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दूसरों के लिए उपयोगी बनना है संस्कार व संस्कृति की अभिव्यक्ति – लक्ष्मीनारायण भाला

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गेयटी में ‘संस्कारों व संस्कृति की अभिव्यक्ति’ विषय पर संगोष्ठी

शिमला. हमें अपने आप को दूसरों के लिए उपयोगी बनाना है. इससे बड़ा संस्कार व इससे बड़ी संस्कृति दूसरी कोई नहीं हो सकती है. जो दूसरों के लिए उपकारी न हो, वह भले कितना ही बड़ा क्यों न हो, न उसके संस्कार और न ही उसकी संस्कृति कभी श्रेष्ठ हो सकती है. हिन्दुस्तान समाचार के पूर्व संरक्षक लक्ष्मीनारायण भाला ने ‘संस्कारों एवं संस्कृति की अभिव्यक्ति’ विषय पर शिमला के गेयटी परिसर स्थित ललित कला अकादमी की कला दीर्घा में आयोजित व्याख्यान में संबोधित किया. विषय को नई शिक्षा नीति से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि पूर्व में जब शिक्षा मंत्रालय को मानव संसाधन मंत्रालय में बदला गया तो केवल रोजागार देना भर ही शिक्षा का अंतिम लक्ष्य निर्धारित किया गया. जबकि वास्तविकता में शिक्षा को इससे कहीं अधिक होने की आवश्यकता थी. उसी को देखते हुए स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद अब मौजूद केन्द्र सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को संस्कार और संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया गया है. जिसमें स्कूली शिक्षा से पूर्व की शिक्षा को संस्कारप्रद बनाया गया है. 3 से 5 वर्ष के ये बच्चे मातृभाषा में शिक्षा लेंगे, जहां उन्हें माता-पिता सहित आप-पास के परिवेश के बारे में संस्कारित किया जाने का लक्ष्य है. वहीं दूसरे व तीसरे चरण में गतिविधि और तकनीक आधारित शिक्षा पर बल दिया गया. इसके पश्चात जो छात्र शिक्षा पूरी कर करियर की दिशा में बढ़ेगा, उसके लिए शिक्षा का यह उद्देश्य रखा गया है. यानि सभी प्रकार की शिक्षा के बाद समाज को हम क्या दे सकते हैं, ये नई शिक्षा नीति की संस्कृति है, जो निश्चित रूप से अनुकरणीय नेतृत्व का निर्माण करने में सक्षम होगी.

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि विश्व संवाद केन्द्र शिमला के संरक्षक प्रो. नरेन्द्र शारदा ने मुख्य वक्ता द्वारा शिक्षा नीति को लेकर दी गई जानकारी को बहुमूल्य व सारगर्भित बताया. कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. कर्म सिंह सचिव भाषा कला एवं संस्कृति अकादमी, हि.प्र. ने लक्ष्मीनारायण भाला के विचारों को अनुकरणीय बताया. कार्यक्रम का संयोजन विश्व संवाद केन्द्र शिमला के प्रमुख डॉ. दलेल ठाकुर ने किया. मंच संचालन प्रो. प्रियंका वैद्य द्वारा किया गया.

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