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ट्रैक्टर परेड व हिंसा – राजधानी दिल्ली की सड़कों पर लोकतंत्र का चीरहरण

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गोपाल गोस्वामी

गणतंत्र दिवस भारतीय लोकतंत्र का सबसे पवित्र दिन माना जाता है, इसी दिन हम भारत के लोगों ने स्वयं बनाए नियमों से समाज जीवन में व्यवहार करने का संकल्प लिया. इसी दिन वह संविधान क्रियान्वित हुआ, जिसकी आड़ में दिल्ली की सड़कों पर नंगा नांच हुआ. इसी संविधान ने हमको अधिकार दिया है शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए धरना प्रदर्शन करने का. परन्तु, जिस प्रकार से इस अधिकार का दुरूपयोग कर सरकारी संपत्ति का नाश किया जा रहा है, पुलिस को ट्रैक्टर से रोंदने के प्रयास की घटनाएं हुईं, बैरिकेड तोड़कर नियत प्रदर्शन के मार्ग को छोड़ लालकिले पर खालिस्तानी झंडा फहराया गया, यह इस देश में पहले कभी नहीं हुआ. सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हुए, आगजनी व तोड़फोड़ की गयी. वह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक दिन और शर्मनाक घटना थी. दिल्ली के लोगों को जिस प्रकार तलवारों लाठियों से लैस होकर शहर में जैसे बंधक बना लिया हो. किसानों के नाम पर किया जा रहा यह तमाशा लोकतंत्र का बलात्कार ही है.

कौन हैं ये लोग? क्या इरादा है इनका? किसकी शक्ति काम कर रही है इनके पीछे? कौन पैसा दे रहा है इस अराजकता को? इनका लक्ष्य क्या है?

भारत सरकार कृषि सुधार बिल लाई है, उनका मकसद इस देश में स्वतंत्रता से लेकर अब तक अनेक प्रकार की रियायतों, बिजली के बिलों की माफी, कम ब्याज पर कृषि ऋण, आयकर से मुक्ति इत्यादि अनेक सुविधाएं प्रदान करने के पश्चात भी सैकड़ों किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या व छोटे व मझोले किसानों की दयनीय स्थिति को बेहतर करने की दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है. बड़े किसान साधन समपन्न हैं, उनकी उपज मंडियों तक ले जाने या बाजार में बेचने के विकल्प उनके पास हैं. परन्तु छोटे किसानों को कम संसाधनों के कारण आढ़तियों/दलालों को कम मूल्य पर अपनी फसल बेचने को बाध्य होना पड़ता था. बड़े किसानों की भूमिका इस दलाली में महत्व की है. नए कृषि बिल के अनुसार अब सभी किसान अपनी उपज खुले बाजार या सीधे उपभोक्ताओं को बेच सकते हैं और यहां पर बड़े किसानों व आढ़तियों की कमाई समाप्त हो जाती है, बस यहीं से इस आंदोलन के बीज निकले, बड़े किसानों के डर से छोटे भी आंदोलन में शामिल हुए. परन्तु शीघ्र ही यह आंदोलन किसी और दिशा में मुड़ गया, दिशा व दशा दोनों बदल गयी, ड्राइवर सीट पर अब किसान नहीं कोई और था.

जैसे-जैसे आंदोलन बढ़ता गया, हिंसा, उपद्रव, सड़क-रास्ते जाम करना इत्यादि भी बढ़ता गया. अब इस आंदोलन में डिज़ाइनर किसानों की एंट्री हुई, योगेंद्र यादव जैसे बरसाती गिरगिट किसानों के वार्ताकार बन गए, CAA /NRC / धारा 370 हटाओ के नारे लगने लगे. दिल्ली दंगों के आरोपी शरजील इमाम जो उत्तरपूर्व को भारत से काटने की बात करता था, उमर खालिद जो दिल्ली दंगों का मास्टर माइंड है, उसे छोड़ने की डिमांड की जाने लगी. वामपंथी पत्रकारों, टीवी चैनल ने इसको हवा देने का काम किया. किसान के नाम पर सड़कें जाम कर बैठे उपद्रवियों को किसान का सर्टिफिकेट मिलने लगा. स्वरा भास्कर, बरखा दत्त जैसे टुकड़े-टुकड़े गैंग समर्थक बिरयानी छकने सिंघु बॉर्डर के टैंट्स में पधारने लगे, और इस तरह एक षड्यंत्र के तहत आठ से नौ बार की सरकार से वार्ता एक या दूसरे कारण रहित कारणों से विफल की जाती रही. समय बिताने के लिए सरकार को वार्ता में उलझाए रखा गया ताकि गणतंत्र दिवस पर बड़ा काण्ड किया जा सके.

गणतंत्र दिवस पर पूरे विश्व का मीडिया दिल्ली में होता है, इसका उपयोग करने के लिए ही यह दिन चुना गया ताकि देश विदेश में भारत सरकार व विशेषतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को धूमिल किया जा सके. कई विद्वानों ने पूर्व में ही आगाह कर दिया था, जिस प्रकार डोनाल्ड ट्रम्प को बदनाम करने के लिए कैपिटोल हिल में दंगाई घुसाए गए वही प्रोग्रोम दिल्ली में आजमाया गया. पिछले दो दिन से पूरे विश्व में यही खबर चलायी जा रहे है, एक सोची समझी रणनीति के तहत जिससे भारत की छवि ख़राब हो, देश में अराजकता का माहौल दिखा कर कोरोना के पश्चात चीन से भारत में आ रही कंपनियों को उनके निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करना इसका कारण है. इस पूरे किसान आंदोलन में जिस प्रकार वामपंथी किसान संगठनों, बुद्धिजीवियों व कामरेडों की भूमिका रही है, चीन का धनबल इसके पीछे होना कोई आश्चर्य का कारण नहीं होना चाहिए. वामपंथियों का इतिहास रहा है उन्होंने भारत-चीन युद्ध के समय भी चीन का साथ दिया था वो भी तब जब भारत में वामपंथ चरम पर था, अब तो कुल जमा केरल उनके पास बचा है. आर्थिक तंगी में उनका चीन को अपना देश बेच देना कोई बड़ी बात नहीं है.

इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे तथाकथित किसान नेताओं को कल की घटना का जिम्मेदार ठहराया जाए और उन पर कठोर कार्यवाही हो क्योंकि उन्होंने जिम्मेदारी ली थी शांतिपूर्ण मार्च की. सभी दंगाइयों को चिन्हित कर कठोर सजा दी जाए, उत्तरप्रदेश की भांति नुकसान की भरपाई इन तथाकथित किसानों की संपत्ति बेचकर की जाए.

जिहादी संगठन 370 व CAA के समय कुछ नहीं कर सके क्योंकि वो बेनकाब हो चुके थे, परन्तु अब उन्होंने सिक्खों, दलितों को आर्थिक ढांचा देकर एक नए अस्त्र के रूप में आगे करना आरम्भ कर दिया है. अब वह परोक्ष रूप से लड़ाई लड़ रहे हैं. इससे उन्हें कई फायदे हैं, उनका नाम नहीं आता, हिन्दू समाज कमजोर पड़ता है. राजनीतिक पार्टियां अपने निहित स्वार्थ के कारण देश को तोड़ने, कमजोर करने का कृत्य कर रही हैं, इसका लाभ जिहादी तत्वों को मिल रहा है. इतना याद रखें जब तक भारत में हिन्दू बहुसंख्यक है, तब तक ही लोकतंत्र है, जब तक लोकतंत्र है, तभी राजनीतिक पार्टियों का अस्तित्व है. इसलिए इस लोकतंत्र को सहेज कर रखना परम आवश्यक है.

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