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नए अंदाज को समझिए…!!!

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जयराम शुक्ल

गहना बेचने वाली एक नामी कंपनी के एक चर्चित विज्ञापन पर कुछ बात करें, उससे पहले मेरी स्मृति में टंकी जीवन की एक सच्ची कहानी –

बात 67-68 की है. मेरे गांव में बिजली की लाइन खिंच रही थी. तब दस-दस मजदूर एक खंभे को लादकर चलते थे. मेंड़, खाईं, खोह में गढ्ढे खोदकर खड़ा करते. जब ताकत की जरूरत पड़ती तब एक बोलता.. या अलीईईईई.. जवाब में बाकी मजदूर जोर से एक साथ जवाब देते…मदद करें बजरंगबली..और खंभा खड़ा हो जाता.

सभी मजदूर एक कैंप में रहते, साझे चूल्हे में एक ही बर्तन पर खाना बनाते. थालियां कम थीं तो एक ही थाली में खाते भी थे. जहां तक याद आता है…एक का मजहर नाम था और एक का मंगल.

ये हम लोग इसलिए जानते थे कि दोनों में जय-बीरू जैसी जुगुलबंदी थी. जब काम पर निकलते तो एक बोलता – चल भई मजहर..दूसरा कहता हां, भाई मंगल.

अपनी उमर कोई पाँच-छह साल की रही होगी, बिजली तब गांव के लिए तिलस्म थी जो साकार होने जा रही थी. यही कौतूहल हम बच्चों को वहां तक खींच ले जाता था. वो लोग अच्छे थे एल्मुनियम के तार के बचे हुए टुकड़े देकर हम लोगों को खुश रखते थे.

उनकी एक ही जाति थी..मजदूर और एक ही पूजा पद्धति मजदूरी करना. तालाब की मेंड़ के नीचे लगभग महीना भर उनका कैंप था. न किसी को हनुमान चालीसा पढ़ते देखा न ही नमाज.

सब एक जैसी चिथड़ी हुई बनियान पहनते थे, पसीना भी एक सा तलतलाके बहता था. खंभे में हाथ दब जाए तो कराह की आवाज़ भी एक सी ही थी. और हां मजहर के लहू का रंग भी पीला नहीं लाल ही था.

मजहर और मंगल की एकता देश और समाज के निर्माण के सापेक्ष थी. यही वह समरसता है जो भारतमाता अपने सपूतों से चाहती है. ऐसी समरसता जहां जाति, धर्म, नस्ल, अस्मिता सब एकाकार हो जाए. कुछ ऐसी ताकतें हैं जो नहीं चाहतीं कि ऐसा कुछ हो. उनके साजिशों की बुनावट इतनी महीन होती है कि बात जबतक समझ में आए, तब तक काफी देर हो चुकी होती है.

गहना बेचने वाली कंपनी के विज्ञापन में यदि मजहर-मंगल जैसी भावनाओं की अभिव्यक्ति होती तो वह स्वागतेय थी…लेकिन कंपनी के क्रिएटिव हेड और कॉपी राइटर का मकसद तो एक नए तरीके के जिहाद को संपुष्ट करता है. इसकी तह तक जाएं और पता लगाएं कि यह विज्ञापन, जिसमें एक मुसलमान परिवार में हिन्दू लड़की को बहू के रूप में चित्रित किया गया है, किसने गढ़ा है तो सारी असलियत सामने आ जाएगी.

देश में जबसे इस्लामिक आतंकवाद की काली छाया पड़ी है, तब से कई मोर्चे खुले हैं. एक मोर्चा लव जिहाद का है. गांव और छोटे कस्बे से लेकर महानगरों तक यह सिलसिला चल रहा है. भोली-भाली हिन्दू लड़कियों को अपने जाल में फंसाकर धर्मपरिवर्तन के साथ शादी, फिर बच्चे पैदाकर सड़क पर मरने के लिए छोड़ देना ऐसी घटनाएं आम हैं.

इस हकीकत को समझते हुए हिन्दू संगठनों द्वारा ‘लव जिहाद’ के खिलाफ एक वातावरण बनाया जा रहा था. कई बच्चियां इन कसाइयों के चंगुल से मुक्त कराई गईं. लेकिन यह विज्ञापन एक तरह से ‘लव-जिहाद’ का बचाव ही है. विज्ञापन में सीधा संदेश है कि मुस्लिम परिवारों में हिन्दू लड़कियों का इतना  सम्मान होता है, जितना की उनके परिवारों में नहीं.

यह विज्ञापन न तो कोई चूक है और न ही धार्मिक समरसता का कोई प्रयोजन. यह एक तरह से ‘क्रिएटिव जिहाद’ है, जिसका प्रयोग बालीवुड के फिल्मकार वर्षों से करते आ रहे हैं. बॉलीवुड की प्रायः हर दूसरी फिल्मों में..हिन्दू व मुसलमान के धर्म तत्व घुसेड़े जाते रहे हैं और हिन्दू प्रतीकों का कैसे मजाक उड़ाया जाता है, यह बताने नहीं बल्कि नजरिया बदलकर देखने का विषय है.

देश में जब भी कभी स्वाभिमान का दौर आता है तो कतिपय बौद्धिक तत्व अपना नेरेटिव सेट करने में लग जाते हैं. टाटा की तनिष्क कंपनी के इस विज्ञापन को लेकर भी यही शुरू हो गया है. कमाल की बात यह कि इसे समझाने के लिए जलालुद्दीन उर्फ अकबर को सामने ले आए.

अकबर का जोधा प्रसंग सदियों से भारतीयों के ह्दय में टीसता रहा है. साम्यवादी इतिहासकारों ने अकबर की महानता के कसीदे पढ़े. बॉलीवुड के मुसलमान फिल्मकारों ने मुगल-ए-आजम जैसी फिल्मों के जरिए अकबर की ऐसी छवि गढ़ी जैसे वह कितना बड़ा महाबली देवदूत हो. जबकि वास्तव में अकबर से बड़ा क्रूर, कामुक स्वेच्छाचारी इतिहास में कोई नहीं मिलता. उसने सारी उम्र हिंदुओं का धन और धरम लूटते हुए जिया. राजाओं को अपने आधीन स्वीकार करने की शर्त सिर्फ समर्पण ही नहीं, बल्कि बहन व बेटी को उसके हरम में भेजने की थी. अकबर के हरम में नब्बे प्रतिशत गैर मुस्लिम महिलाएं थी.

यह तथ्य मालूम होना चाहिए कि अकबर ने अपने सूबेदार को गोडवाना जीतने के लिए नहीं, अपितु रानी दुर्गावती को हरम के लिए पकड़वाने हेतु भेजा था. वह रानी दुर्गावती के रूप की चर्चा सुनकर लगभग वैसे ही मोहित था जैसे कि खिलजी पद्मावती को लेकर. लेकिन अकबर महान है अभी भी. एक विज्ञापन प्रसंग में अकबर की सहिष्णुता का दृष्टांत दिया है. ऐसे लोगों की मति पर तरस आती है.

देश को समरसता की जरूरत है और धार्मिक सद्भावना की भी. लेकिन एक दूसरे के बरक्स किसी को हेय या विनीत दिखाने की नहीं. यह समरसता मजहर और मंगल जैसों के दृष्टांत से निकलकर आनी चाहिए. एपीजे अब्दुल कलाम, अमर बलिदानी अब्दुल हमीद, उस्ताद बिस्मिल्ला खान के प्रसंगों से धार्मिक सद्भाव की बातें निकलनी चाहिए… गहना कंपनी का वह विज्ञापन (जो वापस लिया जा चुका है) अकबर के हरम के विस्तार को ही व्याख्यायित करता है..मुगल-ए-आजम की जोधाबाई प्रसंग की तरह.

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