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सत्य को भी चाहिए समाज की शक्ति का आधार

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अनन्त विजय

शुक्रवार को जुम्मे की नमाज के बाद देश के कई राज्यों में जिस तरह से उपद्रव और बवाल हुआ उसके बाद हिन्दुओं और मुसलमानों के रिश्तों को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है. न्यूज चैनलों और इंटरनेट मीडिया पर पर कई स्वयंभू विचारक नए नए सिद्धांत पेश कर रहे हैं. कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के हाल में संघ शिक्षा वर्ग के तृतीय वर्ष के समापन समारोह में दिए उनके वक्तव्य को उद्धृत कर रहे हैं. कुछ उत्साही विश्लेषक मोहन भागवत के वक्तव्य के उस अंश को उद्धृत करते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं, जहां उन्होंने ज्ञानवापी के संदर्भ में अपनी बात रखी. वो लगातार चीख रहे थे कि संघ ने मुसलमानों को लेकर अपना स्टैंड बदल लिया है और अब संघ अपनी मुस्लिम विरोध की छवि में सुधार करना चाहता है. इंटरनेट मीडिया पर हिन्दुत्व की ध्वजा लेकर विचरण करने वाले कई विद्वान तो मोहन भागवत के इस बयान की तुलना लालकृष्ण आडवाणी के जिन्ना के मजार पर लिखी टिप्पणी से कर बैठे. उनकी इन बचकानी टिप्पणियों पर बात करने से पहले जरा देख लेते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा क्या था.

सरसंघचालक ने कहा था कि ज्ञानवापी का अपना एक इतिहास है, जिसको हम बदल नहीं सकते हैं. इसको न आज के हिन्दू ने बनाया, न आज के मुसलमानों ने बनाया. ये उस समय घटा. इस्लाम बाहर से आया, आक्रामकों के साथ आया. उस आक्रमण में भारत की स्वतंत्रता चाहने वाले व्यक्तियों का मनोधैर्य खच्च करने के लिए देवस्थान तोड़े गए, जिनकी संख्या हजारों में है. उनमें से कइयों का हिन्दुओं की आस्था में विशेष स्थान है. हिंदुओं को लगता है कि पुनर्उत्थान का कार्य करना चाहिए. राममंदिर का एक आंदोलन हुआ, अब उस तरह का आंदोलन नहीं करना है. लेकिन इश्यू जो मन में हैं वो उठते तो हैं. वो किसी के विरुद्ध नहीं हैं. …आपस में मिल बैठकर सहमति से रास्ता निकालना चाहिए. हर बार सहमति से रास्ता नहीं निकलता तो संविधान सम्मत न्याय व्यवस्था को मानना चाहिए और उस पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहिए. इसी क्रम में वो कहते हैं कि ज्ञानवापी में हिन्दुओं की श्रद्धा है, लेकिन हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों देखना. उसके आगे भी उनका वक्तव्य चलता है जिसमें वो बाहर से आई पूजा पद्धति को अपनाने वालों को भी भारतीय बताते हैं. उनके और हिन्दुओं के पूर्वजों के एक होने की बात करते हैं. लेकिन उनका पूरा जोर शक्ति पर होता है.

अपने वक्तव्य के आरंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बहुत स्पष्टता के साथ राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात रखी. विस्तार से धर्म और स्व को परिभाषित किया. समन्वय, संतुलन, सबको साथ लेकर चलने, सबकी उन्नति करना ही स्व है और उसके आधार पर ही देश के तंत्र को स्थापित करने की बात होती है. धर्म के संरक्षण के लिए मोहन भागवत जी ने स्पष्ट किया कि वो दो प्रकार से होता है. एक तो जब धर्म पर आक्रमण होता है तो उसको आक्रमण से बचाना होता है, बलिदान देना होता है. लड़ाई भी करनी पड़ती है. इसके अलावा धर्माचरण के माध्यम से धर्म की अभिवृद्धि की बात भी उन्होंने की. संघ प्रमुख ने जो बात रखी वो कोई नई बात नहीं कही है. नए विचारकों के लिए ये नई बात हो सकती है, लेकिन मुसलमानों को लेकर संघ का ये विचार वर्षों से रहा है. हिन्दुत्व और आक्रामक हिन्दुत्व को परिभाषित करने वाले राजनीतिक विश्लेषक गुरुजी गोलवलकर का नाम लेना नहीं भूलते हैं और ना ही भूलते हैं उनकी पुस्तक ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ को. इस पुस्तक के आधार पर वो मुसलमानों के प्रति संघ की सोच को व्याख्यायित करते हैं. लेकिन हिन्दुत्व को या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच को विश्लेषित करने वाले नए विचारक इस तथ्य से या तो अनभिज्ञ हैं या फिर उसको जानबूझकर उजागर नहीं करते कि जिस वक्त गुरु गोलवलकर ने ये पुस्तक लिखी थी वो न तो संघ के पदाधिकारी थे और न ही सरसंघचालक. मुसलमानों को लेकर संघ की क्या सोच रही है, इसको जानने के लिए गुरू गोलवलकर और पत्रकार सैफउद्दीन जिलानी की 30 जनवरी, 1970 की बातचीत देखनी चाहिए. ये बातचीत नरेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण में संकलित है. इसमें जब सैफउद्दीन साहब ने मुसलमानों को लेकर उनके दृष्टिकोण के बारे में पूछा तो गुरुजी का कहना था कि हमें ये बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी कि हम सबके पूर्वज एक ही हैं. हम सब उनके वंशज हैं. आप अपने-अपने धर्मों का प्रामाणिकता से पालन करें, परंतु राष्ट्र के मामले में हम सबको एक रहना चाहिए. राष्ट्रहित के लिए बाधक सिद्ध होने वाले अधिकारों और सहूलियतों की मांग बंद होनी चाहिए. हम हिन्दू हैं, इसलिए हम विशेष सहूलियतों या अधिकारों की कभी बात नहीं करते. इसी बातचीत में गुरूजी एक जगह कहते हैं कि भारतीयकरण का अर्थ सबको हिन्दू बनाना तो नहीं है. तो अगर गुरू गोलवलकर की बातों को ध्यान से देखें तो यही लगेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत उन्हीं बातों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ा रहे हैं. संघ अपनी नीति पर कायम है, न तो कोई स्टैंड बदला है और न ही राष्ट्रविरोधियों को लेकर साफ्ट हुआ है.

हिन्दू धर्म और संघ की नीतियों के नए विश्लेषकों को मोहन भागवत जी के हाल के भाषण को फिर से सुनना समझना चाहिए. इस भाषण में मोहन भागवत ने एकाधिक स्थान पर शक्ति की महत्ता को रेखांकित किया है. वो तो यहां तक कहते हैं कि सत्य को भी शक्ति का आधार चाहिए होता है. बिना शक्ति के दुनिया नहीं मानती. उनके वक्तव्य की बारीकियों को समझे बिना किसी तरह का विश्लेषण अधूरा लगता है. वो हिन्दू समाज को शक्ति देने की बात कर रहे हैं. बार बार कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि बगैर शक्ति के दुनिया आपकी बात मानना तो दूर सुनेगी भी नहीं. आज अगर भारत में हिन्दुओं की बात सुनी जा रही है तो उसके पीछे समाज की शक्ति है. वो स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि दुनिया में दुष्ट लोग हैं जो हमको जीतना चाहेंगे, इसलिए शक्ति की आराधना करनी चाहिए. उनके लगभग इकतीस मिनट के भाषण में हिन्दू समाज को शक्ति देने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार आती है. मोहन भागवत की आलोचना करने वाले व्याख्याकारों और टीकाकारों को उनके वक्तव्य को समग्रता में देखना चाहिए. संघ प्रमुख ने न तो संघ का कोई स्टैंड बदला है, न ही वो मुसलमानों को खुश करने के लिए ऐसी बात कर रहे हैं. संघ हमेशा से भारतीय मुलमानों को यहां का मानता है. उनको आक्रमणकारियों के साथ जोड़कर नहीं देखता है और यही अपेक्षा करता है कि इतिहासकार और भारतीय मुसलमान भी अपने को भारतीय मानें और आक्रांताओं के साथ खुद को जोड़कर नहीं देखें. नए नए संघ विचारक बने टीवी चैनलों की खिड़कियों पर रात दिन टंगे रहने वाले स्वयंभू विद्वान किसी भी चीज को समग्रता में नहीं देख पाते हैं. नतीजा यह होता है कि किसी वक्तव्य के एक छोटे हिस्से के आधार पर उसका मूल्यांकन करके निर्णय देने लग जाते हैं और दोष के शिकार हो जाते हैं. हर मस्जिद में शिवलिंग खोजने का जो बयान है, उसके पहले भी काफी देर तक हिन्दू समाज को शक्ति देने की, धर्म की, स्व की, धर्माचरण के बारे में कहा गया. लेकिन न तो उसको सुनने की किसी को फुर्सत है और न ही उसकी बारीकियों को विश्लेषित करने की कला. इसका नुकसान ये होता है कि समाज में गलत संदेश जाता है और भ्रम की स्थिति बनती है. इससे बचा जाना चाहिए.

2 thoughts on “सत्य को भी चाहिए समाज की शक्ति का आधार

  1. अतिशय अभ्यासपूर्ण लेख है, दृष्टीकोन बदल गया, धन्यवाद

  2. गोलवलकर गुरुजी के संतुलित बयान से मुसलमानों के व्यवहार में कुछ बदलाव आया था ❓
    तो क्या अब भागवत जी के बयान से आएगा ❓
    😆

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