्य परिवार में कोदौ भोजन का प्रमुख हिस्सा था. चावल मेहमानों के आने पर बनता था. वो भी ऐसा कि रसोई से उठी भीनी महक ही बता देती थी कि जिलेदार बन रहा कि दुबराज, लोनगी, नेवारी है कि सोनखरची. पचास किस्म की धान को तो मैं ही जानता था. अब लुप्तप्राय हैं. प्रकृति विज्ञानी आचार्य बाबूलाल दाहिया जी इनके संरक्षण म़ें वैश्विक स्तरीय काम कर रहे हैं. उनके पास धान की डेढ़ सौ से ज्यादा देसी प्रजातियां संरक्षित हैं.

कोदौ का किस्सा दाहिया जी से जाना. दाहिया जी की खेतशाला मध्यप्रदेश सतना के पिथौराबाद गांव में है, जिसे उन्होंने जैविक खेती में रुचि रखने वालों का तीर्थ बना दिया. भारत सरकार ने दो वर्ष पूर्व ही बीज संरक्षण और पारंपरिक खेती के क्षेत्र में अनूठा काम करने के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया है. यह दाहिया जी का बड़प्पन है कि लोक अन्नों को बचाने के मामले में मुझे अपना प्रेरक मानते हैं. इसकी भी एक कहानी है.

जब मैंने मध्यप्रदेश के सतना से एक अखबार का संपादन शुरू किया तो नवाचार की दृष्टि से लोक संस्कृति को मुख्य विषय बनाया. विख्यात समाजवादी विचारक जगदीश जोशी कहा करते थे कि यदि हम लोक की धरोहरों को नहीं बचा पाए तो विकास के मामले में भले ही अमेरिका बन जाएं पर जिंदगी दरिद्र की दरिद्र ही रह जाएगी. हमारी असली अमीरी लोक संपदा से ही है.

लोक के विविध कलारूपों के क्षेत्र में सरकारी स्तर पर काम हुए, लेकिन लोक वृक्षों, लोक अन्नों पर काम नहीं हुआ. लोक वृक्षों में महुआ मुखिया है तो लोक अन्नों म़े कोदौ किसी महारानी से कम नहीं. लोक वृक्षों पर हिंदी के विद्वान चंद्रिका प्रसाद चंद्र से लिखने का आग्रह किया. चंद्रजी ने लोकवृक्षों के बहाने हमारी परंपराओं पर इतना अद्भुत लिखा कि उनके निबंधों के दो संग्रह.. लोकायन.. व कुछ अपनी बाकी दुनिया की..दो पुस्तकें आ गईं. वे इस विषय पर इतने रमे कि उनका घर ही लोकायन हो गया. आज उनकी जोड़ का लोक की समझ रखने वाला दूसरा अध्येता मिलना दुर्लभ है.

बाबूलाल दाहिया जी ने लोक अन्नों पर काम शुरू किया. कोदौ से जुड़ी कहानियों, कहावतों गीत किस्से तो साझा किए ही, खुद खेत में घुस गए. आज दाहिया जी की खेतशाला में धान, ज्वार, बाजरा, कोदौ, कुटकी, काकुन जैसे विश्वामित्री अन्नों की शताधिक प्रजातियां हैं.

विश्वामित्री अन्न… हां, इन्हें विश्वामित्री अन्न ही कहते हैं जो इस भारत देश को भीषणतम अकालों से बचाता आया है. कोदौ के बारे में तो मान्यता है कि सूखी जमीन पर इसे गाड़ दीजिए, दस साल तक जस का तस रहा आएगा. सत्तर के दशक के पहले तक गांव में कोदौ की पैदावार ही बड़े आदमी होने का पैमाना था. और दूसरे अन्न भी ऐसे हैं जैसे अपनी परवरिश के लिए किसानों को तंग नहीं करते. बंजर जमीन, कम पानी बिना खाद के पैदा होते हैं. इनमें कीटनाशकों का जहर नहीं मिला होता.

कथा है कि इन्हीं अन्नों की खोज की वजह से गाधि पुत्र विश्व भर के मित्र कहलाए. वहीं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र. इन्होंने ब्रह्मा के समानांतर एक अलग सृष्टि रच दी. राजा त्रिशंकु के लिए नया स्वर्ग बना दिया. इनकी सृष्टि की प्रजा खाए क्या, इसके लिए देव अन्नों के मुकाबले लोक अन्न पैदा कर दिए. लोकमान्य के गीता रहस्य में एक प्रसंग है कि एक बार भीषण अकाल में विश्वामित्र को कई दिनों तक भूखा रहना पड़ा. जीवन बचाने के लिए कुत्ते का मांस खाना पड़ा. किसी ने इस पापकरम के लिए इन्हें टोका तो उसे फटकारते हुए कहा कि यदि जिंदा रहे तो इस अकाल से सबसे पहले निपटेंगे. फिर उन्होंने अकालजयी अन्नों की रचना की.

ये अन्न, जिन्हें गरीबों का मोटिया अन्न कहा जाता था… आज अमीरों की जरूरत बन गए. कम कैलोरी के अन्नों में चिकित्सक इन्हें ही सुझाते हैं. कुछ दिनों पहले पढ़ा था, गुजरात के अमीरों के जीवन का सहारा बने गरीबों के मोटिया अन्न. ये ब्लडप्रेशर, डायबिटीज के औषधीय पथ्य हैं. बाबा रामदेव की कंपनी मोटिया अन्न के दलिया, आटे का अरबों का व्यवसाय कर रही है. अमीरों की पार्टियों के मीनू में ये इसीलिए आए.

दुनिया घूमती है, चलकर फिर उसी ओर जाना पड़ेगा. हमारी कृषि नीति में ये अकालजयी और पौष्टिक अन्न क्यों नहीं. हमें जीटी, बीटी, जीम, डंकल बीजों का गुलाम क्यों बना दिया गया. इसका विवेचन फिर कभी अभी तो इतना निवेदन कि अपनी रसोई में पहले जैसा फिर इनका स्वागत करिए और पुरखों को धन्यवाद दीजिए कि भले ही हमने उन्हें भुला दिया है, वे हमारे पोषण की पहले ही चिंता कर गए हैं.

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