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जनजाति समाज – अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक बार-बार बदला धर्म कोड, पर जीवन व पूजा पद्धति नहीं बदल सके

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ईसाई मिशनरियां और कुछ ताकतें पिछले लगभग डेढ़ सदी से यह स्थापित करने में लगी हैं कि वनवासी हिन्दू नहीं हैं. हालाँकि, उनके नेरेटिव को उनके ही द्वारा पोषित -पल्लवित मणिपुर के फादर एंडरसन मॉउरी ने पहले वेटिकन सिटी और फिर मणिपुर में तार -तार कर दिया था. इसके बाद भी मिशनरियां रुकी नहीं हैं. वे छल-प्रपंच से; तो कभी राजनेताओं को साधकर वनवासियों को गैर-हिन्दू बताने के प्रयास में निरंतर लगी हुई हैं.

इस वर्ष २१ फरवरी को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में छात्रों की ओर से आयोजित एक कांफ्रेंस ‘झारखंड कैसा है और भारत कैसा है?’ को संबोधित करते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा “आदिवासी (वनवासी) कभी भी हिन्दू नहीं थे, न हैं. इसमें कोई कंफ्यूजन नहीं है. हमारा सब कुछ अलग है.” आगे कहा था कि “हम अलग हैं, इसी वजह से हम आदिवासी में गिने जाते हैं. हम प्रकृति पूजक हैं”. पूर्व मंत्री देव कुमार धान ने उसमें जोड़ा – ‘आदिवासी हिन्दू इसलिए नहीं हैं कि हिन्दुओं में जो वर्ण व्यवस्था है, उसमें आदिवासी कहीं नहीं हैं. यही नहीं, हिन्दुओं के लिए १९५५ में हिन्दू विवाह अधिनियम बना है, जो आदिवासियों पर लागू नहीं होता है. इसके साथ -साथ सुप्रीम कोर्ट भी कई बार कह चुका है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं.’

अंग्रेजों ने वनवासियों को ‘आदिवासी’ की संज्ञा देकर हिन्दुओं को विभाजित करने का कार्य सुनियोजित रूप से किया, जिसे स्वाधीन भारत की सरकारों ने जारी रखा.’ आदिवासियों को आदिवासी धर्म’ की मान्यता अंग्रेजों ने ही दी थी. अंग्रेज सरकार इस विषय में स्वयं कितनी भ्रमित थी, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने वनवासियों की पहचान १८७१ में Aborgines (मूलनिवासी), १८८१ और १८९१ में Aborigional (आदिवासी), १९०१, १९११ और १९२१ में Animist (जीववादी), १९३१ में Tribal Religion (जनजातीय धर्म) तथा १९४१ में Tribal (जनजातीय) के रूप में सरकारी रेकॉर्ड में दर्ज किया. स्वाधीनता के बाद पहली बार जनगणना १९५१ में हुई तो आदिवासियों को अंग्रेजों द्वारा दिया गया ‘धर्म कोड’ हटाकर आदिवासियों को धर्म कॉलम में ST स्टेटस दिया गया.

इसके बाद १९६१ में जनगणना हुई तो आदिवासियों का ‘धर्म कोड’ पूरी तरह समाप्त कर दिया गया. उसके बाद से ही वनवासियों को अलग धर्मकोड़ दिलवाने की राजनीति ने जोर पकड़ा, जिसका परिणाम है कि झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जैसे लोग भी मिशनरियों के सुर- में -सुर मिलाकर कह रहे हैं ‘वनवासी हिन्दू नहीं हैं’. जबकि वे स्वयं वनवासी समाज से हैं और भगवान शंकर की पूजा भी करते हैं. यही नहीं झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के प्रेरणास्थल बिरसा मुंडा ने वनवासियों को ईसाई बनाने से न केवल बचाया, बल्कि उनकी हिन्दुत्व में वापसी का आंदोलन भी चलाया था. प्रबुद्ध और प्रभावशाली वनवासी जब वनवासियों को ‘आदिवासी’ के रूप में सम्बोधित करते हैं और उनको ‘गैर-हिन्दू’ कहते हैं तो सर्वोच्च न्यायालय भी अजीबोगरीब निर्णय देते हुए कहता है कि ‘आदिवासी हिन्दू नहीं हैं’ और अधिसंख्यक हिन्दुओं को बुरा नहीं लगता. जबकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३६६ (२५) की भाषा- परिभाषा के अर्थों में अनुसूचित जनजाति के सदस्य/नागरिक ‘हिन्दू’ माने जाते हैं.

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