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दो बहनों ने गांव में कोरोना संकट काल के दौरान जगाई शिक्षा की अलख

टीकमगढ़ के पास बसे छोटे से गांव डूंडा में रहने वाली दो जुड़वा बहनें. जिन्होंने कोरोना काल में शिक्षा को महत्व देते हुए अपने गांव में बच्चों को एकत्रित करके निःशुल्क शिक्षा देने का कार्य किया. दोनों बहनों ने घर-घर जाकर बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान की. स्कूल कॉलेज बन्द थे, इसलिए दोनों बहनों ने घर-घर जाकर शिक्षा प्रदान करने की ठानी और निकल पड़ीं बच्चों में शिक्षा की अलख जगाने.

अदिति-अर्पिता जैन ने सागर के कॉलेज से ग्रेजुएशन की और उसके बाद बीएड करके अतिथि शिक्षक के लिए कोशिश की. लेकिन नौकरी नहीं लगी. इसलिए गांव में आकर 4 वर्षों तक निःशुल्क शिक्षा प्रदान करती रहीं. सिर्फ कोरोना के समय ही नहीं, बल्कि पहले से ही दोनों बहनें निःशुल्क शिक्षा प्रदान कर रही थीं.

गांव की स्थिति को देखकर उनके स्कूल के हेड मास्टर राष्ट्रपति शिक्षक सम्मान से सम्मानित संजय जैन से दोनों बहनों ने कहा कि हम बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं. इसलिए जब भारत सरकार ने थोड़ी छूट दी तो लोगों को जागरूक किया, मास्क सेनेटाइजर का ज्ञान कराया और बच्चों को पढ़ाना शुरू किया.

आवश्यकता आविष्कार की जननी है, इस बात को चरितार्थ किया दोनों बहनों ने. लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन माध्यम से कक्षाएं लगना शुरू हुईं थीं. गांव में स्मार्टफोन न होने से और अन्य कोई ज़रिया न होने के कारण ऑनलाइन कक्षा का लाभ बच्चों को नहीं मिल पा रहा था. इसके लिए दोनों बहनों ने शिक्षा को “घर-घर शिक्षा, हर घर शिक्षा” को ध्येय बनाते हुए घर से बच्चों को एकत्रित कर उनको शिक्षा से जोड़ा. गांव में चौपाल लगाकर बच्चों को पढ़ाया और बच्चों की पढ़ाई संबंधित समस्याओं को हल किया.

गांव में विद्यालय के हेड मास्टर संजय द्वारा या पड़ोसी द्वारा अपने घर का एक कमरा दे दिया जाता था. वहीं, दोनों बच्चों को सोशल डिस्टेंसिंग से बैठाकर पढ़ाती थीं. एक्टिंग, पेंटिंग और रेडियो व नए-नए नवाचार करके बच्चों को पढ़ाया. एक्टिविटी के माध्यम से पढ़ाते थे, जिससे बच्चों का मन शिक्षा ग्रहण करने में लगे. जग प्रसिद्ध उदाहरण है कि जब छोटे से बच्चे को कड़वी दवाई पिलाई जाती है तो वो बताशा के साथ दी जाती है, जिससे बच्चे को दवा कड़वी न लगे. लेकिन इसका उद्देश्य यही रहता है कि बच्चा दवाई को ग्रहण करे. इसी तरह से एक्टिविटीज के माध्यम से बच्चों को शिक्षा मिले, सही जानकारी पहुंचे, भले माध्यम कुछ भी हो.

दोनों ही समय-समय पर बच्चों को प्रेरित भी करती थीं कि बच्चे आगे आकर शिक्षा ग्रहण करें और शिक्षा की महत्ता को भी समझें.

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का बनाया ब्रांड एम्बेसडर

शिक्षा के प्रति इतनी जागरुकता को देखकर अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस पर अदिति जैनऔर अर्पिता जैन को शिक्षा के क्षेत्र में अलख जगाने के लिए टीकमगढ़ जिले के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा टीकमगढ़ जिले की “बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ” का महिला ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया तथा शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर “कॉफी विद कमिश्नर” में सम्मानित भी किया गया.

अफसर बनकर शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने का है मन

दोनों बहनों का कहना है कि वे लोगों के बीच जाकर उनसे जुड़ना चाहती हैं. इसलिए अधिकारी बनकर हर क्षेत्र में जा पाएंगी. उन्हें पैसों के लिए नहीं, घर वालों के लिए नहीं, बल्कि लोगों से संपर्क बन सके उनको शिक्षा के प्रति जागरूक कर सकें, इसलिए उनको अधिकारी बनना है. इसके लिए वो दिन रात मेहनत भी कर रही हैं.

नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था कि “शिक्षा वह शक्तिशाली हथियार है, जिससे हम पूरी दुनिया को बदल सकते हैं”.

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