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संयुक्त राष्ट्र संघ – समीक्षा और परिवर्तन समय की आवश्यकता

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देवेश खंडेलवाल

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 1945 में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में हुई थी. जिसके प्रमुख उद्देश्यों में उसके सदस्य देशों के मध्य पारस्परिक सहयोग, शांति और मित्रतापूर्ण व्यवहार को शामिल किया गया था.

इस साल यह संस्था 75 साल पूरे कर चुकी है और अगर इस समयावधि की समीक्षा करे कि क्या यह अपने उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा करने में सफल रहा, तो इसका जवाब नकारात्मक ज्यादा मिलेगा. कोई भी जागरूक व्यक्ति जो प्रतिदिन देश-दुनिया के घटनाक्रमों पर नजर रखता होगा, वह इस बात की गवाही दे सकता है कि पिछले सात दशकों में दुनिया भर में युद्ध, तनाव, और आतंकवाद अपने चरम पर पहुँच गया है.

इसी दौरान, हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सयुंक्त राष्ट्र की स्थापना से लेकर 90 के दशक तक दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर बैठी थी, जिसे कोल्ड वॉर यानि शीत युद्ध का नाम दिया गया था. इस दौर में वैश्विक अशांति और आपसी दुश्मनी इतनी बढ़ चुकी थी कि इसका फायदा अमेरिका (यूएस) और सोवियत यूनियन (यूएसएसआर) ने हथियारों की होड़ को बढ़ावा देकर उठाना शुरू कर दिया. आज हालात इतने बिगड़ गए हैं कि दुनिया के तानाशाह, आतंकवाद और कट्टरपंथ से ग्रसित देश अपने नागरिकों की भलाई के स्थान पर हथियारों की खरीद एवं विस्तार पर अधिक जोर दे रहे है. इसमें चीन, उत्तर कोरिया, पाकिस्तान और ईरान जैसे संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र संघ के पहले लगभग 40 साल तो उसके उद्देश्यों के विरुद्ध ही निकल गए. इस सम्बन्ध में कहा जाता है कि “शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र का काम सिर्फ दोनों महाशक्तियों – अमेरिका (यूएस) और सोवियत यूनियन (यूएसएसआर) के लिए प्रचार (प्रोपोगेन्डा) करना था”. इस कथन को कहने वाला कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजदूत, डोर गोल्ड थे. उन्होंने “Tower of Babble : How the United Nations Has Fueled Global Chaos” नाम से एक पुस्तक लिखी है, जिसमें वे संयुक्त राष्ट्र की आलोचना करते हुए लिखते हैं, “इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि संयुक्त राष्ट्र पर किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद के समाधान के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता”.

दूसरी ओर, शीत युद्ध समाप्ति के बाद वर्तमान परिदृश्य में भी संयुक्त राष्ट्र की शैली में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है. इसकी पुष्टि इतिहास विषय पर केन्द्रित एक प्रतिष्ठित टीवी चैनल ‘हिस्ट्री’ ने की है. चैनल ने अपनी वेबसाइट पर संयुक्त राष्ट्र संघ को उत्तेजक नीतियों का समर्थक, विवादास्पद स्वास्थ्य विकल्प प्रदान करने, और नौकरशाह होने जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए संबोधित किया है.

वास्तव में, यह कोई नाममात्र की आलोचना नहीं, बल्कि एक वास्तविकता है. जिसका प्रमाण “The Case for Peace : How the Arab-Israeli Conflict can be Resolved” नाम से प्रकाशित एक पुस्तक में मिलता है. इसके लेखक, एलन देरशोवित्ज़ के अनुसार, “कई दशकों से संयुक्त राष्ट्र संघ आतंकवाद को प्रमुखता से बढ़ावा देता रहा है और मासूम लोगों की हत्या करने वालों को वहां ‘फ्रीडम फाइटर्स’ तक कहकर परिभाषित किया जाता है”. वे आगे लिखते हैं, “विश्व में आज संयुक्त राष्ट्र को छोड़कर ऐसी कोई संस्था नहीं है जो आतंकवाद को इस हद्द तक मान्यता देती हो!”

संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक तनाव और आतंकवाद को लेकर जो लचीला रवैया है, वैसा ही उसके वैचारिक स्तर पर भी देखने को मिलता है. जब साल 2011 में उत्तर कोरिया के क्रूर तानाशाह किम जोंग-इल का निधन हुआ तो जनरल असेम्बली में कुछ क्षणों के लिए मौन रखा गया था. जबकि खुद संयुक्त राष्ट्र सहित मानवाधिकारों की लगभग अन्य सभी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने किम के शासन को दुनिया का सबसे ज्यादा निर्दयी, दमनकारी और मानवता के खिलाफ बताया था.

इसी तरह पिछले कुछ साल से कट्टरपंथी देशों विशेषकर पाकिस्तान और टर्की के प्रभाव में आकर संयुक्त राष्ट्र ‘इस्लामोफोबिया’ नाम से एक काल्पनिक शब्दावली को स्थापित करने में लगा हुआ है. जिसके अनुसार मुसलमानों का गैर-मुस्लिम देशों में धर्म के आधार पर कथित उत्पीड़न किया जाता है. हालांकि, यह अपने गुनाहों को छिपाने की साजिश के साथ-साथ एक भ्रमजाल है.

इसके विपरीत, बांग्लादेश के गठन के समय हिन्दुओं के नरसंहार और पाकिस्तान में आज गैर-मुसलमानों पर हो रहे उत्पीड़न के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र ने कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया. यह एक विडम्बना है कि हिन्दुफोबिया की सच्चाई को यह अंतरराष्ट्रीय संस्था जानबूझकर नजरअंदाज कर देती है. इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र संघ का दोहरा चरित्र भी सामने आता है. दरअसल, जब मुस्लिम शरणार्थियों – ईराक, ईरान, दक्षिण सूडान, सीरिया, यमन, यूक्रेन और रोहिंग्या की बात होती है, तो संयुक्त राष्ट्र की तरफ से विशेष सहायता और उनके मानवाधिकारों की चिंता की जाती है. जबकि यूरोप और एशिया में गैर-मुस्लिम देशों में यह शरणार्थी अराजकता फ़ैलाने और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहने के चलते बदनाम हैं.

इसके सैकड़ों उदाहरणों में से एक – सितम्बर 2020 में स्वीडन के दंगों को लिया जा सकता है, क्योंकि उन उपद्रवों में मुख्य भूमिका वहां के मुस्लिम शरणार्थियों की थी. वहीं, म्यांमार ने तो रोहिंग्याओं के एक संगठन को आतंकवाद की श्रेणी में रखा हुआ है. जबकि कश्मीर घाटी से हिन्दुओं का विस्थापन और पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफगानिस्तान में गैर-मुसलमानों पर हमले होते है, तो संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से कोई प्रतिक्रिया तक भी नहीं होती है.

संयुक्त राष्ट्र की असंवेदनशीलता और वैचारिक भ्रष्टाचार का स्तर सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक क्षेत्रों में फैला हुआ है. आज जब पूरा विश्व कोरोना वैश्विक महामारी से जूझ रहा है तो भी संयुक्त राष्ट्र आलोचनाओं से घिरा हुआ है. दरअसल, जब कोरोना महामारी चीन से निकलकर दूसरे देशों में फैलने लगी तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जानबूझकर इसकी जानकारी को कई दिनों तक छुपाए रखा था. अगर समय रहते महामारी पर नियंत्रण के उपाय किये जाते तो शायद इतनी भयावह स्थिति न होती. अब इस फ़ैल चुकी अव्यवस्था के लिए भी संयुक्त राष्ट्र को ही जिम्मेदार माना जा रहा है. इस सन्दर्भ में, अप्रैल 2020 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक खबर “U.N. Security Council ‘Missing In Action’ in Coronavirus Fight” हेडलाइन के साथ प्रकाशित की थी. समाचारपत्र ने संयुक्त राष्ट्र के सबसे शक्तिशाली सह-संगठन सिक्योरिटी काउंसिल के बारे में लिखा कि “जब विश्व की बहुत बड़ी आबादी लॉकडाउन में है और हमारे सामने वैश्विक सुरक्षा का सबसे बड़ा मुद्दा सामने है, ऐसे में सिक्योरिटी काउंसिल कुछ भी करने में असमर्थ है”. पहले की तरह इस बार भी आलोचना किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं की, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में ह्यूमन राइट्स वाच के निदेशक लुई कारबोन्यू ने की थी.

इन हालातों को देखते हुए, भारत सहित अन्य देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था में बदलाव की वकालत होने लगी है. कुछ दिनों पहले जनरल असेम्बली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इसके प्रति कम होते भरोसे को भी दुनिया के सामने रखा था. उन्होंने स्पष्ट कहा था – अगर बड़े पैमाने पर सुधार नहीं किए गए तो दुनिया का संयुक्त राष्ट्र पर से भरोसा उठने लगेगा.अतः प्रधानमंत्री मोदी की यह पहल समय की मांग है. उन्होंने जोर देते हुए कहा भी है, “ऐसे में विश्व कल्याण की भावना के साथ जिस संस्था का गठन हुआ, वो भी उस समय के हिसाब से ही थी. आज हम बिल्कुल अलग दौर में हैं. 21वीं सदी में हमारे वर्तमान की, भविष्य की आवश्यकताएं और चुनौतियां अलग हैं. आज पूरे विश्व समुदाय के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है कि जिस संस्था का गठन तबकी परिस्थतियों में हुआ था, वह आज भी प्रासंगिक है. सब बदल जाए और हम ना बदलें तो बदलाव लाने की ताकत भी कमजोर हो जाती है”.

इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि आज इस अंतरराष्ट्रीय संगठन में बड़े पैमाने पर परिवर्तन की जरूरत है. इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ सहित उसके सभी सह-संगठनों को गंभीर आत्ममंथन पर करने की आवश्यकता है.

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