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उषाताई – नाम को जीवन में ढालकर सार्थक किया

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चल पड़े जिधर दो डग, मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर

राष्ट्र सेविका समिति, विश्व के सबसे बड़े अशासकीय महिला संगठन की तृतीय प्रमुख संचालिका वंदनीया उषाताई चाटी का ऐसा जीवन, जिसने परिवार व संगठन दोनों में समन्वय स्थापित कर किस प्रकार एक जीवंत आदर्श स्थापित किया जा सकता है, ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण भारतवर्ष की मातृशक्ति के समक्ष रखा. आज उनकी जन्म जयंती पर सेविका समिति की सभी स्वयंसेविकाएं उन्हें स्मरण कर श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हैं.

एक ऐसा संगठन जिसका ध्येय सूत्र है – स्त्री ही राष्ट्र की आधारशिला है. उस संगठन के सर्वोच्च पद पर आसीन होना अर्थात् गौरवपूर्ण दायित्व को ग्रहण करना तो बहुत सरल व सहज लगता है, किंतु उस दायित्व के अनुरुप पूर्ववत गरिमा के साथ चलना व कर्तव्यों का निर्वहन करना उतना ही कठिन है. कदम कदम पर तुलना होती है और अगणित आशाएं, अपेक्षाएं जुड़ जाती हैं, किंतु जो धुन के पक्के एवं लक्ष्य केन्द्रित जीवन होते हैं, वे निःस्वार्थ रुप से कार्य करते हुए ऐसा आदर्श स्थापित कर लेते हैं कि जैसे सोहन लाल द्विवेदी जी पंक्तियां उन्हीं पर चरितार्थ हो उठी हों –

चल पड़े जिधर दो डग, मग में

चल पड़े कोटि पग उसी ओर .

गड़ गई जिधर भी एक दृष्टि

गड़ गए कोटि दृग उसी ओर.

कहते हैं, संघ कार्य व समिति कार्य ईश्वरीय कार्य हैं और जब ध्येय व मन के भाव अच्छे हों तो भगवान भी उस कार्य में सहायता करने आ खड़े होते हैं और इस यज्ञ में आहुति करने वालों की संख्या स्वयं ही बढ़ती जाती है.

राष्ट्र सेविका समिति अपनी स्थापना के समय से ही ऐसी कुशल संगठक सेविकाओं के निःस्वार्थ सेवा भाव से अपना विस्तार करती आ रही है. बाल्यकाल से समिति शाखाओं से जुड़ी वरिष्ठ स्वयंसेविकाओं ने अपने नेतृत्व में महिलाओं को आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया है. व सदैव ही ऐसे नेतृत्वशील हीरों को तलाशा व तराशा है जो अपने नेतृत्व की आभा से न केवल कार्य की दिशा व दशा बदल देते हैं. अपितु विश्व क़ो अपनी आभा से चमत्कृत भी कर देते हैं. ऐसा ही एक नाम थी वंदनीया उषाताई चाटी. जिन्हें पहले स्थानीय नेतृत्व से लेकर अखिल भारतीय नेतृत्व ने गढ़ा और फिर उन्होंने स्वयं पारस बन असंख्य हीरे गढ़ दिये. सेविका समिति ने १९९४ में अपनी गौरवशाली परंपरा की अमूल्य धरोहर वंदनीया उषाताई को सौंपी . वं. उषाताई ने अपनी पूर्व की दो प्रमुख संचालिकाओं की अमूल्य निधि को न केवल सहेजकर रखा, अपितु उस कार्य को और अधिक विस्तार दिया. १२ वर्ष की अल्पायु में ही समिति शाखा के अनुशासन में ढली उषाताई के लिये अध्ययन और शाखा यही जीवन के ध्येय बन गए थे. छोटे से बाल मन पर अपनी बड़ी स्वयंसेविकाओं के अनुशासन, त्याग, समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा की जो छाप मन पर पड़ी, वह और गहरी होती चली गयी. वह अपने नाम को दिन प्रतिदिन सार्थक करती गयीं, उषा अर्थात प्रातःकाल से पूर्व का समय यानि भोर जो सदैव अपने साथ नई आशाएं, अपेक्षाएं लेकर आती है और उषाताई ने इस नाम को जीवन में ढालकर सार्थक किया.

१९२७ में महाराष्ट्र के भंडारा (विदर्भ) में ३१ अगस्त भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी यानि गणेश चतुर्थी के दिन फणसे परिवार में घोड़ोपंत नारायण फड़से व रमाबाई के घर एक ऐसी भोर का शुभागमन हुआ जो भविष्य में असंख्य महिलाओं की आदर्श बनीं, और माता-पिता ने इनका नाम रखा उषा. बुद्धि के देवता गणेश जी के जन्मोत्सव के दिन जन्मी उषा मानों बुद्धि, विवेक और चातुर्य के गुण स्वतः ही साथ लेकर आई हों. बी.ए., बी.एड.करने के उपरांत अध्यापन को अपना जीविका का साधन चुन बालकों के भविष्य निर्माण में सलंग्न हों गई. समिति की दायित्ववान कार्यकर्ता तो थी हीं, साथ ही देश में चल रहे स्वतत्रंता आंदोलनों का प्रभाव दोनों ही कार्यों में प्रत्यक्ष व परोक्ष रुप से सतत सक्रिय रहने वाली युवा तरुणी पर देश के विभाजन रुपी दंश ने जीवनपर्यंत एक टीस बना दी.

स्वतंत्रता के एक वर्ष उपरांत १९४८ में नागपुर के एक स्वयंसेवक श्री गुणवंत चाटी जो उस समय वहाँ घोष प्रमुख का दायित्व निर्वहन कर रहे थे, उनसे उषाताई का विवाह संपन्न हुआ और सम विचार दंपति परिवार पंरपरा के साथ संगठन के कार्यों में और अधिक सक्रिय हो गया. उषाताई पर माँ सरस्वती की अपार कृपा थी और उन्हें बहुत ही मधुर कंठ प्राप्त था. स्वयंसेविकाओं के लिये देशभक्ति पूर्ण गीतों की रचना करना और उन्हें संगीतमयी धुनों में ढालकर मधुर कंठ से गाकर सुनाना उषाताई का प्रिय कार्य था. और यह एक ऐसा गुण था, जिसके लिये उन्हें अखिल भारतीय गीत प्रमुख का दायित्व दिया गया. अपने जीवन के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनमें हर भूमिका के साथ समान न्याय यानि एक शिक्षिका, कुशल गृहस्थ, संयुक्त परिवार में होने से हर जिम्मेदारी निभाना और संगठन के दायित्व के साथ भी पूर्ण निष्ठा यह उषाताई ने जीवंत करके दिखाया.

संगठन के दायित्व के कारण प्रवास भी बढ़ गये थे और सक्रियता भी. श्री राम जन्मभूमि आंदोलन में १९९१ में अयोध्या में माहिला टोली का नेतृत्व करना और सभी को रामलला के काज हेतु प्रोत्साहित करना उनकी अप्रतिम नेतृत्व क्षमता का ही उदाहरण था. स्वयं शिक्षिका थीं, अतः शिक्षा का महत्व भलीभांति समझती थीं. अतः समिति के कार्यों का विस्तार करते हुये बहनों के छात्रावास आरंभ किये व विदेशों में प्रवास कर समिति को अन्तरराष्ट्रीय आयाम भी दिया और विदेशों में शाखाएं आरंभ की. १९९८ में पुणे में संपन्न विश्व समिति सम्मेलन में अनेक देशों की स्वयंसेविका बहनों ने सहभागिता की. ये उषाताई की दूरदर्शी दृष्टि का ही सफल परिणाम था. राष्ट्र सेविका समिति एक ऐसा संगठन है जो बिना किसी दिखावे के हर पल राष्ट्र निर्माण में संलग्न है. समिति की बैठकें, वर्ग, प्रशिक्षण कार्यक्रम पांच सितारा होटलों में नहीं होते, न ही कोई तड़क-भडक वाला दिखावा. सामान्य श्रेणियों में प्रवास कार्यकर्ता बहनों के यहाँ रुकना और शुद्ध सात्विक आहारचर्या ये ऐसे विषय हैं जो तरुणियों को आदर्श का विषय बन जाते हैं.

उषाताई के जीवन में एक बड़ी दुखद घटना घटी, जब १९८४ में ह्दयाघात से उनके पति का निधन हो गया. किंतु मनोबल की धनी उषाताई ने इसे नियति मान स्वीकार कर सम्पूर्ण समय और जीवन समिति कार्यों को ही समर्पित कर दिया. अब अहिल्या मंदिर समिति कार्यालय ही उनका निवास हो गया. उषाताई ने अपने जीवन में अनेक ऐसे आदर्श तय किये जो समिति की दिशा और दशा बदलने में मील का पत्थर बनें. सामान्यतः लोगों की दायित्वों के प्रति लगाव हो जाता है और उसपर बनें रहने का मोह त्याग नहीं पाते हैं. किंतु उषाताई ने बारह वर्ष तक मुख्य संचालिका का दायित्व निर्वहन करते हुए अपने सामने ही अपने उत्तराधिकारी की घोषणा और उसे कार्य विस्तार कर करते हुये अपने सामने देखना एक अद्भुत आदर्श है.

२००६  में प्रमिलाताई मेढे को मुख्य संचालिका का दायित्व सौंप वंदनीया उषाताई अहिल्या मंदिर में आध्यात्म और अध्ययन में लीन हो गयीं. यह उनके स्नेह और व्यवहार का ही प्रतिफल था कि भारत और विश्व के अनेक देशों से स्वयंसेविकाएं उनसे मिलने और ऊर्जा प्राप्त करने आती थीं. दायित्व निवृत्ति के एक दशक से ज्यादा समय में उषाताई सतत मानव निर्माण करती रहीं जो उनके पास आता अपने साथ राष्ट्रप्रेम और कर्त्तव्य बोध का पाथेय लेकर ही जाता था. वे सदैव कहती थीं हर पक्षी को उड़ने के लिये ईश्वर ने दो पंख दिये हैं, एक पंख के सहारे से कैसा भी सशक्त पक्षी हो ऊंची उड़ान संभव ही नहीं है. भारत वर्ष को भी उच्चतम उड़ान भरना है तो उसके दोनों पंखों को समान रुप से उड़ान भरनी होगी और ये दोनों पंख हैं, भारत के स्त्री और पुरुष. जिनके समान प्रयासों से ही भारत परम वैभव के पद पर आसीन हो सकता है.

ममता, स्नेह,राष्ट्रीय भावनाओं की जीवंत प्रतिरूप वंदनीया उषाताई ने १७ अगस्त २०१७ को अपनी दिव्य देह माँ भारती के आंचल में समर्पित कर दी. ७८ वर्षों तक राष्ट्र सेवा में सतत जीवन ज्योतित करने वाला यह दीप असंख्य दीपमालिकाओं के प्रकाश का माध्यम बन स्वयं दिव्य ज्योति में विलीन हो गईं. आज उनकी जन्म जयंती पर अगणित नंदादीप उन्हें स्मरण कर रहे हैं.

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